Saturday, November 20, 2004

रिक्शेवाला

आज कुछ पढ़ा, उसको लिख रहा हूं

आवाज देकर
रिक्शेवाले को बुलाया
वो कुछ
लंगड़ाता हुआ आया

मैंने पूछा-
यार, पहले ये तो बताओगे,
पैर में चोट है कैसे चलाओगे?

रिक्शेवाला कहता है-
बाबू जी,
रिक्शा पैर से नहीं
पेट से चलता है


संदर्भ: भोले भाले, अशोक चक्रधर

Information on enabling reading and writing Hindi on your computer/browzer

आशीष गर्ग के ब्लॉग में आपका स्वागत है

If you can read the above welcome message in Hindi, then your computer is ready for Hindi. Enjoy. If not, please follow the instructions given below to install support for Hindi. Normally Windows includes support for Hindi but it may need to be installed which is quite easy and should take only a few seconds. In the case of Unix/Linux, it may be slightly more complicated.

Installing support for Hindi on your computer

Note: You must have IE (version 5.5 or above), or Netscape (version 4 or above) or latest versions of any of the other browsers like Opera, Mozilla etc. which support unicode.If you face any problems in following these instructions, feel free to contact me at a.garg.98@cantab.net. Before reading or typing Hindi, please make sure that encoding of the browzer is set to UTF-8 (Go to View-->Encoding-->UTF-8). Also, you may need your operating system's CD during some of the following operations.

Please select your operating system, for the appropriate section :-

Windows 2000

Windows XP

Windows 98/95

Linux/Unix


Windows 2000

Good Solution:

Enable support for Indian languages on your computer. Windows 2000 has inbuilt Indian languages features. If you enable these features, you will be able to view the Hindi pages much better.
1. Go to Settings (Start Button)
2. Go to Control Panel
3. Go to Regional Options
4. In "Language settings for the system" (in the first "General" tab), select Indic.
5. Click OkYou should be able to view the Hindi text on this site now.

Easier Solution:

Download these fonts (Raghindi by NCST) and install them (help on installing fonts). You should be able to view the hindi text on this site now.


Windows XP

Good Solution:

Enable support for Indian languages (Indic) on your computer. Windows XP has inbuilt Indian languages features. If you enable these features, you will be able to view the Hindi pages much better. You must have at least 10 MB of free hard disk space. Before starting, please close any open programs.
1. Go to Control Panel (from the “Start” button)
2. Go to Regional and Language Options.
3. Click the “Languages” tab.
4. Check (click) the line marked “Install files for complex scripts and right to left languages (including Thai)”

When you check this line, a new window will appear, which will give a list of languages that will be installed. This list will include ‘Indic’. It will ‘warn’ you that you need at least 10 MB of hard disk space. Click OK to close this window. Then click OK on the Regional and Languages Options window. You will be asked to restart your computer.You should be able to view the Hindi text on this site now.

Easier Solution:

Download these fonts (Raghindi by NCST) and install them (help on installing fonts). You should be able to view the hindi text on this site now.

Windows 98/95

Download these fonts (Raghindi by NCST) and install them (help on installing fonts). You should be able to view the hindi text on this site now.

Linux/Unix

Download and build the free Saraswati font available from Sun.You should then be able to view the hindi text on this site from the latest versions of Mozilla.If you are able to provide better and easier step-by-step instructions for enabling viewing of hindi webpages on Linux/Unix systems, please do send the instructions to us.

How to install the font :(only for Windows systems)

Download the raghu.zip file and extract in a particular directory on your hard disk. Say, the root directory "c:\raghu" Go to Start-Settings-Control Panel In Control Panel, open "Fonts" Select the file raghu.ttf from where you extracted the zip file and drag and drop it into the Control Panel Fonts window.



Tools and methods of writting in Hindi (Unicode way)

  • On-Line Hindi keyboard (free)

  • Takhti_a hindi writting software (free)

  • Aksharamala


  • Friday, November 19, 2004

    शनिवार के खयाल

    आज छुट्टी का दिन है और मैं सुबह से अलसा रहा हूं, एक तरफ़ भारत और दक्षिण अफ़्रीका का उबाऊ मैच चल रहा है और दूसरी तरफ़ टीवी के बहुत से घटिया कार्यक्रम। सोचा कि कुछ ब्लॉग पर ही बकवास कर ली जाये।

    क्रिकेट ये एक ऐसी बीमारी लग गयी हमारे देशवासियों को कि इसका निदान आज तो मिलना बहुत ही मुश्किल है। सच्चाई तो ये है कि अगर कोई इसके बारे में बुरा बोले तो उसका कत्ल हो जाये। पता नहीं ऐसा क्या है इस खेल में। वैसे मैं अंग्रेजों की दूरदृष्टि की तारीफ करूंगा कि उन्होंने भारत को सदैव अपना राज याद दिलाने के लिये एक ऐसा खेल छोड़ा कि जिसको आज वो खुद कम खेलते हैं और हमारे लोग ज़्यादा, जैसे कि हमारे भारतीय लोग बाकी मामलों में भी अंग्रेजों से बढ़कर अंग्रेज हैं। हद होती है मानसिक और चारित्रिक गुलामी की।आज हिन्दी अखबार में भी पढ़ा कि किसी गोष्ठी में ये चर्चा हुयी कि अब भारत का काम अंग्रेजी के बिना बिल्कुल नहीं चलेगा। मैंने सोचा कि क्योंन हिन्दी वगैरह को भारत से बाहर ही निकाल दिया जाये, क्यों लोग बेकार में हिन्दी या कोई और भारतीय भाषा में बात कर अपना समय बरबाद करते हैं। भैया अंग्रेजी का ज़माना है और वही सीखो। बेकार में हिन्दी को बोलकर पिछ्ड़ना पड़ जायेगा। आज हमने पड़ोसी को अपने बच्चे से बोलते हुये सुना कि 'बेटा दूध फ़िनिश कर लो'। हमने सोचा कि बेचारा बच्चा भी सोचता होगा कि ये कौन सी जुबान है। एक दिन सब्ज़ी लेने गये तो सब्ज़ी वाले से सामान लेने के बाद पूछा कि कितने पैसे हुये, उसने उत्तर दिया कि 'फ़ोर्टी फ़ाइव', हमने दांयें बांयें देखा ये सोच कर कि शायद शायद किसी और से बोला है, देखा कोई और तो था नहीं, फिर पूछा कि क्या हमसे बोला, बोला हां। हमने पूछा कि भैया पैंतालिस बोलने में क्या हर्ज़ है, तो वो बोला कि भाई साहब आजकल जितने भी लोग आते हैं उनमें से ज़्यादातर को हिन्दी की गिनती आती ही नहीं है और न उनके बच्चों को इसलिये धंधा चलाने लिये हमने ही सीख लिया अंग्रेजी में बोलना। हमने कहा धन्य हैं भारतीय लोग जिनको कि अपनी भाषा से ज़्यादा अंग्रेजी का ज्ञान है। आगे बढ़ने की ये रीति अज़ीब है, कल को अगर अंग्रेज को बाप बनाने से फायदा हो तो भारतवासी वो भी कर लें। हिन्दी तो मात्र एक भाषा है। और आगे हमको सिर्फ़ ऐसी पीढ़ी की आवश्यकता है जो कि पूरी तरह से अन्ग्रेजी में शिक्षित हो और वो स्वप्न भी आज पूरा होता नज़र आ रहा है।

    धन्य हो मेरा देश और उसके देशवासी जो कि व्यक्तिगत प्रगति के लिये देश का नाम, भाषा तक बदल देंगे।

    एक दिन ऐसा आयेगा न देश रहेगा और न भाषा,
    फिर सोचेंगे हम कि क्या यही थी हमारी अभिलाषा ।
    जल्दी आगे बढ़ने के चक्कर में रह गये ग़ुलाम
    और अब हाथ मलने के अलावा और क्या है काम।

    Thursday, November 11, 2004

    भारतीय संस्कृति क्या है?

    मित्रों, भारतीय संस्कृति है खिचड़ी संस्कृति, इसको जो जिसके मन में आये वो वैसा बना सकता है और अपने अनुसार परिभाषित कर सकता है जैसा कि हम और आप भी कर रहे हैं। ब्राह्मणवादियों के हिसाब से ये वेदों और पुराणों पर आधारित एक पवित्र संस्कृति है जिसमें सबके लिये बराबर स्थान है और हर व्यक्ति में ईश्वर का अंश है, ये बात अलग है कि इसी पर आधारित व्यवस्था से जातिवाद उपजा, महिलाओं के साथ अन्याय हुये, लोगों का सामाजिक और आर्थिक शोषण हुआ। मार्क्सवादियों व दिल्ली विश्वविद्यालय के इतिहासकारों के के अनुसार ये संस्कृति उधार की संस्कॄति है, ये विजयी आर्यों द्वारा गुलाम भारतीय मूल निवासियों पर थोपी गयी एक व्यवस्था थी, जिसको कि मुस्लिमों आक्रान्ताओं ने भारत पर आक्रमण करके काफ़ी हद तक सुधारा, करोड़ों का धर्मपरिवर्तन हुआ जिससे कि भारत थोड़ा सुधरा वरना पिछ्ड़ जाता , ये बात अलग है कि इस आक्रमण काल में हजारों मंदिर टूटे। लाखोँ महिलाओं का बलात्कार हुआ, तक्षशिला जैसे एक विराट विश्वविद्यालय का नाश हुआ। कुछ के हिसाब से हमारी संस्कृति कुछ थी ही नहीं, वो तो भला हो अंग्रेजों का जिन्होंने भारत पर राज़ करके यहां के लोगों अंधविश्वास और पुरातनपंथ के जाल से बाहर निकाला, हिन्दी, उर्दू, संस्कृत, तमिल, बांग्ला इत्यादि, जो कि उनके व भारतीय संभ्रांत लोगों के मुताबिक पुरानी व घिसीपिटी भाषायें हैं, बोलना छोड़कर अंग्रेजी बोलना सिखाया, कुछ आधुनिक स्कूल विद्यालय खोले, रेल चायी, बिजली लगवायी, हालांकि ये बात अलग है उन्होंने भारतीयों के मन में उनके देश व संस्कृति के प्रति ऐसा दुराभाव भरा कि लोग अंग्रेजी बोलने, अंग्रेजी पहनने, अंग्रेजी खाने, और अंग्रेजी में सोचने में अपनी शान समझने लगे और भारत के बहुजन समाज जो कि गांवों में था उसको वेवकूफ और पिछड़ा हुआ समझने लगे। और साथ ही साथ ऐसा लूटा कि उन्होंने इस देश को सोने की चिड़िया से मिट्टी की चिड़िया बना दिया ।
    तो कहने का मतलब है कि भारतीय संस्कृति का मतलब आप किसी भी तरह से लगा सकते हैं, ये निर्भर करता है कि आप कैसे स्कूलों पढ़े हैं, आपके मां बाप और समाज ने आपको क्या सिखाया है, आपके शिक्षकों का इसके बारे में क्या मत रहा है और आप अभी किस माहौल में रहते हैं और कैसे अखबार पढ़ते हैं? मैं इतिहास के ऊपर कम ही विश्वास करता हूं क्योंकि इतिहास हमेशा पूर्वाग्रही अर्थात बायस्ड होता है।
    मेरे खयाल से भारतीय संस्कृति एक मिली जुली संस्कृति है जिसमें हमेशा से विभिन्न जातियों के लोगों का समागम होता रहा है, विभिन्न भाषाओं और सम्प्रदायों के लोग साथ में रहे हैं, एक साथ मिल बैठ कर खाया है, पिया है, त्योहार मनाये हैं, शदियां की हैं। लेकिन ये बाते तभी तक लागू होती हैं जब तक कि किसी एक संस्कृति ने अपने ऊपर जबरदस्ती न थोपा हो। हर जगह के लोग अपने में खुश रहे हैं, उनको ये मतलब नहीं है कि और जगह क्या हो रहा है, अगर उनके अपने यहां सब ठीक है तो उनको शायद ही फरक पड़े कि और जगह क्या हो रहा है। भारतीय संस्कृति की अच्छाइयां हैं कि वो सबको अपने में आत्मसात कर लेती है, वहीं बुराई इसमें हैं कि यहां के आपसी भाई चारे और सद्भाव के कारण भ्रष्टाचार और भाई भतीजावाद बढ़ा है, लोगों की भावना देश और समाज के प्रति कम रह कर परिवार और मित्रों के लिये ज़्यादा रही है। पहले के युग में शायद भारतीय संस्कृति का रूप अच्छा रहा होगा, लेकिन आज तो केवल विकृत रूप ही सामने आता है।

    Monday, November 08, 2004

    वेबरिंग

    मैंने वेब रिंग में अपना पंजीकरण किया है। आप भी कोशिश करें

    आशीष

    Monday, November 01, 2004

    क्या देह ही है सब कुछ



    पता नहीं, उत्तर कठिन है। यहि आदर्शवादी बन कर कहूं तो नहीं, देह कुछ भी नहीं है। पर इसका उत्तर तो विश्वामित्र भी न दे सकेंगे क्योंकि वे भी मेनका के देहपाश में बंध गये थे। उत्तर शायद इस पर भी निर्भर करता है कि आप किस संदर्भ में बात कर रहे हैं। यदि नैतिकता का सवाल है तो देह कुछ भी नहीं है, पर यदि बात मनोरंजन पर आती है तो देह काफ़ी ज़रूरी है। आदर्शवादियों के लिये देह कुछ नहीं है लेकिन एक वेश्या के लिये वो रोज़ीरोटी का साधन है।

    पर आज के परिपेक्ष्य में जहां लोगों के बीच सेक्स, दिखावे, और मस्तीनुमा जीवन की काफ़ी अहमियत है और लोगों को इद्रियभोग में आनंद की अनुभूति की आदत पड़ गयी है, वहां देह बहुत ज़रूरी है। लड़कियों का चिपकी हुयी जींस पैंटों का पहनना, चिपके व कभी कभी हल्के पारदर्शी ऊपरी वस्त्र पहनना, टी वी पर महिलाओं और यहां तक कि पुरूषों के अंगवस्त्रों के विज्ञापन आना तो इसी संस्कृति का सूचक है। अब हम या आप चाहें या न चाहें, ये तो बढ़ेगा ही, खुलेपन की इस संस्कृति के कुछ फ़ायदे हैं तो कुछ नुकसान भी, इसका आंकलन देखने और सोचने वाले के नज़रिये पर निर्भर करता है।

    यदि मन रहे साफ़ तो देह का मोल ही क्या है? असली चीज़ तो है मन क्योंकि यही देह की परिभाषा भी करता है।

    शुभरात्रि, शब्बाखैर