Friday, April 28, 2006

भारत के घर

उत्तर भारत और दक्षिण भारत के घरों की बनावट में काफ़ी अन्तर होता है। उत्तर भारत में मकान जहां सटे हुये और सपाट छत के होते हैं वहीं दक्षिण के कई इलाकों जैसे कि गोवा में घर झोपड़ीनुमा होते हैं। उत्तर भारत के सटे हुये घरों में हवा आने-जाने की जगह बहुत होती है और घर में कच्ची जगह का अभाव होता है। आमतौर पर जितना अमीर इन्सान, उतना ही घर में सीमेंट। मैं गोवा में पाया कि वहां के घर सटे हुये नहीं होते हैं, एक घर भी जमीन के लगभग बीच में होता है और आसपास ३०-४० प्रतिशत जगह खाली और कच्ची होती है जहां आमतौर पर पेड़ पौधे लगे रहते हैं।

उत्तर भारत में शहरों के घरों में हर जगह पक्की ज़मीन के कई दुश्परिणाम हो सकते हैं क्योकि वर्षा जल तो ज़मीन के अन्दर जाने की जगह नालों में चला जाता है जो कि खुद भी सीमेंट के पाइपों के बने होते हैं और मेरे खयाल से इसकी वजह से भूकम्प, पानी का स्तर जैसी समस्यायें बढ़ सकती हैं। सटे हुये और चिपके हुये मकानों में हवा का आवागमन कम होने से सांस की बीमारियां होना संभव हैं।

उत्तर भारत के शहरों में जिस प्रकार से हरियाली का ह्रास हो रहा है, वो एक चिंता का विषय है।मकान बनवाते समय इस बात का ध्यान रखा जाना आवश्यक है कि घर में करीब ३०-४० प्रतिशत जगह कच्ची हो और वहां पेड़ पौधे लगे हों। थोड़े छोटे कमरों में रहने से उतनी समस्या नहीं है जितनी कि हरियाली के न होने से है और उनके हवादार न होने से है।

यही बदहाली का आलम मैंने अपनी हाल ही की नैनीताल यात्रा के दौरान देखा। पहाड़ों पर सपाट छत के घर बनाना बहुत ही खतरनाक है पर शायद मकान बनवाते समय लोगों की निगाह कुछ और मुद्दों पर रहती है। पहाड़ों पर झुग्गी झोपड़ियों की तरह सटे हुये घर बनाना और बहुमंजिली इमारत बनाना तो और भी खतरनाक है क्योंकि वहां भूस्खलन एक आम बात है। स्थानीय निवासियों से बातचीत के बाद चला कि हाल ही में एक बहुमंजिली इमारत का भूस्खलन से सफाया हो गया, मैंने उस जगह को देखा तो ऐसा लगता ही नहीं था कि वहां कुछ था।

लगता है प्रकृति भी हमसे हमारे किये का सही बदला लेती है।

Friday, April 21, 2006

तरबूज की शराब

बहुत समय से वाइन बनाने का सोच रहा था, आज मुहूर्त निकल ही आया। कानपुर में एक मर्तबान भी मिल गया, यीस्ट भी मिल गया और सोडियम मेटाबाइसल्फ़ाइट भी। परन्तु लाल अंगूर का मौसम खतम हो चुका है इसलिये निराशा हुई। पर उसी समय खयाल आया कि क्यों न तरबूज की बनायी जाये, तरबूज की अच्छी महक भी होती है और मीठा भी होता है इसलिये एल्कोहल न बनने का चक्कर भी नहीं है। तो अब मैं निकलता हूं, जब बन जायेगी तो आपको ब्लॉग के द्वारा चखा दूंगा ;-)

Friday, April 14, 2006

धर्म का महत्व


अब जब धर्म के महत्व की बारी आयी है तो मरा मानना है कि धर्म एक तरह का ज़हर है, मानसिक विष है। धर्म के प्रतिपादकों का आध्यात्मिकता से कोई वास्ता नहीं था। धर्म लोगों को बांटने के काम आता है न कि जोड़ने के। लोगों के मन में अलगाव के बीज डालता है, अपने धर्म को मानने वाली कौम की श्रेष्ठता की भावना डालता है।

इस दुनिया में आदमी पहले आया था न कि धर्म, और इसलिये अगर कोई धर्म जैसी चीज़ है तो वो है इंसानियत न कि हिन्दू या मुसलमान या ईसाई। ये सारे तो आडम्बर और रीति रिवाज़ों वाले धर्म हैं जो लोग एक दूसरे के ऊपर थोप रहे हैं, इनको मानने वाले ज़्यादातर लोगों का इंसानियत से कोई लेना देना नहीं है, ज़रूरत पड़ने पर ये लोग एक दूसरे की गर्दन उड़ा सकते हैं, इतिहास गवाह है।