Wednesday, October 19, 2005

जीवन क्या बला है??

आजकल लोगों को कुछ करने का समय नहीं मिलता है, मसलन किसी से मिलना, कहीं जाना या फिर कुछ मनोरंजन करना। केवल काम काम और काम। कभी कभी मन में आता है कि आजकल के युग में आदमी के पास समय के सिवा सब कुछ है। और ऐसा नहीं कि आदमी मन से काम कर रहा है, ज़्यादातर वो बेमन से कर रहा है या फिर पैसा उससे करा रहा है। किसी को काम करना अगर या फिर काम ही पसन्द हो तो बात अलग है (मसलन कार्यप्रेमी या वर्कोहॉलिक लोग)। उसको अपनी और अपनों की खुशी में शामिल होने का वक्त भी नहीं है। मनुष्य किस राह पर जा रहा है? भई, ऐसे पैसे का क्या काम जो कि मनुष्य दो पल का सुकून ने दे सके? भारत के बड़े शहरों में तो स्थिति भयानक है। लोग ३-४ घंटे तो आने जाने में गुज़ार देते हैं।

कुछ साल पहले किसी से सुना था:
ऐसी भी क्या ज़ल्दी है एक जाम तो पीजिये
ऐसा न हो कि कहीं मरने का वक्त भी न मयस्सर हो।
पता नहीं पूरा सही है या नहीं, लेकिन मतलब साफ है।

4 Comments:

Blogger Kalicharan said...

dil ke baat bol diye ho, isiliye to hum chhote shahar wale bade shahron main tik nahi paate. Jindagi main sukun hi nahi hai.

1:41 PM  
Blogger अनूप शुक्ला said...

हम कब मुस्काये याद नहीं
कब लगा ठहाका याद नहीं।

ये दुनिया बड़ी तेज चलती है
बस जीने के खातिर मरती है।

पता नहीं कहां पहुंचेगी ?
वहां पहुंचकर क्या कर लेगी?

4:21 AM  
Blogger Tarun said...

bari tej raftar jindagi ki hai
murdo ka sehar hai, yehan kisko darkar jindagi ki hai

9:44 AM  
Anonymous आशीष said...

दूर क्यों जायें अपनी और अपने माता-पिता की दिनचर्या देख लें

मेरे पापा ५ बजे शाम घर आ जाते थे, और मै ८ से पहले कभी घर नही गया. गर्मियो मे वे हमे हर साल १५-२० दिनो के लिये कही ले जाते थे. मै पिछ्ले ७-८ सालो से ५-६ दिनो से ज्यादा घर मे नही रहा !

एक अंधी दौड है, पैसो के लिये, दुसरो से पिछे नही रहने के लिये, आस पडोस/मित्रो से ईर्ष्या की....
गाईड का एक गाना है

वहां कौन है तेरा मुसाफिर जायेगा कहां
दम ले ले घडी भर ये छैंया पायेगा कहां

5:16 AM  

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