Saturday, January 07, 2006

शोर की संस्कृति

आजकल भारत में शोर करने का चलन है। सड़कों पर गाड़ियों के भोपुओं की तीखी आवाजें आपके कानों को जैसे फाड़ के ही रख देंगीं। शादियों के मौसम में दूल्हे की बारात में गानों का शोर भी कुछ ऐसा ही भयावह होता है। देवी जागरण के नाम पर किस किस के काम की गला फाड़ू शोर से दुर्गति होती है, केवल भुक्तभोगी ही जान सकते हैं। नये साल के अवसर पर पत्नी की इच्छा के अनुसार एक बाज़ार में जाना हुआ और वहां वाहनों को चिल्ल-पों तो पहले से ही थी, ऊपर से नये वर्ष की शुभकामनायें देते और जोर से गाने बजाते कुछ लाउसस्पीकर जीना मुश्किल किये थे। मना किया तो चुभती निगाहों और कड़वी बातों का सामना करना पड़ा और साथ में बतौर बोनस पत्नी की झिड़की का कि किस किस के मुंह लगते रहते हो। घरों में भी कुछ संगीत सभा (जैसे कि महिला सगीत या किसी का हैप्पी बर्डे) होती है तो शोर सबसे पहले होता है, बिना शोर के इस सब कामों का सम्पन्न होना असम्भव है। किसी को ये मतलब नहीं है कि इस शोर से किसी का कोई नुकसान हो रहा है या नहीं। आप शोर पसन्द करते हैं तो खुशकिस्मत हैं वरना रोइये अपनी किस्मत को और जाइये भाड़ में। लगता है कि बिना शोर के हमारा अस्तित्व खतरे में आ जायेगा। सड़्क पर चलते हैं तो टैंपुओं की घड़्घड़ाती आवाज़ आपको सावधान किये रहती है और ऊपर से वाहनों के 100 डेसीबल वाले भोंपू। अगर आप भोंपू का इस्तेमाल कम करते हैं, तो शायद आपको गाली सुनने को मिले। मैं तो एक बार गाली खा भी चुका हूं। एक बन्धु मोटरसाइकिल से हमारी कार को बायीं तरफ से ओवरटेक कर रहे थे, और भाई बायीं तरफ से करोगे तो हमको दिखाई कैसे पड़े? हमारे यहां बायें शीशे का भी चलन नहीं है और हो भी तो टूट जाता है। खैर हमको एक और बन्धु दायीं तरफ से ओवरटेक कर हे लिहाजा, हमारी गाड़ी से बायीं तरफ वाले भाई तो हल्की सी टक्कर लगी सो वो हमको दौड़ाते हुये आये और लगे बरसने कि गाड़ी चलानी नहीं आती है क्या? हमने अपनी सफाई पेश की कि साहब आप ही तो गलत तरफ से आ रहे थे, तो बोले कि अगर ऐसा था हार्न देना था। तो मतलब ये है कि हार्न देना संस्कृति का अंग है।

त्योहारों पर पटाखों का शोर, धर्म के नाम पर मंदिर मस्ज़िदों से शोर, ऐसा लगता है कि भगवान या खुदा लाउडस्पीकर से बोलने पर ज़्यादा जल्दी जबाब देता है। भाई हमको नहीं करनी ऐसी इबादत। एक अगर 10 डेसीबल में बोलता है तो दूसरे का हक बनता है 20 में बोलने का। कम से काम नहीं चलता है।

खैर अगर आप शांति पसन्द हैं और आपको शांति से रहना है तो बेहतर होगा कि कान में रूई ठूंस कर रहें, हो सकता है इससे कभी कभार कुछ नुकसान हो लेकिन फायदे शायद असीम होंगे।भारत में तो शान्ति या शांति अब केवल कुछ औरतों के नाम तक ही सीमित है और आधुनिक युग में शायद वो भी लुप्त हो जायेगा।

2 Comments:

Blogger Pratik said...

मैं आपके विचारों से पूरी तरह सहमत हूँ। ऐसा लगता है मानो शोर-शराबा हमारे जीवन का एक अंग बन चुका हो। इसी आशय का एक लेख कादम्बिनी के जनवरी अंक में 'शोर की अखिल भारतीय संस्‍कृति' के नाम से भी प्रकाशित हुआ है।

5:27 AM  
Blogger Kalicharan said...

सत्य वचन बोले बच्चन. जब मैं देश गया था तो हल्ला सुन-२ के मेरा सिर लगातार दुखता रहता था. लोग हँसी उङाते थे और में कुछ शर्मिंदा रहता था मानो मेरी ही गलती है. फिर मैने इयर बड लगा कर ही पब्लिक मैं घूमना शुरु कर दिया. जो पूछे उसको बोल देता था कान में ईन्फैक्शन है :)

5:53 PM  

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