Wednesday, July 12, 2006

बनारस यात्रा

इस बार पत्नी ने सप्ताहांत पर बनारस जाने के लिये कहा। पहले तो रेलगाड़ी से जाने का कार्यक्रम था लेकिन फिर जब रेलों में आरक्षण की स्थिति देखी तो कार से जाने का मन बनाया। कार से निकले सुबह पांच बजे। और पहले पहुंचे कानपुर के बाहर और बाहर निकलते ही रिलायंस का A-1 ढाबा मिला जो कि काफ़ी अच्छा है। रिलायंस के ढाबे तक की सड़क भी चारलेन है जिस पर कि चलाने में मस्त मज़ा आता है। कार से सौ की रफ़्तार तो आम है। वहां जाकर सुना कि अब वहां पेट्रोल कोई नहीं भराता है क्योंकि उनका पेट्रोल महंगा है। पर लोग खाना नाश्ता करने के लिये रूकते हैं । वहां काफ़ी सफाई है और खाना भी अच्छा है। पार्किंग के लिये बहुत जगह है लेकिन हमारे हिन्दुस्तानी लोग तो पार्किंग में पार्क न करने के आदी हैं, लिहाज़ा रेस्टोरेंट के सामने की खड़ी कर देते हैं। रिलायंस के कर्मचारी लोग बोलते हैं तो भी फरक नहीं पड़ता है। शायद आर्थिक दंड से फरक पड़े।

खैर वहां से निकले तो रास्ते में फतेहपुर के नज़दीक पहुंचते ही चारलेन रस्ता एकलेन में बदल गया जिसमें खूब गहरे गड्ढे भी थे। उस सड़क पर रफ़्तार ३० के आसपास ही रहती है। पूरा फतेहपुर खराब सड़कों से पटा पड़ा है। कहने को तो ये पूर्व प्रधानमंत्री वी पी सिंह का इलाका है लेकिन काफ़ी पिछड़ा है। करीब ३०-४० किमी का रस्ता खराब था। फिर आगे चारलेन आ गया और फिर से हम उड़ने लगे। कौशाम्बी पहुंचते ही चारलेन फिर से एकरस्ते में बदल गया पर सड़क ठीकठाक थी इसलिये बहुत खराब नहीं लगा, लेकिन इन एक सड़क रास्तों पर ट्रक, जीप , रोडवेज बस, और टैंपू वाले काफ़ी खतरनाक तरीके से चलाते हैं इसलिये आमने सामने की टक्कर का काफ़ी खतरा रहता है। कौशाम्बी में लगा ही नहीं कि कभी ये बुद्धों के लिये महत्वपूर्ण स्थान था। फिर पहुंचे इलाहाबाद जिसके बाहर निकलने में लग गया डेढ़ घंटा।

इलाहाबाद के बाहर बनारस के रास्ते में एक पुल पड़ता है जो कि गंगा के ऊपर बना है और उससे गंगा बहुत खूबसूरत लगती है। इलाहाबाद से बनारस का आधा रास्ता एकदम खराब है और ज़्यादातर समय यहीं बरबाद होता है। आधे रास्ते में लगते हैं एक घंटे और बाकी के रास्ते में एक घंटा। पता चलता है कि अच्छी सड़कें समय को कितना बचाती हैं। खराब सड़कों की वजह से गाड़ी रुक रुक के चलने से खूब पेट्रोल भी पीती है, धूल भी उड़ती है और कीचड़ भी होती है। बनारस के पहले का करीब पचास किमी लगभग चारलेन है और उसमें बहुत मज़ा आया। लेकिन मज़े की बात ये है कि बनारस के आने पर रास्ते में एक भी बोर्ड ये इंगित नहीं करता है कि बनारस आ गया है। चूंकि ये सड़क बनारस के किनारे से निकल जाती है इसलिये अगर आपको पहले से पता न हो तो आप शायद चलते चले जायें जैसा कि मेरे साथ हुआ। करीब चालीस किमी आगे चलने के बाद जब शक हुआ तो पता किया और मालूम हुआ कि बनारस तो पीछे है। खैर फिर लौट के बनारस पहुंचे।

बनारस वैसे तो आध्यात्मिक शहर माना जाता रहा है, लेकिन मेरा ये पहली यात्रा थी उस तरफ। बनारस बहुत साफ शहर तो नहीं है, कानपुर शायद बेहतर है। सड़कें टूटी हैं और घाट गंदे हैं। गंगा का भी बुरा हाल है। गंगा में मल, मूत्र, नालों का पानी, लाश और सब कुछ जाता है। मोक्षदायिनी गंगा अब शायद वो नहीं रही। बरसात में सड़कें नाले बन जाती हैं। कुल मिलाकर बहुत अच्छा नहीं लगा बनारस। लगा कि अगर सड़कें, नालियां और यातायात दुरुस्त हो जाये तो बनारस एक बहुत अच्छा शहर बन जायेगा, क्योंकि ये एक महानगर नहीं है और लोगों के पास जीवन जीने के लिये समय भी है। और साथ साथ घूमने के लिये भी अच्छा हो जायेगा। लेकिन बनारसी पान और मिठाइयां काफ़ी अच्छी हैं।

कुछ चित्र लिये थे जो कि अगले चिट्ठे में डालूंगा। अभी कैमरे से कंप्यूटर पर स्थानांतरित करना है।

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