भारत वापसी यात्रा
इंग्लैंड में करीब ढाई महीने के प्रवास के पश्चात १८ जुलाई को अन्ततः भारत लौटने का समय आया। चूंकि उड़ान १८ की सुबह तड़के मानचेस्टर एअरपोर्ट से थी, इसलिये मुझे लीड्स से रात को ही निकलना पढ़ा। रात भर एअरपोर्ट पर झक मारी, नींद तो आयी नहीं। हां वहां रात को एक अल्जीरिया का बंदा दिखा जो कि एअरपोर्ट के एक कैफ़े में काम करता था। चाय पीने के साथ उसके साथ कुछ वार्तालाप हुआ। और वो इस्लामिक कट्टरपंथियों द्वारा अल्जीरिया में की जा रही बरबादी से काफ़ी चिन्तित था। अल्जीरिया आज से १५-२० साल पहले एक शांत राष्ट्र हुआ करता था लेकिन अफ़गानिस्तान में सोवियत रूस के शासन खत्म होने के बाद, वहां के कई अरब लड़ाके जो कि मानसिक रूप से तालेबान ही थे, अल्जीरिया चले गये और वहां पर कट्टरपंथी विचारधारा को बढ़ावा देने लगे। लेकिन वहां का शासन इसको मिटाना चाहता था और वहां संघर्ष शुरू हुये और अंततः कट्टरपंथी अपनी पकड़ बनाने में सफल हुये। लेकिन प्रशासन ने कट्टरवाद को कुचलने के लिये वहां सैनिक शासन लगा दिया। लेकिन इससे स्थिति और भी खराब हो गयी है और अल्जीरिया में आये दिन बम विस्फ़ोट होते रहते हैं।
खैर सुबह होते होते चेक इन का समय आया, वैसे मेरी टिकट तो एअर इंडिया से थी लेकिन फ्रांकफ़ुर्ट तक मुझे लुफ़्तहंसा से जाना था। फ़्रांकफ़ुर्ट पहुंच कर पता चला कि अमेरिका से एअर इंडिया की जो उड़ान मुंबई जाने वाली थी वो तकनीकी कारणों से रद्द कर दी गई है। दिमाग खराब कि भैया अब जर्मनी में क्या करें? तभी उम्मीद बंधी कि कुछ इंतज़ाम किया जायेगा। चूंकि मेरे पास इंग्लैंड का वीजा था इसलिये मुझे वापस लंदन भेज दिया गया वहां से एअर इंडिया की मुंबई वाली उड़ान को पकड़ने के लिये और फिर वहां से दिल्ली के लिये। कुल मिलाकर मैं पहुंचा दिल्ली १९ की दोपहर तीन बजे और मैं चला था १७ की रात को लीड्स से। दो रातों का सत्यानाश हो चुका था और मैं नींद से पागल था।
इस यात्रा के दौरान कुछ अनुभव हुये:
पहला फ़्रांकफ़ुर्ट पर: एक अधेड़ उम्र के जनाब मेरे पास आये और मुझसे मुंबई की उड़ान की बारे में पूछा (भाषा का आप अनुमान लगा सकते हैं), अंग्रेज़ी और क्या? खैर मैंने उनके बैगेज टैग पर लगे नाम (कुछ आनंद,शायद बिहार के) को देखकर सोचा कि ये भाईसाहब हिन्दी भाषी ही होंगे तो मैंने उत्तर जड़ दिया हिन्दी में। वो सज्जन कुछ उखड़े से प्रतीत हुये और उसके बात उन भाई साहब ने मुझसे बात तक नहीं की और उनके जो बाकी के लोगों के साथ जो वार्तालाप मेरे कानों में पड़े वो हमारी प्यारी आंग्लभाषा में ही थे।
दूसरा एअर इंडिया में: एअर इंडिया के कर्मचारी बहुत ही बदतमीज़ होते हैं, शायद आप सब जानते होंगे। उनके कांन्वेंट शिक्षित कर्मचारियों में शायद किसी को ही हिन्दी आती हो। कुछ घोषणा सम्बन्धी औपचारिकतायें तो सरकारी नियमों की वजह से हिन्दी में करना अनिवार्य होता है लेकिन भाई साहब, आप उनके क्र्यू को देखिये जब वो खाना बांटते हैं: कोई भी सवाल हिन्दी में नहीं होता है जबकि उड़ान में उड़ रहे ८०-९०% भारतीय यात्रियों को हिन्दी ज़रूर आती है होगी। उदाहरणार्थ "सर/मैडम, काफ़ी ओर टी?" भाई, "काफ़ी या चाय" क्यों नहीं जबकि पूरी दुनिया टी को चाय ही बोलती है, तो हमें क्यों शर्म आती है? "सर, व्हाट बुड यू लाइक टू टेक इन डिनर", भाई ऐसे भी तो पूछा जा सकता है कि आप खानें में क्या लेंगे? और भी बहुत सारे वाकये हैं जिनकी चर्चा करते घंटों निकल जायें।
लेकिन एक चीज़ अच्छी थी और वो ये कि चूंकि जहाज़ जेट एअरवेज वालों का था इसलिये उनके खाने की सूची हिन्दी में भी थी जो कि बड़ा सुखद आश्चर्य था। वरना जैसे हमारे हिन्दी फ़िल्म बनाने वाले फ़िल्मों की कास्टिंग अंग्रेज़ी में ही करते है, और हिन्दी फ़िल्मी कैसेट या सीडी वाले उनके सामने या पीछे वाले कवर पर हिन्दी गानों को अंग्रेज़ी में ही लिखते हैं, वैसे ही बाकी हर काम भी भारत में आंग्लभाषा में ही होता है चाहे तो रेस्टारेंट हो या बैंक हो या एअर इंडिया का मेनू हो।
वापस भारत आने पर मुंबई से दिल्ली के लिये जेट की उड़ान पकड़ी। उस उड़ान में कप्तान साहब का अमेरिकी लहजा सुनकर तो हमारे रोंगटे खड़े हो गये। हिन्दी बोलना तो दूर वो तो अंग्रेज़ी भी ठेठ अमेरिकी लहजे में बोल रहा था, उदाहरणार्थ पारुल बत्रा नामक परिचायिका का नाम हो गया 'पारूल बाट्रा'। और देसी उड़ानों में भी विमान कर्मचारियों को हिन्दी बोलने में शर्म सी आती है। कोई भी कर्मचारी आपसे कोई भी सवाल हिन्दी में नहीं करेगा। हम तो ठहरे उद्दंड तो हम तो जबाब हिन्दी में ही देते थे और एक आध को हिन्दी में ही बोलने पर मजबूर करते थे। हवाई जहाज़ में अंग्रेज़ी के सारे अखबार और पत्रिकायें थीं लेकिन हिन्दी या किसी अन्य भारतीय भाषा का शायद ही कुछ कागज़ हो।
बाद में सुझाव देने का वक्त आया, तो हमने दे दिये सुझाव कि कर्मचारियों को हिन्दी में बोलने के लिये प्रेरित किया जाना चाहिये और उनको अच्छा प्रशिक्षण देना चाहिये। हिन्दी व अन्य भाषाओं की भी किताबें और अखबार उपलब्ध होना चाहिये। और अमेरिकी लहजे वाले कप्तानों को फटकारना चाहिये कि इतनी भी नकल की क्या ज़रूरत है। एक परिचायिका हमसे सहमत भी हुई।
अन्त में आ गये दिल्ली और इस वृतान्त की समाप्ति।
सोमवार से नया शैक्षिक सत्र शुरू होने वाला है इसलिये काम काफ़ी है, इसलिये बाद में वक्त मिलने पर लिखूंगा। तब तक के लिये नमस्कार।
खैर सुबह होते होते चेक इन का समय आया, वैसे मेरी टिकट तो एअर इंडिया से थी लेकिन फ्रांकफ़ुर्ट तक मुझे लुफ़्तहंसा से जाना था। फ़्रांकफ़ुर्ट पहुंच कर पता चला कि अमेरिका से एअर इंडिया की जो उड़ान मुंबई जाने वाली थी वो तकनीकी कारणों से रद्द कर दी गई है। दिमाग खराब कि भैया अब जर्मनी में क्या करें? तभी उम्मीद बंधी कि कुछ इंतज़ाम किया जायेगा। चूंकि मेरे पास इंग्लैंड का वीजा था इसलिये मुझे वापस लंदन भेज दिया गया वहां से एअर इंडिया की मुंबई वाली उड़ान को पकड़ने के लिये और फिर वहां से दिल्ली के लिये। कुल मिलाकर मैं पहुंचा दिल्ली १९ की दोपहर तीन बजे और मैं चला था १७ की रात को लीड्स से। दो रातों का सत्यानाश हो चुका था और मैं नींद से पागल था।
इस यात्रा के दौरान कुछ अनुभव हुये:
पहला फ़्रांकफ़ुर्ट पर: एक अधेड़ उम्र के जनाब मेरे पास आये और मुझसे मुंबई की उड़ान की बारे में पूछा (भाषा का आप अनुमान लगा सकते हैं), अंग्रेज़ी और क्या? खैर मैंने उनके बैगेज टैग पर लगे नाम (कुछ आनंद,शायद बिहार के) को देखकर सोचा कि ये भाईसाहब हिन्दी भाषी ही होंगे तो मैंने उत्तर जड़ दिया हिन्दी में। वो सज्जन कुछ उखड़े से प्रतीत हुये और उसके बात उन भाई साहब ने मुझसे बात तक नहीं की और उनके जो बाकी के लोगों के साथ जो वार्तालाप मेरे कानों में पड़े वो हमारी प्यारी आंग्लभाषा में ही थे।
दूसरा एअर इंडिया में: एअर इंडिया के कर्मचारी बहुत ही बदतमीज़ होते हैं, शायद आप सब जानते होंगे। उनके कांन्वेंट शिक्षित कर्मचारियों में शायद किसी को ही हिन्दी आती हो। कुछ घोषणा सम्बन्धी औपचारिकतायें तो सरकारी नियमों की वजह से हिन्दी में करना अनिवार्य होता है लेकिन भाई साहब, आप उनके क्र्यू को देखिये जब वो खाना बांटते हैं: कोई भी सवाल हिन्दी में नहीं होता है जबकि उड़ान में उड़ रहे ८०-९०% भारतीय यात्रियों को हिन्दी ज़रूर आती है होगी। उदाहरणार्थ "सर/मैडम, काफ़ी ओर टी?" भाई, "काफ़ी या चाय" क्यों नहीं जबकि पूरी दुनिया टी को चाय ही बोलती है, तो हमें क्यों शर्म आती है? "सर, व्हाट बुड यू लाइक टू टेक इन डिनर", भाई ऐसे भी तो पूछा जा सकता है कि आप खानें में क्या लेंगे? और भी बहुत सारे वाकये हैं जिनकी चर्चा करते घंटों निकल जायें।
लेकिन एक चीज़ अच्छी थी और वो ये कि चूंकि जहाज़ जेट एअरवेज वालों का था इसलिये उनके खाने की सूची हिन्दी में भी थी जो कि बड़ा सुखद आश्चर्य था। वरना जैसे हमारे हिन्दी फ़िल्म बनाने वाले फ़िल्मों की कास्टिंग अंग्रेज़ी में ही करते है, और हिन्दी फ़िल्मी कैसेट या सीडी वाले उनके सामने या पीछे वाले कवर पर हिन्दी गानों को अंग्रेज़ी में ही लिखते हैं, वैसे ही बाकी हर काम भी भारत में आंग्लभाषा में ही होता है चाहे तो रेस्टारेंट हो या बैंक हो या एअर इंडिया का मेनू हो।
वापस भारत आने पर मुंबई से दिल्ली के लिये जेट की उड़ान पकड़ी। उस उड़ान में कप्तान साहब का अमेरिकी लहजा सुनकर तो हमारे रोंगटे खड़े हो गये। हिन्दी बोलना तो दूर वो तो अंग्रेज़ी भी ठेठ अमेरिकी लहजे में बोल रहा था, उदाहरणार्थ पारुल बत्रा नामक परिचायिका का नाम हो गया 'पारूल बाट्रा'। और देसी उड़ानों में भी विमान कर्मचारियों को हिन्दी बोलने में शर्म सी आती है। कोई भी कर्मचारी आपसे कोई भी सवाल हिन्दी में नहीं करेगा। हम तो ठहरे उद्दंड तो हम तो जबाब हिन्दी में ही देते थे और एक आध को हिन्दी में ही बोलने पर मजबूर करते थे। हवाई जहाज़ में अंग्रेज़ी के सारे अखबार और पत्रिकायें थीं लेकिन हिन्दी या किसी अन्य भारतीय भाषा का शायद ही कुछ कागज़ हो।
बाद में सुझाव देने का वक्त आया, तो हमने दे दिये सुझाव कि कर्मचारियों को हिन्दी में बोलने के लिये प्रेरित किया जाना चाहिये और उनको अच्छा प्रशिक्षण देना चाहिये। हिन्दी व अन्य भाषाओं की भी किताबें और अखबार उपलब्ध होना चाहिये। और अमेरिकी लहजे वाले कप्तानों को फटकारना चाहिये कि इतनी भी नकल की क्या ज़रूरत है। एक परिचायिका हमसे सहमत भी हुई।
अन्त में आ गये दिल्ली और इस वृतान्त की समाप्ति।
सोमवार से नया शैक्षिक सत्र शुरू होने वाला है इसलिये काम काफ़ी है, इसलिये बाद में वक्त मिलने पर लिखूंगा। तब तक के लिये नमस्कार।


