आठवीं अनुगूंज: शिक्षा-आज के परिपेक्ष्य में
मैंने ये विषय आंशिक रूप से इसलिये चुना क्योंकि मैं खुद शिक्षा के जगत से जुड़ा हूं, और साथ साथ मैने संस्थान में विद्यार्थियों का शिक्षा के प्रति उदासीनता पूर्ण रवैये को महसूस किया, और समाज में बहुत सारे माता-पिताओं की शिक्षा से जुड़ी भावनाओं को जानने की कोशिश की । मुझे इन सब चीजों को देखने के बाद लगा कि शायद आज के भारत में शिक्षा के मायने बदल गये हैं। लगता है कि हमारे शिक्षातंत्र में बहुत बड़ा खोट है जो कि हमने ही पैदा किया है। सबसे ज़्यादा तो बालपन में जो शिक्षा मिलती है वही जिम्मेदार है क्योंकि वही तो बच्चों के मन को एक सांचे में ढालती है। स्नातक स्तर तक आते तो बच्चे का मन बदल ही चुका होता है और उसको फिर से बदलना काफ़ी कठिन काम हो जाता है।तो चलिये बचपन से शुरू करते हैं। बच्चा किताबों से सीखता है कि चोरी करना बुरी बात है, झूठ बोलना गलत होता है, दूसरों को चोट पहुंचाना या उनका शोषण करना अच्छा नहीं है, पर समाज उसे सिखलाता है कि झूठ बोलना पड़ता है, चोरी करनी पड़ती है, रिश्वत देना ज़रूरी है, और शोषण के बिना आदमी ऊपर नहीं उठ सकता है। क्या फालतू की बात है ये संसार वगैरह, ये सब केवल किताबी बातें हैं! पढ़ाई जो होती है वो अंको के लिये, न कि सीखने के लिये। मारो घोंटा। फिर प्रतियोगी परीक्षाओं के लिये कोचिंगे हैं, दुनिया भर के ट्यूटोरियल और गाइडें हैं। कोचिंग जिंदाबाद। कितनी प्रतिभा मुखर हुई, बहुत कम क्योंकि जिंदगी तो घोंटते ही बीत गई। और ऊपर से भारी बस्ता और पचासों क्विजें, प्रोजेक्ट और इम्तहान। जिस उम्र में प्रतिभा का उत्थान होना चाहिये, हमारे यहां उस समय पतन होता है, दुर्भाग्य! कुछ भाग्यशालियों (जिन्होंने खूब जमकर घोंटाई की, कोचिंगे की, मांबाप ने तैयारी में पैसा लगाया) का कहीं कहीं चयन हो जाता है, तो उनको भी मतलब है कैसी नौकरी मिलेगी या फिर कैसे अमेरिका जायें। और फिर अब सूचना प्रौद्योगिकी के ज़माने में तो अब नौकरी के मायने भी बदल गये हैं इसलिये कालेजों में विद्यार्थियों का झुकाव भी उनकी शाखाओं से हट रहा है।
शिक्षा का मतलब केवल धनोपार्जन तक सीमित रह गया है। शिक्षा का ज्ञान, समाज और उसकी समस्यायें जैसी चीज़ों से शायद ही कोई लेना देना रह गया है। हमने तकनीकी और चिकित्सीय शिक्षा को छोड़ कर बाकी सब विषयों को तिलांजलि दे दी। मरें सारे बाकी लोग, हमको तो केवल इंजीनियर और डाक्टर चाहिये। राष्ट्र तो केवल इसने ही बनता है। काश ऐसा हो कि मनुष्य एक इस दुनिया में अपने आप को मशीनों के बीच में अकेला पाये। मां बाप बोलते हैं बेटा इंजीनियर बन जा ताकि तेरे को अच्छी तनख्वाह मिले और हमको अच्छा दहेज। क्या सामाजिक विज्ञान का शिक्षा में कोई स्थान नहीं है? भौतिक और रसायन विज्ञान, गणित और जीवविज्ञान में उत्तम शिक्षा एवं शोध की उपेक्षा करके इंजीनियरिंग और चिकित्सा को बढ़ावा देना एक मूर्खता पूर्ण कदम ही है क्योंकि विज्ञान ही उनकी नींव है, और अगर नींव ही कमज़ोर है तो क्या खाक इंज़ीनियरिंग कोई आविष्कार करेंगे।
पहले अध्यापक होते थे आदर के पात्र क्योंकि वे उसके लायक थे, आज तो सब कोचिंग में मस्त हैं तो विद्यालय गया भाड़ में। आज अध्यापक चाहता है पैसा और शोहरत और क्यों न क्योंकि समाज में केवल अध्यापक और अध्यापन की क्या औकात है। शिक्षा तो आज केवल कोचिंगों में दी जाती है, विद्यालय तो केवल प्रमाणपर्त्रों के लिये हैं।
मेरी समझ में शिक्षा का असल मतलब होता है संस्कार, शिष्टाचार, सोचने और समझने की शक्ति का विकास और उसका समाज के विकास में योगदान, विज्ञान और अन्य विषयों के ज़रिये समाज में लोगों का जीवन स्तर सुधारना, समानता लाना, समरसता लाना, एक दूसरे के प्रति संवेदनशीलता का भाव होना पर हमारे यहां तो उल्टा ही हो रहा है। एक तरफ़ बड़े बड़े विश्वविख्यात संस्थान हैं और दूसरी तरफ़ है अथाह गरीबी, कुपोषित बच्चे और लोग जो कि चिलचिलाती धूप में दो जून की रोटी के लिये काम करते है। और शायद किसी को कोई फरक भी नहीं पड़ रहा है, ये सब तो कीड़े मकोड़े हैं, इनको तो जीने का कोई अधिकार ही नहीं है, इसलिये इनको तो शिक्षा का भी अधिकार नहीं है। तो हमारी शिक्षा तो फिलहाल लोगों को और असंवेदनशील बनाती जा रही है। मैं खुश होऊंगा यदि ऐसा गलत हो।
हमारी शिक्षा मैकाले की शिक्षा पद्धति की गुलाम बन गयी है। लेकिन उसके लिये मैकाले जिम्मेदार नहीं है, हम हैं। अंग्रेज़ों को गये तो ५० साल के ऊपर हो गये, उसके बाद तो बदलाव लाये जा सकते थे। पर किसमें थी इतनी इच्छा शक्ति , समाज सुषुप्त था, नेता कुर्सी के ख्वाब देख रहे थे, और आम आदमी जैसा अंग्रेज़ों के ज़माने में था, उससे भी बदतर हो गया। तो शिक्षा का खयाल किसे रहता, और चूंकि अभिजात्य वर्ग तो वैसे भी यूरोप के सपने देखता था, इसलिये उसके लिये तो ऐसी शिक्षा पद्धति अच्छी ही थी जहां से उसके बच्चे विदेश जा सकें। जो शिक्षा मातृभाषा में हो्नी चाहिये थी, अंग्रेज़ी में है, और मातृभाषा में पढ़ाने वाले विद्यालयों की संख्या दिनोदिन घटती ही जा रही है। ऊपर से तुर्रा ये कि अंग्रेजी माध्यम के स्कूल अच्छे होते हैं व अंग्रेज़ी में शिक्षा अच्छी होती है। कौन समझाये इन मूर्खों को अगर ऐसा ही होता तो अंग्रेज़ के अलावा किसी और वैज्ञानिक को नोबल पुरूस्कार न मिलता। मातृभाषा माध्यम स्कूलों का बुरा हाल है उनकी सामाजिक उपेक्षा के कारण, धन और संसाधनों की कमी के का्रण, पुस्तकों की कमी के कारण न कि इसलिये मातृभाषा ही अनुपयुक्त है।
नेता लोग बड़े बड़े सर्व शिक्षा अभियान बनाते है पर उसके बजट से शिक्षित होए हैं उन्हीं के भाई बन्धु और पुत्र पुत्री वो भी अमेरिका और यूरोप में। जनता तो देखती रहती है कि कब स्कूल खुले। स्कूल खुले भी तो पढ़ाये कौन? अध्यापक कौन बनना चाहता है। मास्टर कहलाने से अच्छा है कि परचून की दुकान खोल ली जाये।
खैर इतना चिंघाड़ने से क्या फ़ायदा, किसके सिर पर जूं रेंगती है? वैसे जैसा कि कालीचरण भाई भी कह रहे थे, कि आजकल जो बात लागू है वो है 'बाप बड़ा न भैया सबसे बड़ा रूपैया' इसलिये शिक्षा से अगर पैसा आता है तो ठीक है वरना वो किसी काम की चीज़ नहीं है। शिक्षा का सिर्फ़ एक ही उद्देश्य है: पैसा, वो भी खुद के लिये। पैसे में बुराई नहीं हे, आखिर समाज को उसकी ज़रूरत है लेकिन अगर सारा ध्यान उसी दिशा में रहे तो मुश्किल है। हम ज़ल्दी किसी भी तरह से पैसा करने के चक्कर में सर्वांगीण विकास से वंचित रह जायेंगे क्योंकि हम हम एक ऐसा शिक्षा तंत्र खड़ा कर रहे हैं जो कि देश में कुछ बहुत ज़रूरी सामाजिक व आर्थिक मुद्दों की अनदेखी कर रहा है और सिर्फ़ एक श्रेणी के लिये बन रहा है और उन्हीं को पालपोस रहा है।
मेरी समझ में ये चलन बदलेगा, लगता नहीं है! कोचिंगों का जाल कम होगा, संभव नहीं लगता! गरीबों को अच्छी शिक्षा मिलेगी, शायद नहीं! सबको अच्छे और समान शिक्षा मिलेगी या कम से कम अवसर मिलेगा, पता नहीं। क्या बच्चे बिना किसी सामाजिक व पारिवारिक दबाब के अपनी रुचि के अनुसार पढ़ सकेंगे, संभव नहीं लगता। सामाजिक ध्रुवीकरण कम होगा, शायद नहीं! दलितों और पिछड़ों को उत्थान के लायक शिक्षा मिलेगी, शायद नहीं। भारत में मातृभाषा में शिक्षा दी जा सकेगी, शायद कभी नहीं। भारत एक आविष्कारकों का देश बनेगा, शायद नहीं। भारत के वैज्ञानिक, चिंतक, दार्शनिक सर उठा के कह सकेंगे कि हम भारत के हैं और भारत में काम करते हैं और अच्छे से अच्छा काम करते हैं, मुश्किल लगता है।
काश मेरे संशय गलत साबित हों। लेख कुछ ज़्यादा बड़ा हो गया है और कहीं कहीं भटक भी गया है, उसके लिये क्षमाप्रार्थी हूं । पर सच ये है हमारी शिक्षा अपने उद्देश्य से भटक गयी है। इस प्रतियोगिता और आगे निकलने की दौड़ के युग में गुरू गुरू न रहे और शिष्य शिष्य न रहा और फलस्वरूप शिक्षा शिक्षा न रही।

