Tuesday, March 29, 2005

आठवीं अनुगूंज: शिक्षा-आज के परिपेक्ष्य में

मैंने ये विषय आंशिक रूप से इसलिये चुना क्योंकि मैं खुद शिक्षा के जगत से जुड़ा हूं, और साथ साथ मैने संस्थान में विद्यार्थियों का शिक्षा के प्रति उदासीनता पूर्ण रवैये को महसूस किया, और समाज में बहुत सारे माता-पिताओं की शिक्षा से जुड़ी भावनाओं को जानने की कोशिश की । मुझे इन सब चीजों को देखने के बाद लगा कि शायद आज के भारत में शिक्षा के मायने बदल गये हैं। लगता है कि हमारे शिक्षातंत्र में बहुत बड़ा खोट है जो कि हमने ही पैदा किया है। सबसे ज़्यादा तो बालपन में जो शिक्षा मिलती है वही जिम्मेदार है क्योंकि वही तो बच्चों के मन को एक सांचे में ढालती है। स्नातक स्तर तक आते तो बच्चे का मन बदल ही चुका होता है और उसको फिर से बदलना काफ़ी कठिन काम हो जाता है।

तो चलिये बचपन से शुरू करते हैं। बच्चा किताबों से सीखता है कि चोरी करना बुरी बात है, झूठ बोलना गलत होता है, दूसरों को चोट पहुंचाना या उनका शोषण करना अच्छा नहीं है, पर समाज उसे सिखलाता है कि झूठ बोलना पड़ता है, चोरी करनी पड़ती है, रिश्वत देना ज़रूरी है, और शोषण के बिना आदमी ऊपर नहीं उठ सकता है। क्या फालतू की बात है ये संसार वगैरह, ये सब केवल किताबी बातें हैं! पढ़ाई जो होती है वो अंको के लिये, न कि सीखने के लिये। मारो घोंटा। फिर प्रतियोगी परीक्षाओं के लिये कोचिंगे हैं, दुनिया भर के ट्यूटोरियल और गाइडें हैं। कोचिंग जिंदाबाद। कितनी प्रतिभा मुखर हुई, बहुत कम क्योंकि जिंदगी तो घोंटते ही बीत गई। और ऊपर से भारी बस्ता और पचासों क्विजें, प्रोजेक्ट और इम्तहान। जिस उम्र में प्रतिभा का उत्थान होना चाहिये, हमारे यहां उस समय पतन होता है, दुर्भाग्य! कुछ भाग्यशालियों (जिन्होंने खूब जमकर घोंटाई की, कोचिंगे की, मांबाप ने तैयारी में पैसा लगाया) का कहीं कहीं चयन हो जाता है, तो उनको भी मतलब है कैसी नौकरी मिलेगी या फिर कैसे अमेरिका जायें। और फिर अब सूचना प्रौद्योगिकी के ज़माने में तो अब नौकरी के मायने भी बदल गये हैं इसलिये कालेजों में विद्यार्थियों का झुकाव भी उनकी शाखाओं से हट रहा है।

शिक्षा का मतलब केवल धनोपार्जन तक सीमित रह गया है। शिक्षा का ज्ञान, समाज और उसकी समस्यायें जैसी चीज़ों से शायद ही कोई लेना देना रह गया है। हमने तकनीकी और चिकित्सीय शिक्षा को छोड़ कर बाकी सब विषयों को तिलांजलि दे दी। मरें सारे बाकी लोग, हमको तो केवल इंजीनियर और डाक्टर चाहिये। राष्ट्र तो केवल इसने ही बनता है। काश ऐसा हो कि मनुष्य एक इस दुनिया में अपने आप को मशीनों के बीच में अकेला पाये। मां बाप बोलते हैं बेटा इंजीनियर बन जा ताकि तेरे को अच्छी तनख्वाह मिले और हमको अच्छा दहेज। क्या सामाजिक विज्ञान का शिक्षा में कोई स्थान नहीं है? भौतिक और रसायन विज्ञान, गणित और जीवविज्ञान में उत्तम शिक्षा एवं शोध की उपेक्षा करके इंजीनियरिंग और चिकित्सा को बढ़ावा देना एक मूर्खता पूर्ण कदम ही है क्योंकि विज्ञान ही उनकी नींव है, और अगर नींव ही कमज़ोर है तो क्या खाक इंज़ीनियरिंग कोई आविष्कार करेंगे।

पहले अध्यापक होते थे आदर के पात्र क्योंकि वे उसके लायक थे, आज तो सब कोचिंग में मस्त हैं तो विद्यालय गया भाड़ में। आज अध्यापक चाहता है पैसा और शोहरत और क्यों न क्योंकि समाज में केवल अध्यापक और अध्यापन की क्या औकात है। शिक्षा तो आज केवल कोचिंगों में दी जाती है, विद्यालय तो केवल प्रमाणपर्त्रों के लिये हैं।

मेरी समझ में शिक्षा का असल मतलब होता है संस्कार, शिष्टाचार, सोचने और समझने की शक्ति का विकास और उसका समाज के विकास में योगदान, विज्ञान और अन्य विषयों के ज़रिये समाज में लोगों का जीवन स्तर सुधारना, समानता लाना, समरसता लाना, एक दूसरे के प्रति संवेदनशीलता का भाव होना पर हमारे यहां तो उल्टा ही हो रहा है। एक तरफ़ बड़े बड़े विश्वविख्यात संस्थान हैं और दूसरी तरफ़ है अथाह गरीबी, कुपोषित बच्चे और लोग जो कि चिलचिलाती धूप में दो जून की रोटी के लिये काम करते है। और शायद किसी को कोई फरक भी नहीं पड़ रहा है, ये सब तो कीड़े मकोड़े हैं, इनको तो जीने का कोई अधिकार ही नहीं है, इसलिये इनको तो शिक्षा का भी अधिकार नहीं है। तो हमारी शिक्षा तो फिलहाल लोगों को और असंवेदनशील बनाती जा रही है। मैं खुश होऊंगा यदि ऐसा गलत हो।

हमारी शिक्षा मैकाले की शिक्षा पद्धति की गुलाम बन गयी है। लेकिन उसके लिये मैकाले जिम्मेदार नहीं है, हम हैं। अंग्रेज़ों को गये तो ५० साल के ऊपर हो गये, उसके बाद तो बदलाव लाये जा सकते थे। पर किसमें थी इतनी इच्छा शक्ति , समाज सुषुप्त था, नेता कुर्सी के ख्वाब देख रहे थे, और आम आदमी जैसा अंग्रेज़ों के ज़माने में था, उससे भी बदतर हो गया। तो शिक्षा का खयाल किसे रहता, और चूंकि अभिजात्य वर्ग तो वैसे भी यूरोप के सपने देखता था, इसलिये उसके लिये तो ऐसी शिक्षा पद्धति अच्छी ही थी जहां से उसके बच्चे विदेश जा सकें। जो शिक्षा मातृभाषा में हो्नी चाहिये थी, अंग्रेज़ी में है, और मातृभाषा में पढ़ाने वाले विद्यालयों की संख्या दिनोदिन घटती ही जा रही है। ऊपर से तुर्रा ये कि अंग्रेजी माध्यम के स्कूल अच्छे होते हैं व अंग्रेज़ी में शिक्षा अच्छी होती है। कौन समझाये इन मूर्खों को अगर ऐसा ही होता तो अंग्रेज़ के अलावा किसी और वैज्ञानिक को नोबल पुरूस्कार न मिलता। मातृभाषा माध्यम स्कूलों का बुरा हाल है उनकी सामाजिक उपेक्षा के कारण, धन और संसाधनों की कमी के का्रण, पुस्तकों की कमी के कारण न कि इसलिये मातृभाषा ही अनुपयुक्त है।

नेता लोग बड़े बड़े सर्व शिक्षा अभियान बनाते है पर उसके बजट से शिक्षित होए हैं उन्हीं के भाई बन्धु और पुत्र पुत्री वो भी अमेरिका और यूरोप में। जनता तो देखती रहती है कि कब स्कूल खुले। स्कूल खुले भी तो पढ़ाये कौन? अध्यापक कौन बनना चाहता है। मास्टर कहलाने से अच्छा है कि परचून की दुकान खोल ली जाये।

खैर इतना चिंघाड़ने से क्या फ़ायदा, किसके सिर पर जूं रेंगती है? वैसे जैसा कि कालीचरण भाई भी कह रहे थे, कि आजकल जो बात लागू है वो है 'बाप बड़ा न भैया सबसे बड़ा रूपैया' इसलिये शिक्षा से अगर पैसा आता है तो ठीक है वरना वो किसी काम की चीज़ नहीं है। शिक्षा का सिर्फ़ एक ही उद्देश्य है: पैसा, वो भी खुद के लिये। पैसे में बुराई नहीं हे, आखिर समाज को उसकी ज़रूरत है लेकिन अगर सारा ध्यान उसी दिशा में रहे तो मुश्किल है। हम ज़ल्दी किसी भी तरह से पैसा करने के चक्कर में सर्वांगीण विकास से वंचित रह जायेंगे क्योंकि हम हम एक ऐसा शिक्षा तंत्र खड़ा कर रहे हैं जो कि देश में कुछ बहुत ज़रूरी सामाजिक व आर्थिक मुद्दों की अनदेखी कर रहा है और सिर्फ़ एक श्रेणी के लिये बन रहा है और उन्हीं को पालपोस रहा है।

मेरी समझ में ये चलन बदलेगा, लगता नहीं है! कोचिंगों का जाल कम होगा, संभव नहीं लगता! गरीबों को अच्छी शिक्षा मिलेगी, शायद नहीं! सबको अच्छे और समान शिक्षा मिलेगी या कम से कम अवसर मिलेगा, पता नहीं। क्या बच्चे बिना किसी सामाजिक व पारिवारिक दबाब के अपनी रुचि के अनुसार पढ़ सकेंगे, संभव नहीं लगता। सामाजिक ध्रुवीकरण कम होगा, शायद नहीं! दलितों और पिछड़ों को उत्थान के लायक शिक्षा मिलेगी, शायद नहीं। भारत में मातृभाषा में शिक्षा दी जा सकेगी, शायद कभी नहीं। भारत एक आविष्कारकों का देश बनेगा, शायद नहीं। भारत के वैज्ञानिक, चिंतक, दार्शनिक सर उठा के कह सकेंगे कि हम भारत के हैं और भारत में काम करते हैं और अच्छे से अच्छा काम करते हैं, मुश्किल लगता है।

काश मेरे संशय गलत साबित हों। लेख कुछ ज़्यादा बड़ा हो गया है और कहीं कहीं भटक भी गया है, उसके लिये क्षमाप्रार्थी हूं । पर सच ये है हमारी शिक्षा अपने उद्देश्य से भटक गयी है। इस प्रतियोगिता और आगे निकलने की दौड़ के युग में गुरू गुरू न रहे और शिष्य शिष्य न रहा और फलस्वरूप शिक्षा शिक्षा न रही।

Thursday, March 24, 2005

होली

होली है भाई होली है बुरा न मानो होली है।



Tuesday, March 15, 2005

हिन्दी और वेल्श

यदि आप हिन्दी भाषी हैं और उसी खास उत्तर भारतीय शैली में अंग्रेजी बोलते हैं तो आप वेल्स के लोगों के काफ़ी नज़दीक हैं, यहां तक कि फोन पर तो कई लोग आपको वेल्स वाला ही समझ सकते है। । एक भारतीय पत्रकार ने ये पाया है । पूरी जानकारी के लिये यहां पढ़ें।

Sunday, March 13, 2005

त्योहार और असुविधा

अपने जो त्योहार कभी उमंग और उत्साह का संदेश लाते थे, वो आज समाज के लिये असुविधा का कारण बन कर रह गये हैं। होली की आग के चक्कर में सड़कों पे जगह जगह लकड़ी के ढ़ेर लगाना और यातायात को अवरूद्ध करना, महिलाओं के साथ बदतमीज़ी , कीचड़ और रसायनों से होली खेलना, शहर या गांव को खूब गन्दा करना, ये कौन सोचता है खराब है। दीवाली पर शानोशौकत का भोंडा प्रदर्शन, जुआ खेला जाना, पटाखों की कर्कश से कितने लोग बहरे हो जाते हैं किसको पता चलता है, जीव जन्तुओं पर कितना बुरा असर पड़ता है, इसके बारे में शायद ही कोई सोचता है। धार्मिक आयोजनों की आड़ में लोग तेज़ आवाज में लाउडस्पीकर चलाते हैं, उससे बच्चों की पड़ाई और लोगों के कानों पर कितना बुरा असर पड़ता है या किसको कितनी असुविधा होती है, इसके बारे में कौन सोचता है।

हमारे समाज में अगर इनके खिलाफ बोलेंगे तो मार खा जायेंगे।

Saturday, March 05, 2005

सातवीं अनुगूंज: मेरा मीत

सबसे पहले बधाई इंद्र भाई को शीर्षक के चुनाव पर ।
Akshargram Anugunj
बचपन से मेरे बहुत सारे मित्र या मीत रहे हैं, उनमें से कुछ याद हैं, कुछ नहीं। कारण है पिता जी की तबादले वाली बैंक की नौकरी। सबसे पहले हमारा परिवार कायमगंज, जो कि एक छोटा सा कस्बा है पश्चिमी उत्तर प्रदेश के फ़र्रूखाबाद जिले में, में रहते थे। उस समय (९ साल की उम्र तक) मेरा कोई बहुत अच्छा मित्र नहीं था, कम से कम ऐसा कोई नहीं जिसकी मुझे आज तक याद हो।

बचपन एक ऐसा वक्त होता है जब छोटी से छोटी चीज़ से खुशी मिलती है और दुख भी। जीवन में उस समय केवल उसी समय तुरंत महत्व रखने वाली चीजों से ही वास्ता होता है और उन्हीं से खुशी या दुख का अनुभव होता है। बिना सोचे समझे आवेश में कुछ भी करने का समय होता है बचपन और बचपन के मीत उस मज़ेदार समय के भागीदार होते हैं। बिना उनके बचपन क्या है पता भी चलता शायद। उन मीतों में न कोई द्वेष होता है न ही कोई ईर्ष्या , न कोई प्रतियोगिता और न ही कोई रंज। आज की लड़ाई कल दोस्ती में बदल जाती है।

जब मैं करीब नौ-दस साल का था तब पिता जी का तबादला पुखरायां (कानपुर देहात) में हुआ। बहुत छोटा कस्बा था। वहां पर कक्षा पांच के ऊपर एक ही विद्यालय था, श्री रामस्वरूप ग्राम उद्योग इंटर कालेज। पिताजी ने मेरा दाखिला उस उस कालेज में करा दिया और तब मैं छठी कक्षा में था। उस समय मैं अपनी कक्षा में लंबाई में सबसे छोटा था। इसलिये मेरे साथी मेरा काफ़ी खयाल रखते थे, लेकिन इसके एवज में मुझे उनका भी काम करना पड़ता था जैसे कि उनको कक्षा के नोट्स देना या गणित पढ़ाना इत्यादि। इस कॉलेज में पढ़ाई न के बराबर ही होती थी। अध्यापक लोग कुंजियों से पढ़ाते थे। हम लोग ज़्यादातर समय गुल्ली डंडा खेलते थे। मैं भी सीख गया था इस मज़ेदार खेल को।

कॉलेज के पीछे मटर और चने के खेत थे। फसल के समय हम इन खेतों में जाकर मटर और चना खाते थे जिसके कारण हमको कभी स्थानीय किसानों का गुस्सा भी झेलना पड़ता था। एक बार की बात है होली का समय नज़दीक आ रहा था, और हममें से कुछ को सूझा कि होली मनाने के लिये चन्दे का जुगाड़ किया जाये। पहले तो कॉलेज में कुछ लोगों से मांगा, पर न मिला। फिर सोचा क्या किया जाये? किसी को एक खयाल आया कि क्यों न कॉलेज की पीछे बाईपास, जहां से कि ट्रक गुज़रते हैं, पर जाकर ट्रकों को रोक कर उनसे पैसा मांगा जाये। ये काफ़ी खतरे से भरा काम था क्योंकि बाईपास पर ऐसा करने से दुर्घटना सकती थी, कॉलेज या घर पर पता चलने से डांट या मार भी पड़ सकती थी। हममें से कई लोग इसको करने के खिलाफ थे लेकिन शारीरिक रूप से भारी लड़कों ने ये कहकर कि तुम लोग फट्टू हो चुप करा दिया। खैर होली के तीन दिन पहले सुबह सुबह ये काम करने का समय सुनिश्चित किया गया। उस दिन हम लोग कक्षाओं में न जाकर बाईपास पर खड़े हो गये और वहां से गुज़रने वाले ट्रकों को रोकने की कोशिश करने लगे। बहुत कम ट्रक रूकते थे और पैसे तो शायद एक ही आध ट्रक वाले ने दिये। कुछ लड़के पैसे न देने वाले ट्रकों के पीछे पत्थर मार कर अपनी भंड़ास निकाल रहे थे। तभी एक ट्रक को पत्थर सामने से या किनारे से लग गया, वो रूका और हम लोगों की हालत खराब, लगा कि अब शामत आने वाली है। ट्रक से दो तीन लुंगी पहने आदमी निकले और लगे हमारी तरफ दौड़ने। अब हमको खतरा लगा और भगे कालेज की तरफ़। किसी भी दिशा में भाग रहे थे, किसी को किसी की खबर नहीं थी। मैन और मेरे कुछ दोस्त घुस गये एक कक्षा में। कुछ लोग कॉलेज के बाहर चले गये, कुछ पता नहीं कहां गये। फिर भी मन में डर बना रहा कि पता नहीं क्या होगा? कहीं उन्होंने हमारी प्रधानाचार्य से शिकायत कर दी तो। कुछ देर बाद जब दोपहर को खाने की घंटी बजी तो बातचीत में कोई बोला कि वे ट्रक वाले प्रधानाचार्य के पास गये थे और उनको हमारे नाम पता चल गये थे। हमारी और हालत खराब। अब लगा कि कुछ न कुछ दण्ड ज़रूर मिलेगा। अब हम और डर गये। शाम को एक जगह मिलने पर सोचा कि अब क्या किया जाये। कोई फिर बोला कि चलो उपप्रधानाचार्य के पास चलते हैं और उनसे बचाव की गुहार करते हैं। उपप्रधानाचार्य अच्छे व्यक्ति हैं ऐसा सुनने में आया है। डरते डरते शाम को उनके घर गये पर वो नहीं मिले। पता चला कि वो बाहर गये हैं।

अब तो और डर लग गया। मन में खयाल आने लगे कि अगर पिता जी को पता चल गया कि कालेज में में क्या क्या हरकते करते हैं हम लोग तो बहुत डांट पड़ेगी और शायद भी पिटाई होगी। खैर इसी तरह डरते और सोचते कुछ दिन गुज़र गये और कुछ नहीं हुआ तो मन फिर से खुलने लगा। तब बहुत सारे अनुमान लगाये कि क्या हुआ होगा पर उनसे क्या निकलने वाला था।

वक्त चलता रहा और हमारी शैतानियां भी चलती रहीं। समय के साथ पिता जी का फिर से तबादला हुआ और हम कानपुर आ गये। कानपुर के लोग उस कस्बे से अलग थे, बच्चों का भी व्यवहार अलग था।कानपुर के बच्चे मेरे उन कस्बों के दोस्तों की तरह न थे। यहां मतलबीपन था जो कि मुझे अच्छा नहीं लगता था। अब बचपन के वो मीत छूट गये हैं, पर उनकी यादें नहीं। आज उनमें से कइयों के साथ सम्पर्क भी नहीं है पर उनकी स्मृतियां सदैव मेरे साथ रहेंगी।

Thursday, March 03, 2005

आठवीं अनुगूंज का निमंत्रण



इस अनुगूंज का विषय है 'शिक्षा: आज के परिपेक्ष्य में'।

पूरी जानकारी के लिये अक्षरग्राम पर जायें।

Wednesday, March 02, 2005

ये क्या हो रहा है???

हाल के चुनावों को समाचार चैनलों पर देख मन खराब हुआ कि भारत में राजनीति कितनी गन्दी और नीचता से परिपूर्ण हो गयी है। नेता जैसे कि लालू प्रसाद यादव, साधू यादव, शहाबुद्दीन, रामविलास पासवान अपराधियों को कुलेआम संरक्षण देते हैं और यही लोग नैतिक मूल्यों की दुहाई देते हैं और विकास की बात करते हैं, कितना छिछोरापन है! अभी सरकार बनाने में कितने करोड़ चलेंगे और कितनी गंदगी फैलेगी, ऊपर वाला ही जाने। झारखंड में तो रही सही कसर राज्यपाल ने ही पूरी कर दी है शिबू सोरेन को सरकार बनाने का न्योता देकर जबकि उनके पास कम सीटें हैं। क्या लोकतंत्र है?

कभी कभी सोच के लगता है कि हमारा भारतीय समाज किस दिशा में जा रहा है? एक तरफ तो हम अपन्सी संस्कृति सभ्यता और पता नहीं किस किसकी दुहाई देते हैं और वहीं दूसरी ओर कई ऐसी चीजों को अपने सामने होते देखते हैं कि उससे दृष्टिकोण का दोहरापन साफ उजागर होता है। अगर भारतीय समाज उतना ही सहिष्णु और दयावान है जिनकी कि दुहाई दी जाती है, तो हमारे यहां ग्रामीणों, गरीबों और पिछड़ों का उतना शोषण न होता। ये तो खुलेआम होता है नौकरों के रूप में, बाल श्रमिकों के रूप में, रिक्शे वालों के रूप में, किसानों के रूप में इत्यादि इत्यादि। और लोग बात करते हैं समाज की अच्छाइयों की। मुझे दूसरे को नहीं देखना है, लेकिन अपने यहां क्या इतना अच्छा है जिसकी इतनी तारीफ की जाये। टाइम्स ऑफ इंडिया जैसे अखबार पढ़ें तो ऐसा लगता है कि जैसे कि हम कहीं और की खबरें पढ़ रहे हैं या फिर अखबार किसी और वर्ग के लिये बना है जिसका भारत से कुछ लेना देना नहीं है।

कुछ मन के गुबार थे लिख दिये। बाकी फिर।

Tuesday, March 01, 2005

ग़ालिब

पंकज भाई के शेर से हमको भी एक दारू वाला शेर याद आया है। गौर फ़रमाइये:

न मस्ज़िद में बैठ के पी ग़ालिब
थोड़ी सी बची है, कहीं ख़ुदा न मांग ले।

(यदि कोई गलती हो तो बताइयेगा)