Sunday, April 17, 2005

नवीं अनुगूंज: आशा ही जीवन है

आशा ही जीवन है
बात सही है। आशा इस समय करोड़ों हिन्दुस्तानियों के लिये सचमुच जीवन है, बेचारे अच्छी सड़कों की आशा कर रहे हैं, बिजली-पानी की आशा कर रहे हैं, पौष्टिक भोजन की आशा करते हैं, बच्चों की बेहतर शिक्षा की आशा करते हैं, कुल मिलाकर अच्छे जीवन की आशा करते हैं, उसमें ही पूरा जीवन निकल जाता है, सचमुच में आशा जीवन समान ही है।

आशा पे ही तो ये देश चल रहा है, ये सबके लिये जीवन है। राजनीतिकों के लिये इस संदर्भ में कि कब वो लोकसभा और विधानसभा के लिये चुने जायें और कब जनता के पैसे को लूटें। नौकरशाहों के लिये भी कुछ ऐसा ही है। उच्च, उच्च-मध्यम और मध्यम वर्गीय बच्चों के लिये कि कब पढ़लिख कर विदेश जायें, यही आशा है। माता-पिता के लिये ये आशा है कि कब बच्चा बड़ा हो और उनके लिये एक गोरी से बहू लाये और साथ में खूब सारा माल। और अनेकोनेक उदाहरण हैं आशा के। और ये आशायें पूरी हो जाती हैं और लोग अपना जीवन सार्थक समझते हैं।

केवल कुछ आशायें बिखर जाती है और जीवन पर्यंत आशा ही रह जाती हैं: जैसे कि किसान द्वारा जीवन में सुधार की आशा, जमादारा द्वारा इसकी आशा कि कब उसे लोग छूने से न मुंह फेरें, मजदूरों द्वारा अच्छे जीवन की आशा इत्यादि।ो

सच में आशा हर मायने में जीवन है, कुछ को जीवन देती है और कुछ के साथ जीवन भर रहती है बिना कुछ दिये।

Thursday, April 07, 2005

दिल्ली यात्रा

अभी हाल ही में दिल्ली जाना हुआ था किसी काम से, उस दौरान कुछ देखा, कुछ महसूस किया, वही लिख रहा हूं:
कानपुर से निकलते समय स्टेशन पर बैठे देखा कि एक आदमी कचरे के डब्बे में कुछ खोज रहा था, गौर से देखा तो पता चला कि वो खाने के फेंके हुये डब्बों में कुछ खोज रहा था। क्या खोज रहा था आप समझ सकते हैं। अन्त में देखा कि उसको एक मिर्च मिल गयी थी, वही खा रहा था वो आदमी।
क्या विकास की धारा या वैश्वीकरण में इनका भी कोई स्थान है?

दिल्ली पहुंचने के समय सुबह के समय खिड़की से बाहर देखना अच्छा नहीं हो सकता है, क्योंकि जिनको शौचालय उपलब्ध नहीं हैं, उनको खुले स्थान का प्रयोग करना पड़ता है?
क्या ये भी विकास के माडल में शामिल है? क्या कुछ होना नहीं चाहिये?

दिल्ली में राष्ट्रीय भौतिकी प्रयोगशाला गये, वहां प्रयोगशालायें देखीं, मुख्य भवन तो बढ़िया है परन्तु अपेक्षाकृत नयी शोध सुविधाओं को बदसूरत झोपड़ीनुमा कमरों में स्थापित किया गया, जो कि अपने आप में बुरा नहीं है, भारतीय विज्ञान संस्थान में भी झोपड़ पट्टियां हैं पर अन्दर और बाहर से देखने में बदसूरत नहीं हैं। पर यहां दिल्ली की इस राष्ट्रीय प्रयोगशाला में हाल बुरा है, शोध करने के लिये युवा वैज्ञानिक ही नहीं हैं, सुविधाओं पर मिट्टी है और जाले लगे हुये हैं। युवा वैज्ञानिक तो भरती नहीं हो रहे हैं पर उच्च पदों पर भर्ती हो रही है।
जिस देश में शोध नहीं होगा वो क्या खाक आगे बढ़ेगा! क्या देश के आकाओं का इस तरफ़ कुछ ध्यान है?

Wednesday, April 06, 2005

हवा में कुछ है

आजकल हवा में पता नहीं कुछ (पॉलेन, हिन्दी शब्द ??) उड़ रहा है जिसके चलते ज़ुकाम ने पकड़ लिया है। अभी नाक बन्द और दिमाग भी, इसलिये बाद में बैठेंगे फ़ुरसत में।