Friday, December 31, 2004

नव वर्ष और सूनामी

नववर्ष की पूर्व संध्या पर कई लोगों ने पूछा कि क्या कर रहे हो? हमारी समझ में नहीं आया कि क्या जबाब दें। उधर हज़ारों का जीवन तबाह समुद्र के थपेड़ों ने कर दिया, ऐसे में कुछ मन नहीं कर रहा है। पता नहीं शायद ये उचित होगा कि हम एक नववर्ष न मनायें। वैसे भी नया साल क्यों मनाया जाता है पता नहीं कुछ ऐसा नयी होता हो नहीं। हां कैलेंड़र में तारीखें ज़रूर बदल जाती हैं।

खैर, हम आपको नववर्ष की शुभकामनायें देते हैं और आशा है कि आपके सपने पूरे हों। उम्मीद है कि ये नया साल उन लोगों के जीवन में कुछ अच्छा लायेगा जिनका कि जीवन ही लगभग तबाह हो गया है, हालांकि उनकी क्षति को पूरा करना नामुमकिन है। आशा है कि अगले साल तक गरीब लोगों के जीवन में कोई आशा की किरण आयेगी, आशा है कि कोई उनको फ़ुटपाथ पर नींद से जगाकर ३१ दिसम्बर की रात को १२:०० बजे शराब के नशे में 'हैपी न्यू इयर' नहीं बोलने पायेगा क्योंकि शायद उनको फुटपाथ से एक छत वाले घर में रहना नसीब हो, आशा है कि नये साल में और बच्चे स्कूल जायें, और ज्यादा बच्चों का पेट भरे, आशा है नये साल में अमीर लोगोंअ द्वारा गरीबों का शोषण कम होगा। सब आशाये हैं, नमें से यदि एक भी पूरी हो तो मैं अगला नया साल ज़रूर मनाऊंगा।

नववर्ष की शुभकामनाओं सहित

कमेटी पर एक और

अनूप कुमार शुक्ला जी का कमेटी पर लिखा लेख पढ़ने के बाद से मैं आजकल सोच रहा था कि काश हमारे कार्य स्थल आई आई टी में भी यदि कमेटियां थोड़ी कम होतीं तो शायद शोध ज्यादा हो पाता। हर चीज़ में काम के पहले कमेटी की मीटिंग होनी चाहिये। कमेटी वाले मस्त समौसे और चाय का सेवन करेंगे, फ़ालतू के मुद्दों पर घंटों चर्चा होगी और काम की चीज़ों पर बहुत कम समय दिया जायेगा और उनको लटका के रखा जायेगा। अभी वैसे भी हमारे भारत देश में पढ़ाने का काम भी बहुत ज्यादा इसलिये शोध और भी प्रभावित होता है। विद्यार्थियों को इतना ज्यादा जानकारी दी जाती है कि उनका पढ़ने से मन ही उखड़ जाये। एक सेमेस्टर या सत्र में एक विषय के ४० घंटे, जरा सोचिये ये ज्यादती नहीं है। उसके ऊपर से खूब सारे असाइनमेंट और तीन चार परीक्षायें, बेचारे विद्यार्थी का कचूमर निकल जाता है। और ये सब उस स्थिति में जब उसको नौकरी करनी है सॉफ़्टवेयर कम्पनी की ही। कितना जुल्म है? भैया अगर देश में किसी और विषय का काम ही नहीं है तो फिर क्यों इतने सारे भौतिक, रसायन, जीवविज्ञान, केमीकल इंजीनियरिंग, धातुकर्म अभियान्त्रिकी इत्यादि विभाग खोल के रखे हैं और अगर थोड़ी बहुत जरूरत सही में है तो इन विभागों में आने वाले विद्यार्थियों की संख्या नौकरी इत्यादि की उपलब्धता के हिसाब से घटा दो। पर इस पर भी कमेटी का बनना और उनका निर्णय आना जरूरी है। और तब तक बेचारे विद्यार्थियों की हालत खराब होती रहेगी और वे वो सब पढ़ते रहेंगे जो कि उनको भाता नहीं है। वैसे ही प्रतियोगी परीक्षाओं और इंजीनियरिंग और मेडिकल के बुखार के चलते ज्यादातर लोग वो करते हैं जिनमें कि उनका रूझान ही नहीं है। हाय वो कमेटी की, जिसने कि ये प्रतियोगी परीक्षा जैसा क्रूर तरीका निकाला बच्चों को उच्च शिक्षा में प्रवेश दिलाने का।

मुझे लगता है कि कमेटी वाले मुद्दे से थोड़ा भटक गया था, लेकिन फिर भी दिल के उद्गार तो निकल ही गये जो कि इस चिट्ठे का उद्देश्य है।

भाई ये कमेटी है मस्त चीज़, कोई काम को अगर लटकाना हो तो कमेटी बना दो। भगवान इन कमेटियों को बनाये रखे और मस्त समौसे और चाय चलते रहें, काम का क्या वो हो न हो, उससे किसी का क्या जाता है।

जय कमेटी, जय हिन्द

Saturday, December 25, 2004

ठंड

कानपुर में ठंड मस्त बढ़ गयी है अब। दिन में भी बादल रहते हैं। ऐसे में खाने पीने की मौज है। आजकल शैक्षिक सत्र भी बंद है तो काम भी कुछ कम है, इसलिये कुल मिलाकर मस्ती है। मस्त गरम गरम मूंगफ़ली खाओ, चाय पिओ, और रज़ाई में सोओ, क्या बात है? उस पर टीवी पर लल्लू जी का मनोरंजन देखो बस।

चूंकि आलस हावी है इसलिये बस आज इतना ही।

Thursday, December 16, 2004

फ़िल्मी जहाज अपहरण

कल एक फ़िल्म देख रहे थे स्टार गोल्ड पर: अजय देवगन व अभिषेक बच्चन द्वारा अभिनीत 'ज़मीन'। उसकी कहानी जो कुछ साल पहले एक भारतीय हवाई जहाज़ का अपहरण हुआ था और जिसको गान्धार (या 'कन्डहार' अंग्रेजी पुट में) ले जाया गया था के ऊपर बनी है। असलियत में तो भारत की सरकार ने घुटने टेक दिये थे और आतंकवादियों (मौलाना मसूद अज़हर) को रिहा कर दिया था । फ़िल्म में नायक जी आतंकवादी को अपने साथ लेकर अफगानिस्तान जाते हैं और जहाज को छुड़ा कर भेज देते हैं और साथ ही साथ एक नाटकीय मोड़ में आतंकवादी को भी अपने साथ हेलीकॉप्टर में बिठा कर ले आते हैं और फिर उसको उसमें से नीचे गिरा देते हैं। काश कि ऐसी दिलेरी भारत सरकार और उसके लड़ाकों ने उस समय दिखायी होती। वैसे इस कहानी की प्रेरणा सिर्फ़ काल्पनिक नहीं है, इज़राइल में भी एक ऐसा हादसा कुछ सालों पहले हुआ था और वहां के जाबाज़ों ने बहादुरी दिखाते हुये जहाज को आतंकियों से छुड़ा लिया था। फ़िल्मों के अलावा क्या भारत सरकार असलियत में कभी ऐसा निर्णय ले सकती है? मुझे शक है। आप क्या सोचते हैं?

अर्ज़ किया है

वो ज़िन्दगी से हैं इतने तंग कि कहते हैं मर जायेंगे।
पर अगर मर के भी चैन न मिला तो कहां जायेंगे।।

श्रोत: 'अज्ञात'

आतंक से मुख्यधारा की राह क्या हो?


Akshargram Anugunj सवाल मुश्किल है और जबाब देना उससे भी मुश्किल है? बैठे बैठे पचासों विचार मन में आ सकते हैं लेकिन इसका मतलब यह नहीं सभी व्यवहारिक हों। लेकिन फिर भी कोशिश करते हैं। राह दिखाने से पहले मेरे खयाल से कुछ बिन्दुओं पर विचार किया जा सकता है जैसे कि व्यक्ति किन परिस्थितियों के चलते आतंक की राह में गया था: अर्थात क्या उसे बलात्‌ आतंकवादी बनाया गया था, या पैसे की वजह से या धर्मांधता, क्षेत्रीयता या किसी ऐसे ही कारण की वजह से। कहने का मतलब है कारण जानना ज़रूरी है दवा देने के पहले। उसकी पारिवारिक पृष्ठभूमि क्या है, परिवार में कैसे लोग हैं और उनका क्या पेशा है? क्या राजनीतिक जुड़ाव है इत्यादि इत्यादि। लेकिन हमारे खयाल से ज़्यादातर कारण आतंकवादी पैदा होते हैं नौकरी के न होने से, पैसे के न होने से, काम के किसी ज़रिये के न होने से, या खाली बैठने से और खाली दिमाग है शैतान का घर। इसलिये सबसे बड़ी चीज है उनको रोज़गार के साधन उपलब्ध कराना जिससे कि उन सब चीज़ों का खयाल ही न आये जिससे कि वैसे हालात फिर पैदा हों। जो लोग आतंक की राह से मुख्यधारा में लौटना चाहते हों और यदि उनका आतंकवादी बनने का कारण ऐसा प्रतीत हो कि वे काम मिलने के बाद उन गतिविधियों में लिप्त न रहें, तो उनको नौकरी या व्यवसाय के साधन उपलब्ध कराना। हो सके तो उन लोगों को किसी दूसरे राज्य में भेज देना चाहिये जहां कि वे आतंकी माहौल से दूर रहें और एक नये समाज में शायद उतनी दिक्कत न हो क्योंकि लोगों को आपका इतिहास मालूम नहीं रहता है, पर उसके पहले उनको पुनःनिर्वासन केन्द्रों (Rehabilitation Centres) में रखना ज़रूरी होगा जिससे कि वे सामाजिक गतिविधियों में लिप्त रह सकें। हो सकता है कि कुछ लोगों की लम्बे समय तक निगरानी करनी पड़े लेकिन वो खेल का एक हिस्सा है और ज़रूरी भी है। और यदि उनके परिवार के सदस्यों को बेहतर जीवन मिल सके और बच्चों को अच्छी तालीम मिल सके तो मुझे नहीं लगता है कि उनको मुख्यधारा में लौटने में कोई तकलीफ़ होगी, ऐसे में वे यदि उनको समाजिक समर्थन मिले और रोज़गार का जुगाड़ हो हाये तो स्थिति बहुत सुधर सकती है। काफ़ी कुछ समाज पर भी निर्भर करता है, क्या समाज ऐसे लोगों को दोबारा से स्वीकार कर सकेगा, क्या उनके परिवार वालों को शान्ति से जीने देगा, ये सवाल तो हमको और आपको अपने आप से पूछने होंगे। यदि हम उनको स्वीकारने के लिये तैयार हैं तो रास्ते भी निकल आयेंगे।

माफ़ कीजिये बहुत कम समय में लिखा है, उम्मीद है कि कुछ बिन्दु आपको पसन्द आयेंगे। किसी कविता से सोचा था कि खतम करूं लेकिन अभी कुछ याद नहीं आ रहा है।


-आशीष

Monday, December 13, 2004

बनारस का एक जालस्थल

हमने बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय का एक जाल स्थल देखा और सोचा कि आपको अवगत करायें। इसकी भौतिक विज्ञान की साइट काफ़ी जोरदार है। कृपया नीचे क्लिक करें।

http://www.abhyuday.org/index_hindi.html

http://www.abhyuday.org/xphysics/html/index.php


आशीष

समय

पता नहीं क्या हो रहा है? कुछ ठीक से लिखने का समय ही नहीं मिलता है। अब अनूप भाई ने तो हमको 'शनीचरी' का नाम दे दिया है और वो सही भी है लेकिन इस बार तो हम शनी्चर को भी नहीं लिख पाये। कुछ ऐसा भी नहीं कि काम के क्षेत्र में बहुत तीर मार रहे हों लेकिन फ़िर भी अपनी रूचियों के लिये समय नहीं मिलता है, शायद ये भी आधुनिक मानव के जीवन की बड़ी विडम्बना है। खैर शनीचर को भारत द्वारा बांग्लादेश की धुनाई देखे (क्या करें 'कोलोनियल मेन्टेलिटी' से बुरी तरह 'सफ़र' कर रहे हैं!), पर एक अच्छा काम किया कि विष्णु सखाराम खांडेकर द्वारा लिखित 'ययाति' उपन्यास पढ़ी। अच्छी उपन्यास लगी। जीवन की सार्थकता के ऊपर कई प्रश्न उठाये गये हैं जैसे कि जीवन में इतने अंतर्द्वंद क्यों हैं, इतने विरोधाभास क्यों हैं, क्या सही है क्या गलत है, कोई दूसरे से क्या सच में प्यार कर सकता है इत्यादि इत्यादि। ययाति इन्ही सब प्रश्नों के चक्कर में उलझा रहता है (लेकिन ऐश बहुत करता है क्योंकि हस्तिनापुर का राजा है)। ययाति के जीवन का तानाबाना उसकी पत्नी 'देवयानी' जो कि दानवगुरू महर्षि शुक्राचार्य की घमंडी लेकिन निहायती सुंदर बेटी थी और उसके बचपन की सहेली 'शर्मिष्ठा' जो कि दानवों के राजा वृषपर्वा की वेटी थी लेकिन सुंदर पर मृदुल और सौम्य थी और जो कि परिस्थितियों के वश में आकर देवयानी की दासी बनी (ययाति दोनों के पुत्रों का बाप था: यदु (देवयानी) और पुरू (शर्मिष्ठा))। उपन्यास मुझे तो काफ़ी रोचक लगा, अगर समय मिले तो आप भी पढ़ियेगा। वैसे ययाति इंद्रजीत राजा नहुष का बेटा था

इतवार को हम गये थी लखनऊ, जहां हमने इमामबाड़ा व और कुछ पुराने स्थल देखे। इमामाबाड़ा तो काफ़ी अच्छा है, उसकी निर्माणशैली काफ़ी वैज्ञानिक है जैसे कि रोशनदानों की स्थिति काफ़ी सही है, गर्मी में ठण्डा रखने के लिये वहां एक बहुत अच्छी बाउली है जो कि ज़मीन से नीचे सात मज़िली है और जिसको कि गोमते नदी से जोड़ा गया है, कमरों और दीवारों की ध्वनिपरावर्तन सम्बन्धी विशेषतायें यानी अकाउस्टिक्स काफ़ी अच्छी है और वहां पर ये बात काफ़ी चरित्रार्थ होती है कि दीवारों के भी कान होते हैं। कुल मिला कर काफ़ी अच्छा भवन है। पर ये देख कर खराब लगा कि लोगों ने दीवारों पर पान थूक थूक कर बुरा हाल कर दिया है और जगह प्लास्टिक का कचरा फ़ैला हुआ था। हमारे लोग हमारी ही ऐतिहासिक इमारतों को नुकसान पहुंचाने या गन्दा करने से पहले एक बार भी नहीं सोचते हैं। और शौचालयों या मूत्रालयों का तो वो हाल है कि अगर ज़ोर से लगी हो (मेरा मतलब किससे है आप समझ गये होंगे) तो बदबू और गंदगी के मारे वो भी न हो।

बाकी बाद में।

आशीष

Saturday, December 04, 2004

हां भाइयों!

बहुत दिनों बाद खाली समय मिला है तो सोचा कि कुछ लिख ही न लिया जाये। इतने दिन से सेमेस्टर का आखिरी सत्र होने की वजह से कुछ नहीं लिख पाया था पर मन में कुछ खयाल ज़रूर जमा हो रहे थे। तो सोचता हूं कि उन सभी को आज उड़ेल दिया जाये। बहुत सारी चीजे हैं, पर उनका क्रम बहुत व्यवस्थित नहीं हो सकता है इसलिये उसके लिये खेद है।

मुझे आई आई टी में संकाय सदस्य बने हुये १ साल से ऊपर हो गया है और इस दौरान बहुत से अनुभवों से गुजरा हूं। पहला तो ये था कि १ साल से ज़्यादा मैं भारत में भारत में था और मेरी पत्नी इंग्लिस्तान में अकेली थी जहां वो पढ़ रही थी। उसकी शिकायतें थीं कि मैं उसको उस देश में अकेले छोड़कर क्यों चला गया और फिर मुझको हिन्दुस्तान जाने की इतनी जल्दी क्या थी। कुछ साल वहां और क्यों नहीं रूक सकता था वगैरह वगैरह। इस बात पर हमारे बहुत से वाद विवाद हुये। पर मुझे भी ये समझ नहीं आया है कि मुझे हिन्दुस्तान आने की इतनी जल्दी क्या थी? मेरी जब इंग्लैंड में पी एच डी खतम हो गयी थी तब से मुझे वहां से जाने की हुड़क सवार थी और आनन फानन में मैंने उसी समय आई आई टी में संकाय सदस्यता के लिये आवेदन किया (जिसका कि उस समय संयोग से विज्ञापन भी निकला था) और सौभाग्य (या संयोग या कोइंसीडेन्स) से वो मुझे मिल गया और मैं अपने वतन वापस आ गया लेकिन अकेला और पत्नी के विरोध के वावज़ूद। सोचा कि देश वापस जाकर कुछ करने की कोशिश करेंगे। लेकिन तब मुझे पता चला कि देशप्रेम एक अलग चीज़ होती है और वास्तविकता अलग। आप बाहर से कुछ समय गुज़ार कर जब वापस आते हैं तब कुछ तौर तरीके बदल चुके होते हैं, काम करने का तरीका भी थोड़ा बहुत बदल जाता है, उम्मीदें बदल जाती हैं और आप सबकुछ के थोड़ा तेज़ी से काम करने की उम्मीद करते हैं, ये शायद एक आम भावना है। पर ऐसा कुछ नहीं हुआ, सब कुछ अपनी रफ़्तार पर चल रहा था, बदलाव लाने की एक भावना धीरे आक्रोश में बदल रही थी। ये सब शायद मैं तब तक नहीं सोचता जब तक मैंने एक दूसरी दुनिया न देखी होती जो कि कम से कम आर्थिक व मानविक विकास के दृष्टिकोण से अच्छी थी। कुछ चीजें मन में पहले भी आती थीं जैसे कि हमारे यहां सफाई का अभाव क्यों है, हम इतने भ्रष्ट क्यों हैं, हम जगह जगह थूकते और पेशाब क्यों करते हैं इत्यादि पर विदेश में रहने के बाद कुछ और बड़ी बातें दिमाग में आयीं जिनका कि ताल्लुक सामाजिक विकास से था जैसे कि शिक्षा, शिक्षा का स्तर, सामाजिक भेदभाव, लिंग असमानता, सामाजिक सुरक्षा, विज्ञान व शोध इत्यादि।

खैर हमने यहां अपने पांव धीरे जमाने शुरू किये, शोध के लिये पैसा लाने के लिये प्रोजेक्ट लिखे और वो आया भी पर विद्यार्थी तो हैं नहीं शोध कहां से हो? पढ़ाना शुरू किया, उसमें आनन्द आया पर काफ़ी विद्यार्थी उतने उत्सुक नहीं दिखे, उनका मुख्य उद्देश्य ये जानना था कि मैं उनको कौन सा ग्रेड दूंगा (हालांकि मेरा आशय ये कतई नहीं है कि मेरा अध्यापन निर्दोष था, उसमें भी कमियां रही होंगी और मैं उनको स्वीकार भी करता हूं)। मैंने काफ़ी सोच विचार किया है। लेकिन दिक्कत मुझे लगता है निचले स्तर से शुरू होती है। विद्यार्थियों से बातचीत के आधार पर मुझे ये अनुभव हुआ कि हम एक कमजोर नींव पर बड़ी इमारत बनाने का सोच रहे हैं जो कि भविष्य में बहुत ही खराब साबित हो सकता है।

खुद की प्राथमिक शिक्षा के अनुभव से, छात्रों को देख कर और उनसे सुनकर ये लगता है कि हमारा समाज जिस तरह से बच्चों को पढ़ाता है ये जिस तरह से स्कूलों में बच्चों को तालीम दी जाती है उसमें कहीं न कहीं कुछ बहुत बड़ी कमी है। बच्चों पर बस्ते का इतना बड़ा बोझ है कि उनका बचपन बरबाद हो जाता है। जे ई ई और इसके जैसी तमाम प्रतियोगी परीक्षाओं ने आज शैक्षिक व्यवस्था की रीढ़ तोड़ दी है क्योंकि उसमें स्कूल या विद्यालय के योगदान का कोई स्थान नहीं है और साथ ही साथ उसने बचपन से लेकर आजतक जो कुछ सीखा उसका कुछ खास मतलब नहीं है अगर वो बच्चा उन मात्र नौ घंटों के इम्तहान में अच्छा नहीं कर पाता है। साथ ही साथ इस चीज कि बहुत बड़ा महत्व है कि उसकी शिक्षा का माध्यम क्या रहा है? इस तरह की प्रतियोगी परीक्षाओं की वजह से आज विद्यालयों की खुद की ज़िम्मेदारी कुछ नहीं रह गयी है, और ऊपर से जो कोचिंग और ब्रिलियंट या अग्रवाल जैसे संस्थानों की बाढ़ आयी है उसने तो समस्या को और भी कुरूप कर दिया है। शिक्षा की आढ़ में कुछ पब्लिक व कान्वेंट स्कूल क्या पढ़ा रहे हैं ये किसी नहीं छुपा है। और इन कोचिंगों के माध्यम से आने वाले छात्रों में एक वैज्ञानिक या अच्छा इंजीनियर बनने की कितनी इच्छा होती है वो आप समझ सकते हैं। पहला लक्ष्य है नौकरी कैसे भी मिलना वरना समाज क्या कहेगा। दूसरी बात जो बच्चे आते हैं उनमें ज्यादातर मध्यम वर्ग या उच्च मध्यम वर्ग से ही आते हैं जिनका कि सपना ही होता है या तो अमेरिका जाना या भारत में ही अपना एक अमेरिका बनाना और यहां की गरीब जनता के ऊपर पैसे की राज करना जैसा कि अमेरिका भी कर रहा है। स्कूलों में बच्चों को जितना ध्यान अंग्रेज़ी सिखाने के ऊपर दिया जाता है अगर उतना ही ध्यान बच्चों की नैसर्गिक प्रतिभा को उजागर करने में लगाया जाये तो आज हमारे समाज में विचारकों, वैज्ञानिकों, कलाकारों इत्यादि की कमी नहीं होगी। साथ ही बच्चे भी इस बात से खुश रहेंगे कि कम से कम वे वो काम कर रहे हैं जिसमें कि उनकी दिलचस्पी है। इसमें स्कूल के साथ साथ समाज व मातापिता का भी योगदान है। मातापिता को भी बच्चों को उसी दिशा में प्रेरित करना चाहिये कि जिसमें उसका झुकाव हो व अनावश्यक तुलनाओं से बचना चाहिये। हम चाहें कितने भी आई आई टी या आई आई एम बना लें केलिन जब तक स्कूली शिक्षा का उद्धार नहीं होगा तब तक किसी का कोई मतलब नहीं है। वास्तव में ये संस्थान बनाकर हम समाज का आर्थिक बोझ और बढ़ा रहे हैं क्योंकि इनसे समाज को बहुत ज़्यादा हासिल नहीं हो रहा है। ज़रूरत है हम अपने पॉलीटेक्नीकों और आई टी आई को अच्छा बनायें ताकि उनसे अच्छे जूनियर इंजीनियर निकलें, अच्छे कारीगर निकलें। ज़रूरत है कि हम हमारे कलाकारों, मूर्तिकारों, शिल्पकारों, किसानों को प्रोत्साहन सें ताकि समाज में असमानता न आये, लोगो में किसी च्यवसाय के प्रति कुंठा न पैदा हो।

कमज़ोर नींव पर आलीशान महल खड़े नहीं किये जाते हैं ।
वरना वो एक दिन तूफान आने पर ताश के पत्तों की तरह बह जाते हैं ॥

हमारे समाज में मज़े की बात तो ये है कि हम जब एक तिमंजिला बढ़िया सुपरस्टोर से एक १००० रुपये की कमीज खरीदते हैं तो कोई मोलभाव नहीं करते हैं पर जब २० रुपये की सब्ज़ी खरीदते हैं या रिक्शा करते हैं तो पाई पाई का मोलभाव करते हैं और बात करते हैं धर्म कर्म की।

जाते हैं हरिद्वार ऋषिकेश तीर्थ करने लेकिन दुनिया भर का कचरा फैलाते हैं वहां, मंदिर तो साफ रहते हैं लेकिन मंदिर के बाहर का दृश्य देख कर तो भगवान भी कुंठित हो जायें। हज़ारों लाखों का घी दूध यज्ञ अनुष्ठानों में खर्च होता है लेकिन गरीबों और नौकरों को सौ रूपये ज़्यादा देने में हालत खराब होती है, दूध घी बांटने में कष्ट होता है।

हमारे पड़ोसी के घर में एक उनका ४-५ साल का बेटा और उसके बराबर का ही एक लड़का है जो कि नौकर है। लड़का अभिजात्य स्कूल में ३०००/- रुपये महीने की फ़ीस पर पढ़ता है और नौकर लतखोर और हरामज़ादा की गाली सुनता है क्योंकि वो गरीब है। बेटा मस्त मुलायम बिस्तर पर सोता है और नौकर ज़मीन पर एक दरी पर और वो भी सर्दी में। बेटे को सर्दी ज़ुकाम होता है पर नौकर को नहीं। इत्यादि इत्यादि। और हम बात करते हैं धर्म कर्म की।

आगे और भी ज़ारी रहेगा, मेरी उंगलियां दर्द कर रही हैं।

(भाग १)