Sunday, July 31, 2005

भारत वापसी यात्रा

इंग्लैंड में करीब ढाई महीने के प्रवास के पश्चात १८ जुलाई को अन्ततः भारत लौटने का समय आया। चूंकि उड़ान १८ की सुबह तड़के मानचेस्टर एअरपोर्ट से थी, इसलिये मुझे लीड्स से रात को ही निकलना पढ़ा। रात भर एअरपोर्ट पर झक मारी, नींद तो आयी नहीं। हां वहां रात को एक अल्जीरिया का बंदा दिखा जो कि एअरपोर्ट के एक कैफ़े में काम करता था। चाय पीने के साथ उसके साथ कुछ वार्तालाप हुआ। और वो इस्लामिक कट्टरपंथियों द्वारा अल्जीरिया में की जा रही बरबादी से काफ़ी चिन्तित था। अल्जीरिया आज से १५-२० साल पहले एक शांत राष्ट्र हुआ करता था लेकिन अफ़गानिस्तान में सोवियत रूस के शासन खत्म होने के बाद, वहां के कई अरब लड़ाके जो कि मानसिक रूप से तालेबान ही थे, अल्जीरिया चले गये और वहां पर कट्टरपंथी विचारधारा को बढ़ावा देने लगे। लेकिन वहां का शासन इसको मिटाना चाहता था और वहां संघर्ष शुरू हुये और अंततः कट्टरपंथी अपनी पकड़ बनाने में सफल हुये। लेकिन प्रशासन ने कट्टरवाद को कुचलने के लिये वहां सैनिक शासन लगा दिया। लेकिन इससे स्थिति और भी खराब हो गयी है और अल्जीरिया में आये दिन बम विस्फ़ोट होते रहते हैं।

खैर सुबह होते होते चेक इन का समय आया, वैसे मेरी टिकट तो एअर इंडिया से थी लेकिन फ्रांकफ़ुर्ट तक मुझे लुफ़्तहंसा से जाना था। फ़्रांकफ़ुर्ट पहुंच कर पता चला कि अमेरिका से एअर इंडिया की जो उड़ान मुंबई जाने वाली थी वो तकनीकी कारणों से रद्द कर दी गई है। दिमाग खराब कि भैया अब जर्मनी में क्या करें? तभी उम्मीद बंधी कि कुछ इंतज़ाम किया जायेगा। चूंकि मेरे पास इंग्लैंड का वीजा था इसलिये मुझे वापस लंदन भेज दिया गया वहां से एअर इंडिया की मुंबई वाली उड़ान को पकड़ने के लिये और फिर वहां से दिल्ली के लिये। कुल मिलाकर मैं पहुंचा दिल्ली १९ की दोपहर तीन बजे और मैं चला था १७ की रात को लीड्स से। दो रातों का सत्यानाश हो चुका था और मैं नींद से पागल था।

इस यात्रा के दौरान कुछ अनुभव हुये:

पहला फ़्रांकफ़ुर्ट पर: एक अधेड़ उम्र के जनाब मेरे पास आये और मुझसे मुंबई की उड़ान की बारे में पूछा (भाषा का आप अनुमान लगा सकते हैं), अंग्रेज़ी और क्या? खैर मैंने उनके बैगेज टैग पर लगे नाम (कुछ आनंद,शायद बिहार के) को देखकर सोचा कि ये भाईसाहब हिन्दी भाषी ही होंगे तो मैंने उत्तर जड़ दिया हिन्दी में। वो सज्जन कुछ उखड़े से प्रतीत हुये और उसके बात उन भाई साहब ने मुझसे बात तक नहीं की और उनके जो बाकी के लोगों के साथ जो वार्तालाप मेरे कानों में पड़े वो हमारी प्यारी आंग्लभाषा में ही थे।

दूसरा एअर इंडिया में: एअर इंडिया के कर्मचारी बहुत ही बदतमीज़ होते हैं, शायद आप सब जानते होंगे। उनके कांन्वेंट शिक्षित कर्मचारियों में शायद किसी को ही हिन्दी आती हो। कुछ घोषणा सम्बन्धी औपचारिकतायें तो सरकारी नियमों की वजह से हिन्दी में करना अनिवार्य होता है लेकिन भाई साहब, आप उनके क्र्यू को देखिये जब वो खाना बांटते हैं: कोई भी सवाल हिन्दी में नहीं होता है जबकि उड़ान में उड़ रहे ८०-९०% भारतीय यात्रियों को हिन्दी ज़रूर आती है होगी। उदाहरणार्थ "सर/मैडम, काफ़ी ओर टी?" भाई, "काफ़ी या चाय" क्यों नहीं जबकि पूरी दुनिया टी को चाय ही बोलती है, तो हमें क्यों शर्म आती है? "सर, व्हाट बुड यू लाइक टू टेक इन डिनर", भाई ऐसे भी तो पूछा जा सकता है कि आप खानें में क्या लेंगे? और भी बहुत सारे वाकये हैं जिनकी चर्चा करते घंटों निकल जायें।

लेकिन एक चीज़ अच्छी थी और वो ये कि चूंकि जहाज़ जेट एअरवेज वालों का था इसलिये उनके खाने की सूची हिन्दी में भी थी जो कि बड़ा सुखद आश्चर्य था। वरना जैसे हमारे हिन्दी फ़िल्म बनाने वाले फ़िल्मों की कास्टिंग अंग्रेज़ी में ही करते है, और हिन्दी फ़िल्मी कैसेट या सीडी वाले उनके सामने या पीछे वाले कवर पर हिन्दी गानों को अंग्रेज़ी में ही लिखते हैं, वैसे ही बाकी हर काम भी भारत में आंग्लभाषा में ही होता है चाहे तो रेस्टारेंट हो या बैंक हो या एअर इंडिया का मेनू हो।

वापस भारत आने पर मुंबई से दिल्ली के लिये जेट की उड़ान पकड़ी। उस उड़ान में कप्तान साहब का अमेरिकी लहजा सुनकर तो हमारे रोंगटे खड़े हो गये। हिन्दी बोलना तो दूर वो तो अंग्रेज़ी भी ठेठ अमेरिकी लहजे में बोल रहा था, उदाहरणार्थ पारुल बत्रा नामक परिचायिका का नाम हो गया 'पारूल बाट्रा'। और देसी उड़ानों में भी विमान कर्मचारियों को हिन्दी बोलने में शर्म सी आती है। कोई भी कर्मचारी आपसे कोई भी सवाल हिन्दी में नहीं करेगा। हम तो ठहरे उद्दंड तो हम तो जबाब हिन्दी में ही देते थे और एक आध को हिन्दी में ही बोलने पर मजबूर करते थे। हवाई जहाज़ में अंग्रेज़ी के सारे अखबार और पत्रिकायें थीं लेकिन हिन्दी या किसी अन्य भारतीय भाषा का शायद ही कुछ कागज़ हो।

बाद में सुझाव देने का वक्त आया, तो हमने दे दिये सुझाव कि कर्मचारियों को हिन्दी में बोलने के लिये प्रेरित किया जाना चाहिये और उनको अच्छा प्रशिक्षण देना चाहिये। हिन्दी व अन्य भाषाओं की भी किताबें और अखबार उपलब्ध होना चाहिये। और अमेरिकी लहजे वाले कप्तानों को फटकारना चाहिये कि इतनी भी नकल की क्या ज़रूरत है। एक परिचायिका हमसे सहमत भी हुई।

अन्त में आ गये दिल्ली और इस वृतान्त की समाप्ति।

सोमवार से नया शैक्षिक सत्र शुरू होने वाला है इसलिये काम काफ़ी है, इसलिये बाद में वक्त मिलने पर लिखूंगा। तब तक के लिये नमस्कार।

Wednesday, July 13, 2005

उत्तर प्रदेश की हालत

पिछले कुछ दिनों से हो रही भयंकर बरसात ने उत्तर प्रदेश में जनजीवन को पंगु बना दिया है। प्रशासन के साफ सफाई रखने के बड़े बड़े दावों की धज्जियां उड़ गयी हैं। बिजली का बुरा हाल है। कीचड़ और जलभराव के कारण बीमारी का फ़ैलना लाजिमी है। जनता परेशान है लेकिन यही जनता ही तो गंदगी भी फैलाती है। पॉलीथीन या मोमिये एक बहुत बड़ी समस्या हैं। ये पान मसाले के पैकेट, प्लास्टिक की थैलियां इत्यादि जगह जगह फेंक दी जाती है और यही धूल मिट्टी के साथ मिलकर जमाव या भराव का कारण बनती हैं। सड़कों के किनारे इतनी कीचड़ या सिल्ट जमा हो जाती है कि चलना मुश्किल हो जाता है, ऊपर से टूटी सड़कों पानी के कारण पता ही नहीं लगता है कि सड़क कहां है और कहां गड़्ढा? सड़्कों पर भारी (सही में भारी) यातायात और इसकी विषमता के कारण समस्या और विकराल है। ऊपर से उत्तर प्रदेश में विक्रम टैम्पो के दमघोंटू धुयें के कारण हालत और भी बदतर है। मुझे कभी कभी समझ नहीं आता कि उत्तर प्रदेश और खासतौर से कानपुर की समस्याओं का क्या समाधान है? क्या समाधान संभव है और क्या निराकरण हो सकता है? लखनऊ, इलाहाबाद व कानपुर के कुछ इलाकें हैं जिनको देख के आस बंधती है पर ये गिने चुने इलाके ही हैं, और यहां की देखभाल स्थानीय निवासी, अधिकारी और कर्मचारी करते हैं, लेकिन बाकी इलाकों का क्या होगा? कुछ हल है भारत के पिछड़े राज्यों में इस नारकीय जीवन से निकलने का?

मेरे खयाल से स्थानीय लोग ही अगर चाहें तो आपस में योगदान करके कुछ हासिल कर सकते हैं, प्रशासन के भरोसे बैठ के कुछ होने नहीं वाला। पर समाज तो मृत है, और उसको केवल पैसा और उसकी चकाचौंध नज़र आती है, लेकिन खुद कुछ करने का खयाल क्यों नहीं आता है। इन इलाकों में एक से एक संभ्रांत व धनी लोग रहते हैं लेकिन लोगों को क्यों नहीं लगता कि कुछ किया जाये ताकि ऐसे गंदे और विषाक्त माहौल को दूर किया जा सके और नयी पीढ़ी को कुछ अच्छा दिया जा सके। मेरी समझ में नहीं आता है!!

Monday, July 11, 2005

पखवाड़े के कलाकार

चित्रकार लाल रत्नाकर की एक कृति:



और कृतियां यहां देखें

Saturday, July 09, 2005

मनमोहन सिंह और ब्रितानी शासन

हमारे इंग्लैंड में पढ़े लिखे प्रधानमंत्री जी ने अब एक और हद पार की और वो ये उन्होंने वहां पर सम्मानित डॉक्टरेट लेने के चक्कर में भारत में ब्रितानी शासन की तारीफ़ भी कर डाली। शरम आनी चाहिये प्रधान मंत्री जी को, लाखों करोड़ों का कत्लेआम हुआ, देश का सारा लूट लिया गया, देश का बंटवारा हुआ, भारतीय शिक्षा की वाट लग गयी, देश बाबुओं और नौकरशाहों का गुलाम हो गया, धार्मिक और जातीय उन्माद फैलाया गया और फिर भी ये तारीफ़ कर रहे हैं, किस बात के लिये?? मुझे बहुत कोफ़्त होती है इन अंग्रेज़ी पढ़े लिखे और अंग्रेज़ी में सोचने वाले लोगों से चाहे वे कोई भी हों, ये लोग मानसिक रूप से गुलाम हैं, इनमें गैरत नाम की चीज़ नहीं है, ये मैकाले की सच्ची औलाद हैं। गुलामी गुलामी है चाहे वो कैसी भी हो और कोई भी करवाये। अंग्रेज़ों ने भारत को जितना चूसा है उतना शायद किसी ने भी नहीं और ये मनमोहन सिंह महाशय एक आंक्सफ़ोर्ड की ओनोरेरी डिग्री लेने के चक्कर में और थोड़ी ब्रितानी मीडिया की वाहवाही लूटने के चक्कर में अपनी पगड़ी ही उनके कदमों पर रख आये। अंग्रेजी राज में भारत का लूटा गया माल आज के अमेरिका के जी डी पी का तीन गुना था (३० खरब डालर)। भारत में जो अच्छाइयां इस राज में हुई वो इतिहास गवाह है ब्रितानी शासन के कारण नहीं वरन चन्द अच्छे ब्रितानी लोगों व भारतीय प्रयासों के कारण हुईं। वरना ब्रितानी लोगों ने तो भारत की नैया पूरी डुबाने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी। शायद कुछ लोगों को ये पता न हो कि जिस जनरल डायर ने जलियांवाला बाग के कत्लेआम को अंज़ाम दिया था उसको इंग्लैंड में फूलों के हार पहनाये गये थे।

शर्म आनी चाहिये हमारे प्रधानमंत्री जी को इस तरह के घटिया और बेगैरत बयान देते हुये। भारत की इज़्ज़त तो इन्हीं जैसे लोगों की वजह से लुटती है जो कि पश्चिम के तलवे चाटते हैं। इनसे अच्छा तो क्यूबा का राष्ट्रपति फिडेल कास्त्रो है जो कि अमेरिका की कोई बात नहीं मानता है।

Thursday, July 07, 2005

ब्रैडफ़ोर्ड

अभी इंग्लैंड प्रवास के दौरान, लीड्स के नज़दीक एक कस्बे ब्रैडफ़ोर्ड में जाना हुआ। सुना कि वहां हिन्दुस्तानी फ़िल्में लगी हैं इसलिये मैं भी चला। सिनेमाघर स्टेशन के पास ही था, और वहां पर काल की टिकट भी मिल गयी। तीन घन्टे फ़िल्म देखी और फिर उसके बाद लीड्स की बस पकड़ने में कुछ समय बाकी था इसलिये चला ब्रैडफ़ोर्ड को देखने। यहां बहुत सारे हिन्दुस्तानी और पाकिस्तानी लोग रहते हैं। रास्ते में एक गुरुद्वारा दिखाई पड़ा जिसके ऊपर गुम्बद बने हुये थे और हमारे हिन्दुस्तानी गुरुद्वारों की तरह बना था। ज्यादातर इंग्लैंड में हिन्दुस्तानियों के धार्मिक स्थल घरों के अन्दर ही बने होते हैं। इसलिये ये और अच्छा लगा। अन्दर जाने पर वहां के पुजारी से मुलाकार हुई जिन्होंने हिन्दी मिश्रित पंजाबी में बात की। फिर उन्होंने मुझे लंगर में खाना खाने को आमंत्रित किया जो कि मैंने झट से स्वीकार कर लिया। अन्दर खाने में बढ़िया गरम रोटियां, छोले, और गोभी आलू की सब्ज़ी थी, और साथ में मस्त स्वादिष्ट खीर और बूंदी के लड्डू। मज़ा आ गया। किसी ने सच ही खा है कि दाने दाने पर लिखा है खाने वाले का नाम।

वहां पर शायद एक मंदिर और मस्ज़िद भी थी लेकिन जाने का समय नहीं मिल पाया। हो सकता है अगली बार।

तिरंगे के कपड़े

सज्जनों और देवियों, अब तिरंगे का इस्तेमाल कपड़ों पर भी हो सकता है। लेकिन सिर्फ़ कमर के ऊपर। अब मैं फटाफट एक कमीज़ बनवाता हूं जिसपर तिरंगा छपा हो।

पूरी खबर

Tuesday, July 05, 2005

काल

अभी हाम ही में मैंने हिन्दी फ़िल्म काल देखी, मुझे ठीक लगी। अच्छी बात ये है डर को केवल आवाजों के प्रभावों के द्वारा नहीं पैदा किया गया है, बल्कि दृश्यों के द्वारा पैदा किया गया है। पहले एक फ़िल्म भूत में कोई भी भूतिया चीज़ नहीं लेकिन भूतिया आवाज़ों के द्वारा डर पैदा किया गया है जो कि बकवास है। अजय देवगन का अभिनय काबिलेतारीफ़ है, जॉन अब्राहम और विवेक ओबेराय का भी ठीक है, लड़कियां (ईशा देओल और लॉरा दत्ता) केवल बदन दिखाने के लिये हैं। उनको जंगल में मिनी स्कर्ट पहनाने और भयंकर मेकअप लगाने का विचार किसे आया समझ के परे है। फ़िल्म वैसे जिम कार्बेट पार्क में बाघों के शिकार और उनके द्वारा पर्यटकों के शिकार के बारे में है। अजय देवगन यानी काली जो कि एक गाइड हुआ करता था पर बाघों के द्वारा मारा गया क्योंकि उसको कुछ लोगों ने जंगल में बाघों के सामने फेंक दिया था, उसकी आत्मा अब बाघों के साथ रहती है और पर्यटकों को मारती है क्योंकि वो जंगल के कायदे कानून तोड़ते हैं। उसकी सलाह है कि यदि जंगल में रहना है तो जंगल के कायदे कानूनों को मानना होगा। मेरे खयाल से तो सही सलाह है।

Monday, July 04, 2005

बरसात की या हमारी सौगात?

उत्तर भारत में मानसून आ चुका है, जो कि अच्छा ही है क्योंकि लोगों को भीषण गर्मी से छुटकरा मिल गया है। लेकिन बरसात एक नयी समस्या लेकर सामने आती है। कानपुर का नज़ारा है कुछ ऐसा, लोगों और अखबारों के मार्फत: सड़कों (ज़्यादातर इतनी टूटी फूटी कि सड़क कहने में भी शर्म आये) पर पानी का जबरदस्त भराव, नालियां हैं जाम और हर जगह कीचड़ और गंदगी, जगह जगह प्लास्टिक और पानमसाले के पैकेट फंसे हैं, सुअर लोट लगाते हैं उस गंदगी में और फिर पनपती हैं महामारियां और फिर होता है रोना धोना और मातम। मानाकि सरकार का कुछ कर्तव्य है इस मामले और सरकार नहीं कर रही है लेकिन स्थानीय नागरिकों का क्या इससे कुछ मतलब नहीं है? उनका काम क्या सरकार को गाली देने से ही खत्म हो जाता है? क्यों नहीं मुहल्ले वाले साथ मिलकर अपना-अपना मुहल्ला साफ रखते है? जब किसी की शादी होती है तो सड़क पर पड़ाल गाड़ के सड़क तोड़ते हैं, खाने पीने की गंदगी फैलाते हैं और वही लोग उम्मीद करते हैं कि ये सब सरकार ठीक कराये और साफ कराये, क्या बकवास है!!

हमारे समाज में लोग अपने घर के बाहर की सफाई के प्रति एक दम अनजान मालूम पड़ते हैं। उनका रवैया इस मामले में काफ़ी निराशाजनक है। जब यही गंदगी महामारी का रूप धारण करती है तो हाय तौबा मचती है। मैंने इस मामले में जितना खराब रवैया उत्तर प्रदेश में देखा है, उतना कहीं नहीं। नागपुर में चार साल बिताने के बाद पता चला कि शहर साफ भी हो सकते हैं, कानपुर जैसे गंदे नहीं और उसमें स्थानीय नागरिकों का भी हाथ रहता है।

हम लोग सब कुछ सरकार से ही उम्मीद करेंगे तो खुद क्या करेंगे। सरकार हमसे बिजली चोरी करने को तो नहीं बोलती लेकिन वो तो एक दम तत्परता से किया जाता है।

बहुत गरियाने का मन कर रहा है कानपुर की गंदगी के समाचार सुनकर लेकिन अब कितना बकूं। थक गया हूं। पहले भी बक चुका हूं जब राष्ट्रीय स्मारकों की बदहाली के बारे में लिखा था। कभी कभी बहुत मन खराब होता है बाहर की अराजकता देखकर और लोगों को इन सब चीज़ों से अनजान देखकर और बातें करेंगे धर्म कर्म की, रामायण महाभारत की।

वियतनाम जो कि हमसे भी गरीब देश है, कम से कम सफाई के मामले में बहुत आगे है।