Saturday, November 12, 2005

दीपावली के शेर

कादम्बिनी के नबम्बर अंक में दीपावली के ऊपर कुछ अच्छे शेर हैं, उन्हीं को उठा कर लिख रहा हूं:

कहां तो तय था चरांग़ां हरेक घर के लिये
कहां चिराग मयस्सर नहीं शहर के लिये।
- दुष्यंत कुमार
महलों में हमने कितने सितारे सजा लिये
लेकिन ज़मीं से चांद बहुत दूर हो गया।
- बशीर बद्र
फर्क आखिर मुक्ति और ज़ंजीर में कोई तो हो
रोशनी इस कैद की तकदीर में कोई तो हो।
- जानकी प्रसाद वर्मा
अजब है ये नगर भी रोशनी का
जिधर देखो अंधेरा सा लगे है।
- रऊफ़ जावेद
अभी तो गहरी उदासियों का अजीब डेरा है रोशनी में
चलो अंधेरे में चलके बैठें चहीं बसेरा है रोशनी में।
- कुंअर बेचैन

2 Comments:

Blogger अनूप शुक्ला said...

पहला शेर है:-
कहां तो तय था चरांग़ां हरेक घर के लिये
कहां चिराग मयस्सर नहीं शहर के लिये।

9:41 AM  
Blogger आशीष said...

सही कहते हैं। हमने गलती से नीचे वाले शेर की पंक्ति चाप दी। शुक्रिया सुधार के लिये।

8:23 AM  

Post a Comment

<< Home