Saturday, October 22, 2005

आई आई टी में कवि सम्मेलन

कल आई आई टी कानपुर में अंतराग्नि के अवसर पर कवि सम्मेलन 'कलरव' का आयोजन किया गया। कविश्रेष्ठ श्री अशोक चक्रधर के अतिरिक्त सर्वेश अस्थाना, प्रदीप चौबे, आशीष अनल और विष्णु सक्सेना जी भी वहां मौज़ूद थे।

अशोक चक्रधर जी ने जहां एक पेपर बेचने वाले गरीब के पसीने की कीमत को बयान किया, कुछ ऐसे;

एक बार चक्रधर जी जा रहे थे कार से कि एक पेपर बेचने वाले ने लाल बत्ते पर शीशा खटखटाया,
पूछा पेपर लोगे, ५० के ५ डब्बे, ४९ मूल्य है, मेरी कमाई केवल, १ रूपये।

कविराज ने पूछा कि इससे पसीना पुछता है
उसने कहा कि लिपिस्टिक पुछती है, काजल पुछता है, और न जाने क्या क्या पुछता है
पर जनाब जो ये पेपर खरीद सकते हैं उनको पसीना नहीं आता।

पसीना तो हम जैसों को आता है
जो कि उसको अपनी कमीज के आस्तीन से पोछ लेते हैं

वहीं वीर रस के कवि अनल जी ने हमारे नेताओं की खूब खबर ली और मज़हब के नाम पर लड़ाने वालों को जम के लताड़ा।

चौबे जी ने गंजो के सिर पर दो बालों (बाल और बालिनी) की शादी को बयान किया तो वहीं अस्थाना जी ने दहेज के नाम पर समाज पर कटाक्ष किये।

विष्णु जी श्रंगार रस के कवि हैं और बहुत ही अच्छा गाते हैं। इन्होंने जवान दिलों को गुदगुदाने वाली कविताओं से समा बांध दिया।

कुल मिलाकर कवि सम्मेलन सुपरहिट रहा और शायद अंतराग्नि का सबसे अच्छा कार्यक्रम।

शायद लोगों को समझ में आया होगा कि मातृभाषा से जो व्यक्त किया जा सकता है, वो आंग्लभाषा से नहीं।

Wednesday, October 19, 2005

जीवन क्या बला है??

आजकल लोगों को कुछ करने का समय नहीं मिलता है, मसलन किसी से मिलना, कहीं जाना या फिर कुछ मनोरंजन करना। केवल काम काम और काम। कभी कभी मन में आता है कि आजकल के युग में आदमी के पास समय के सिवा सब कुछ है। और ऐसा नहीं कि आदमी मन से काम कर रहा है, ज़्यादातर वो बेमन से कर रहा है या फिर पैसा उससे करा रहा है। किसी को काम करना अगर या फिर काम ही पसन्द हो तो बात अलग है (मसलन कार्यप्रेमी या वर्कोहॉलिक लोग)। उसको अपनी और अपनों की खुशी में शामिल होने का वक्त भी नहीं है। मनुष्य किस राह पर जा रहा है? भई, ऐसे पैसे का क्या काम जो कि मनुष्य दो पल का सुकून ने दे सके? भारत के बड़े शहरों में तो स्थिति भयानक है। लोग ३-४ घंटे तो आने जाने में गुज़ार देते हैं।

कुछ साल पहले किसी से सुना था:
ऐसी भी क्या ज़ल्दी है एक जाम तो पीजिये
ऐसा न हो कि कहीं मरने का वक्त भी न मयस्सर हो।
पता नहीं पूरा सही है या नहीं, लेकिन मतलब साफ है।

Thursday, October 06, 2005

दैनिक जागरण भी अंग्रेज़ी की राह पर

भारत में अखबारों में आते हुये बदलाव को देखकर कुछ कुछ समझ नहीं आता है। टाइम्स ऑफ़ इंडिया और हिंदुस्तान टाइम्स में फूहड़ता और ब्रिटेन, अमरीका के कुछ समाचार और एन आर आई की खबरों के अलावा कुछ और तो होता नहीं है। संपादकीय में कुछ लोगों के बकवास युक्त (जिसको कि लोग Intellectual का भी खिताब देते हैं) लेख होते हैं। इसलिये घर पर अब मैं दैनिक जागरण ही मंगाता हूं और कभी कभी हिन्दू या इंडियन एक्सप्रेस जिनके संपादकीय मुझे पसन्द आते हैं।

हाल ही में दैनिक जागरण में एक बदलाव देखा है और वो है अखबार का अंग्रेज़ी के प्रति झुकाव। अखबार में कई जगह वर्तनी इत्यादि की गलतियां तो आम हैं, लेकिन अब तो उनके कुछ सहायक पत्रों में अंग्रेज़ी भी आने लगी है उदाहरणार्थ जूनियर जागरण (गुरुवार) और जोश (बुधवार) में अंग्रेज़ी के लेख भी देखे जा सकते हैं। सवाल ये है कि देश के एक प्रतिष्ठित और सबसे बड़े हिन्दी अखबार में क्या ये उचित है? क्या हिन्दी मीडिया को भी अंग्रेज़ी के सहारे की ज़रूरत है? क्या कारण है कि दैनिक जागरण को ये करने पर मजबूर होना पड़ रहा है? क्यों हमारा शिक्षित समाज बच्चों को दी जाने वाली हिंदी की शिक्षा और समाचारों को धीरे धीरे खत्म करने पर तुला है? टीवी पर हिंदी समाचार चैनलों का अधकचरा हिंदी ज्ञान देख कर उन पर तरस भी आता है और गुस्सा भी, उनके मुकाबले पुराना दूरदर्शन लाख बेहतर है। ऐसा क्यों?? क्या भारत के विकास के लिये हिंदी को तिलांजलि ज़रूरी है??