बहुत दिनों बाद खाली समय मिला है तो सोचा कि कुछ लिख ही न लिया जाये। इतने दिन से सेमेस्टर का आखिरी सत्र होने की वजह से कुछ नहीं लिख पाया था पर मन में कुछ खयाल ज़रूर जमा हो रहे थे। तो सोचता हूं कि उन सभी को आज उड़ेल दिया जाये। बहुत सारी चीजे हैं, पर उनका क्रम बहुत व्यवस्थित नहीं हो सकता है इसलिये उसके लिये खेद है।
मुझे आई आई टी में संकाय सदस्य बने हुये १ साल से ऊपर हो गया है और इस दौरान बहुत से अनुभवों से गुजरा हूं। पहला तो ये था कि १ साल से ज़्यादा मैं भारत में भारत में था और मेरी पत्नी इंग्लिस्तान में अकेली थी जहां वो पढ़ रही थी। उसकी शिकायतें थीं कि मैं उसको उस देश में अकेले छोड़कर क्यों चला गया और फिर मुझको हिन्दुस्तान जाने की इतनी जल्दी क्या थी। कुछ साल वहां और क्यों नहीं रूक सकता था वगैरह वगैरह। इस बात पर हमारे बहुत से वाद विवाद हुये। पर मुझे भी ये समझ नहीं आया है कि मुझे हिन्दुस्तान आने की इतनी जल्दी क्या थी? मेरी जब इंग्लैंड में पी एच डी खतम हो गयी थी तब से मुझे वहां से जाने की हुड़क सवार थी और आनन फानन में मैंने उसी समय आई आई टी में संकाय सदस्यता के लिये आवेदन किया (जिसका कि उस समय संयोग से विज्ञापन भी निकला था) और सौभाग्य (या संयोग या कोइंसीडेन्स) से वो मुझे मिल गया और मैं अपने वतन वापस आ गया लेकिन अकेला और पत्नी के विरोध के वावज़ूद। सोचा कि देश वापस जाकर कुछ करने की कोशिश करेंगे। लेकिन तब मुझे पता चला कि देशप्रेम एक अलग चीज़ होती है और वास्तविकता अलग। आप बाहर से कुछ समय गुज़ार कर जब वापस आते हैं तब कुछ तौर तरीके बदल चुके होते हैं, काम करने का तरीका भी थोड़ा बहुत बदल जाता है, उम्मीदें बदल जाती हैं और आप सबकुछ के थोड़ा तेज़ी से काम करने की उम्मीद करते हैं, ये शायद एक आम भावना है। पर ऐसा कुछ नहीं हुआ, सब कुछ अपनी रफ़्तार पर चल रहा था, बदलाव लाने की एक भावना धीरे आक्रोश में बदल रही थी। ये सब शायद मैं तब तक नहीं सोचता जब तक मैंने एक दूसरी दुनिया न देखी होती जो कि कम से कम आर्थिक व मानविक विकास के दृष्टिकोण से अच्छी थी। कुछ चीजें मन में पहले भी आती थीं जैसे कि हमारे यहां सफाई का अभाव क्यों है, हम इतने भ्रष्ट क्यों हैं, हम जगह जगह थूकते और पेशाब क्यों करते हैं इत्यादि पर विदेश में रहने के बाद कुछ और बड़ी बातें दिमाग में आयीं जिनका कि ताल्लुक सामाजिक विकास से था जैसे कि शिक्षा, शिक्षा का स्तर, सामाजिक भेदभाव, लिंग असमानता, सामाजिक सुरक्षा, विज्ञान व शोध इत्यादि।
खैर हमने यहां अपने पांव धीरे जमाने शुरू किये, शोध के लिये पैसा लाने के लिये प्रोजेक्ट लिखे और वो आया भी पर विद्यार्थी तो हैं नहीं शोध कहां से हो? पढ़ाना शुरू किया, उसमें आनन्द आया पर काफ़ी विद्यार्थी उतने उत्सुक नहीं दिखे, उनका मुख्य उद्देश्य ये जानना था कि मैं उनको कौन सा ग्रेड दूंगा (हालांकि मेरा आशय ये कतई नहीं है कि मेरा अध्यापन निर्दोष था, उसमें भी कमियां रही होंगी और मैं उनको स्वीकार भी करता हूं)। मैंने काफ़ी सोच विचार किया है। लेकिन दिक्कत मुझे लगता है निचले स्तर से शुरू होती है। विद्यार्थियों से बातचीत के आधार पर मुझे ये अनुभव हुआ कि हम एक कमजोर नींव पर बड़ी इमारत बनाने का सोच रहे हैं जो कि भविष्य में बहुत ही खराब साबित हो सकता है।
खुद की प्राथमिक शिक्षा के अनुभव से, छात्रों को देख कर और उनसे सुनकर ये लगता है कि हमारा समाज जिस तरह से बच्चों को पढ़ाता है ये जिस तरह से स्कूलों में बच्चों को तालीम दी जाती है उसमें कहीं न कहीं कुछ बहुत बड़ी कमी है। बच्चों पर बस्ते का इतना बड़ा बोझ है कि उनका बचपन बरबाद हो जाता है। जे ई ई और इसके जैसी तमाम प्रतियोगी परीक्षाओं ने आज शैक्षिक व्यवस्था की रीढ़ तोड़ दी है क्योंकि उसमें स्कूल या विद्यालय के योगदान का कोई स्थान नहीं है और साथ ही साथ उसने बचपन से लेकर आजतक जो कुछ सीखा उसका कुछ खास मतलब नहीं है अगर वो बच्चा उन मात्र नौ घंटों के इम्तहान में अच्छा नहीं कर पाता है। साथ ही साथ इस चीज कि बहुत बड़ा महत्व है कि उसकी शिक्षा का माध्यम क्या रहा है? इस तरह की प्रतियोगी परीक्षाओं की वजह से आज विद्यालयों की खुद की ज़िम्मेदारी कुछ नहीं रह गयी है, और ऊपर से जो कोचिंग और ब्रिलियंट या अग्रवाल जैसे संस्थानों की बाढ़ आयी है उसने तो समस्या को और भी कुरूप कर दिया है। शिक्षा की आढ़ में कुछ पब्लिक व कान्वेंट स्कूल क्या पढ़ा रहे हैं ये किसी नहीं छुपा है। और इन कोचिंगों के माध्यम से आने वाले छात्रों में एक वैज्ञानिक या अच्छा इंजीनियर बनने की कितनी इच्छा होती है वो आप समझ सकते हैं। पहला लक्ष्य है नौकरी कैसे भी मिलना वरना समाज क्या कहेगा। दूसरी बात जो बच्चे आते हैं उनमें ज्यादातर मध्यम वर्ग या उच्च मध्यम वर्ग से ही आते हैं जिनका कि सपना ही होता है या तो अमेरिका जाना या भारत में ही अपना एक अमेरिका बनाना और यहां की गरीब जनता के ऊपर पैसे की राज करना जैसा कि अमेरिका भी कर रहा है। स्कूलों में बच्चों को जितना ध्यान अंग्रेज़ी सिखाने के ऊपर दिया जाता है अगर उतना ही ध्यान बच्चों की नैसर्गिक प्रतिभा को उजागर करने में लगाया जाये तो आज हमारे समाज में विचारकों, वैज्ञानिकों, कलाकारों इत्यादि की कमी नहीं होगी। साथ ही बच्चे भी इस बात से खुश रहेंगे कि कम से कम वे वो काम कर रहे हैं जिसमें कि उनकी दिलचस्पी है। इसमें स्कूल के साथ साथ समाज व मातापिता का भी योगदान है। मातापिता को भी बच्चों को उसी दिशा में प्रेरित करना चाहिये कि जिसमें उसका झुकाव हो व अनावश्यक तुलनाओं से बचना चाहिये। हम चाहें कितने भी आई आई टी या आई आई एम बना लें केलिन जब तक स्कूली शिक्षा का उद्धार नहीं होगा तब तक किसी का कोई मतलब नहीं है। वास्तव में ये संस्थान बनाकर हम समाज का आर्थिक बोझ और बढ़ा रहे हैं क्योंकि इनसे समाज को बहुत ज़्यादा हासिल नहीं हो रहा है। ज़रूरत है हम अपने पॉलीटेक्नीकों और आई टी आई को अच्छा बनायें ताकि उनसे अच्छे जूनियर इंजीनियर निकलें, अच्छे कारीगर निकलें। ज़रूरत है कि हम हमारे कलाकारों, मूर्तिकारों, शिल्पकारों, किसानों को प्रोत्साहन सें ताकि समाज में असमानता न आये, लोगो में किसी च्यवसाय के प्रति कुंठा न पैदा हो।
कमज़ोर नींव पर आलीशान महल खड़े नहीं किये जाते हैं ।
वरना वो एक दिन तूफान आने पर ताश के पत्तों की तरह बह जाते हैं ॥
हमारे समाज में मज़े की बात तो ये है कि हम जब एक तिमंजिला बढ़िया सुपरस्टोर से एक १००० रुपये की कमीज खरीदते हैं तो कोई मोलभाव नहीं करते हैं पर जब २० रुपये की सब्ज़ी खरीदते हैं या रिक्शा करते हैं तो पाई पाई का मोलभाव करते हैं और बात करते हैं धर्म कर्म की।
जाते हैं हरिद्वार ऋषिकेश तीर्थ करने लेकिन दुनिया भर का कचरा फैलाते हैं वहां, मंदिर तो साफ रहते हैं लेकिन मंदिर के बाहर का दृश्य देख कर तो भगवान भी कुंठित हो जायें। हज़ारों लाखों का घी दूध यज्ञ अनुष्ठानों में खर्च होता है लेकिन गरीबों और नौकरों को सौ रूपये ज़्यादा देने में हालत खराब होती है, दूध घी बांटने में कष्ट होता है।
हमारे पड़ोसी के घर में एक उनका ४-५ साल का बेटा और उसके बराबर का ही एक लड़का है जो कि नौकर है। लड़का अभिजात्य स्कूल में ३०००/- रुपये महीने की फ़ीस पर पढ़ता है और नौकर लतखोर और हरामज़ादा की गाली सुनता है क्योंकि वो गरीब है। बेटा मस्त मुलायम बिस्तर पर सोता है और नौकर ज़मीन पर एक दरी पर और वो भी सर्दी में। बेटे को सर्दी ज़ुकाम होता है पर नौकर को नहीं। इत्यादि इत्यादि। और हम बात करते हैं धर्म कर्म की।
आगे और भी ज़ारी रहेगा, मेरी उंगलियां दर्द कर रही हैं।
(भाग १)