पर्यावरण और भारत
अभी हाल ही में टाइम पत्रिका में कानपुर को विश्व के सबसे प्रदूषित शहरों में बताया गया (कड़ी और चित्रावली) । पत्रिका में एशिया के अन्य शहरों के बारे में भी चिन्ता व्यक्त की गयी है, मसलन चीन के कई शहर काफ़ी प्रदूषित हैं।
जहां तक भारत की बात है तो प्रदूषण आज की विकराल समस्या है और वैश्वीकरण की तेज़ रफ़्तार में आज खतरा इस बात का है समस्या कहीं इतनी बड़ी न हो जाये कि हल करने में देर हो जाये या हल की गुंजाइश ही न रहे। भारत का सौभाग्य है कि जनसंख्या के बढ़ते बोझ और पेड़ों की अंधाधुंध कटाई के बावज़ूद भारत में अभी भी काफी विशाल वन क्षेत्र (पूरे भू-भाग का करीब 20 प्रतिशत) है जिससे कि हमको अच्छी हवा नसीब होती रहती है और जलवायु इस तरह की है कि बड़े बड़े पेड़ जैसे कि नीम, आम, पीपल, बरगद, गुलमोहर इत्यादि आसानी से लगाये जा सकते हैं जिनसे अच्छी छाया मिलती है और इन पेड़ों में औषधीय गुण भी हैं या फल भी देते हैं। याद रखना चाहिये कि स्वतंत्रता के बाद से जनसंख्या के बढ़ते बोझ और अन्य कारणों ने भारत का वन क्षेत्र काफ़ी कम किया है। और साथ साथ लोगों ने शहरों में पेड़ लगाने ही बन्द कर दिये हैं। शहरों में अगर किसी का घर देखें तो पाइयेगा कि पूरा घर पक्का होता है, पेड़ पौधों की संख्या काफी कम होती है।
भारत के महानगरों, खासतौर से दूसरे स्तर के शहर जैसे कि कानपुर, लखनऊ, बनारस, में पेड़ों की बढ़ती कमी, धुंआ फेंकते वाहन जैसे कि टैम्पू, ट्रैक्टर, ट्रक इत्यादि, वाहनों में प्रेशर हार्न व उनका अंधाधुंध बिना सोचा समझा प्रयोग हर तरह के प्रदूषण को बढ़ावा दे रहा है। साथ साथ जैविक और अजैविक कचरे का कोई भी इंतज़ाम नहीं है। कूड़े के निस्तारण की कोई व्यवस्था न होने से कूड़ा शहर में जमा होता रहता है और तमाम बीमारियों का कारण बनता है, और इसके शिकार ज़्यादातर गरीब लोग या झुग्गी झोपड़ियों में रहने वाले ही होते हैं। कानपुर जैसे शहर जो कि नदियों के किनारे बसे हैं, काफी समृद्ध हो सकते हैं क्योंकि यहां ज़मीन उपजाऊ है। लेकिन तमाम तरह के औद्योगिक और अनौद्योगिक नालों का प्रदूषित पानी इन नदियों में गिरता रहता है और पानी आज पीने के लायक भी नहीं बचा है। कानपुर में गंगा और आगरा दिल्ली में यमुना का बुरा हाल सर्वविदित है। कभी प्राणदायिनी कही जाने वाली गंगा आज प्राण ले सकती है और इसके ज़िम्मेदार उन जगहों के नागरिक ही हैं न कि गंगा स्वयं। जिस तरीके से ज़मीन के पानी का दोहन हो रहा है और ज़मीन के पानी का स्तर नीचे गिर रहा है, आने वाले समय में पानी की भयावह कमी को नज़रअंदाज़ करना मुश्किल है।
हम लोग कारणों के बारे में काफी चर्चा कर सकते हैं लेकिन आज समस्या के निवारण के बारे में सोचना ज़रूरी है वरना समस्या इतनी विकराल हो सकती है कि कहीं देर न हो जाये और कुछ करने की गुंजाइश ही न रहे।
आज नागरिक को वृक्षारोपण करना चाहिये मसलन नीम, जामुन, आम, पीपल, बरगद, नींबू, अमरूद, शीशम इत्यादि पेड़ लगाने चाहियें जो कि छायादार हैं, पानी भी कम पीते हैं, और फल या औषधिदायक भी हैं और इसके के बारे में जागरूक हो जाये, सफाई के बारे में खुद सोचे, प्लास्टिक का प्रयोग कम से कम करे, खासतौर से पॉलीथीन के बैगों का। वाहनों का प्रदूषण कम करना नागरिक के साथ साथ सरकार की भी ज़िम्मेदारी है। दम घोंटू धुंआ और कान फाड़ू आवाज़ उगलते वाहनों पर प्रतिबंध लगाना अति आवश्यक है। प्रदूषण फैलाती औद्योगिक इकाइयों को या तो बन्द किया जाना चाहिए या फिर उनको कचरा निस्तारण संयंत्र लगाने को बाध्य करना चाहिये अथवा तगड़े दंड लगाने चाहिये। इन सबको पाने के लिये ज़रूरत है पर्यावरण के प्रति जागरूकता की और उसको फैलाना हम सबका काम है।
किसी ने सच ही कहा है कि हमारा संसार एक जीते जागते सांस लेते जीव के समान है (like a living microcosm) और अगर इसको उचित पर्यावरण न दिया गया तो ये नष्ट हो जायेगा और इसके साथ हम सब भी। अब ये हमारे ऊपर है कि हम पर्यावरण को बनायें या बिगाड़ें। देश और दुनिया का सर्वांगींण विकास पर्यावरण को अच्छा बनाये रखने से ही होगा, न कि बिगाड़ने से, और आज के युग में तो ये पहले की अपेक्षा आसान है क्योंकि आज पर्यावरण को साफ रखने वाली तकनीकें उपलब्ध हैं। इस मामले में पश्चिमी देशों के विकास और पर्यावरण पर प्रयासों से हम सबक ले सकते हैं।
जहां तक भारत की बात है तो प्रदूषण आज की विकराल समस्या है और वैश्वीकरण की तेज़ रफ़्तार में आज खतरा इस बात का है समस्या कहीं इतनी बड़ी न हो जाये कि हल करने में देर हो जाये या हल की गुंजाइश ही न रहे। भारत का सौभाग्य है कि जनसंख्या के बढ़ते बोझ और पेड़ों की अंधाधुंध कटाई के बावज़ूद भारत में अभी भी काफी विशाल वन क्षेत्र (पूरे भू-भाग का करीब 20 प्रतिशत) है जिससे कि हमको अच्छी हवा नसीब होती रहती है और जलवायु इस तरह की है कि बड़े बड़े पेड़ जैसे कि नीम, आम, पीपल, बरगद, गुलमोहर इत्यादि आसानी से लगाये जा सकते हैं जिनसे अच्छी छाया मिलती है और इन पेड़ों में औषधीय गुण भी हैं या फल भी देते हैं। याद रखना चाहिये कि स्वतंत्रता के बाद से जनसंख्या के बढ़ते बोझ और अन्य कारणों ने भारत का वन क्षेत्र काफ़ी कम किया है। और साथ साथ लोगों ने शहरों में पेड़ लगाने ही बन्द कर दिये हैं। शहरों में अगर किसी का घर देखें तो पाइयेगा कि पूरा घर पक्का होता है, पेड़ पौधों की संख्या काफी कम होती है।
भारत के महानगरों, खासतौर से दूसरे स्तर के शहर जैसे कि कानपुर, लखनऊ, बनारस, में पेड़ों की बढ़ती कमी, धुंआ फेंकते वाहन जैसे कि टैम्पू, ट्रैक्टर, ट्रक इत्यादि, वाहनों में प्रेशर हार्न व उनका अंधाधुंध बिना सोचा समझा प्रयोग हर तरह के प्रदूषण को बढ़ावा दे रहा है। साथ साथ जैविक और अजैविक कचरे का कोई भी इंतज़ाम नहीं है। कूड़े के निस्तारण की कोई व्यवस्था न होने से कूड़ा शहर में जमा होता रहता है और तमाम बीमारियों का कारण बनता है, और इसके शिकार ज़्यादातर गरीब लोग या झुग्गी झोपड़ियों में रहने वाले ही होते हैं। कानपुर जैसे शहर जो कि नदियों के किनारे बसे हैं, काफी समृद्ध हो सकते हैं क्योंकि यहां ज़मीन उपजाऊ है। लेकिन तमाम तरह के औद्योगिक और अनौद्योगिक नालों का प्रदूषित पानी इन नदियों में गिरता रहता है और पानी आज पीने के लायक भी नहीं बचा है। कानपुर में गंगा और आगरा दिल्ली में यमुना का बुरा हाल सर्वविदित है। कभी प्राणदायिनी कही जाने वाली गंगा आज प्राण ले सकती है और इसके ज़िम्मेदार उन जगहों के नागरिक ही हैं न कि गंगा स्वयं। जिस तरीके से ज़मीन के पानी का दोहन हो रहा है और ज़मीन के पानी का स्तर नीचे गिर रहा है, आने वाले समय में पानी की भयावह कमी को नज़रअंदाज़ करना मुश्किल है।
हम लोग कारणों के बारे में काफी चर्चा कर सकते हैं लेकिन आज समस्या के निवारण के बारे में सोचना ज़रूरी है वरना समस्या इतनी विकराल हो सकती है कि कहीं देर न हो जाये और कुछ करने की गुंजाइश ही न रहे।
आज नागरिक को वृक्षारोपण करना चाहिये मसलन नीम, जामुन, आम, पीपल, बरगद, नींबू, अमरूद, शीशम इत्यादि पेड़ लगाने चाहियें जो कि छायादार हैं, पानी भी कम पीते हैं, और फल या औषधिदायक भी हैं और इसके के बारे में जागरूक हो जाये, सफाई के बारे में खुद सोचे, प्लास्टिक का प्रयोग कम से कम करे, खासतौर से पॉलीथीन के बैगों का। वाहनों का प्रदूषण कम करना नागरिक के साथ साथ सरकार की भी ज़िम्मेदारी है। दम घोंटू धुंआ और कान फाड़ू आवाज़ उगलते वाहनों पर प्रतिबंध लगाना अति आवश्यक है। प्रदूषण फैलाती औद्योगिक इकाइयों को या तो बन्द किया जाना चाहिए या फिर उनको कचरा निस्तारण संयंत्र लगाने को बाध्य करना चाहिये अथवा तगड़े दंड लगाने चाहिये। इन सबको पाने के लिये ज़रूरत है पर्यावरण के प्रति जागरूकता की और उसको फैलाना हम सबका काम है।
किसी ने सच ही कहा है कि हमारा संसार एक जीते जागते सांस लेते जीव के समान है (like a living microcosm) और अगर इसको उचित पर्यावरण न दिया गया तो ये नष्ट हो जायेगा और इसके साथ हम सब भी। अब ये हमारे ऊपर है कि हम पर्यावरण को बनायें या बिगाड़ें। देश और दुनिया का सर्वांगींण विकास पर्यावरण को अच्छा बनाये रखने से ही होगा, न कि बिगाड़ने से, और आज के युग में तो ये पहले की अपेक्षा आसान है क्योंकि आज पर्यावरण को साफ रखने वाली तकनीकें उपलब्ध हैं। इस मामले में पश्चिमी देशों के विकास और पर्यावरण पर प्रयासों से हम सबक ले सकते हैं।


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