Saturday, July 15, 2006

बनारस यात्रा के दृश्य

बनारस के घाट का सूर्यास्त के बाद का दृश्य

घाटों पर हो रही पूजा


घाट की पूजा और सजावट (कम रोशनी में)




ये सब फोटो चलती नाव से लिये गये थे इसलिये थोड़ी सी हिल सी गयीं हैं
कैमरा: कैनन पॉवरशॉट S30

Friday, July 14, 2006

हाल की उड़ीसा यात्रा की कुछ तस्वीरें

१९-२३ जून २००६ तक मैं उड़ीसा घूमने गया था और वहां भुवनेश्वर, चिलिका झील, पुरी और कोणार्क गया था। कुल मिलाकर उड़ीसा बहुत ही सुन्दर प्रदेश है। काफ़ी हरा भरा है, साफ सुथरा भी है, और सबसे बड़ी बात वहां के प्राकृतिक नज़ारों की जगहें पर्यटकों द्वारा फैलायी गयी गंदगी से काफ़ी हद तक दूर हैं।

वहां की कुछ तस्वीरें नीचे लगायी हैं।

भुबनेश्वर की खण्डगिरि गुफायें जहां बुद्ध भिक्षु बैठ कर ध्यान करते थे


भुबनेश्वर स्थित बुद्ध भगवान का मंदिर जिसे जापानी मंदिर भी कहते हैं (जापानियों द्वारा निर्मित)


भुबनेश्वर से थोड़ी दूर चिलिका झील में एक द्वीप का मनोरम दृश्य


पुरी का समुद्र तट

पुरी से कोणार्क के रास्ते में एक नदी का मनोरम दृश्य

नदी के किनारे एक सुन्दर मकान (काश हम भी यहीं रह रहे होते)

रास्ते में एक मूर्तिकार द्वारा बनायी गयीं कुछ मूर्तियां

कोणार्क मंदिर के सामने से ली गयी तस्वीर (मंदिर की ऊंचायी करीब ११० फ़ीट है, और मंदिर सम ११०० ईसवी में बनाया गया था)

मंदिर के पीछे का दृश्य (पीछे का मंदिर २२० फ़ीट ऊंचा था जो करीब २०० साल पहले आये एक चक्रवात में ध्वस्त हो गया था)

मंदिर का किनारे से लिया गया दृश्य
सूर्य घड़ी जो कि काफ़ी सही समय बताती है

मंदिर की दीवारों पर खोदे गये कामसूत्र के कुछ दृश्य

Wednesday, July 12, 2006

बनारस यात्रा

इस बार पत्नी ने सप्ताहांत पर बनारस जाने के लिये कहा। पहले तो रेलगाड़ी से जाने का कार्यक्रम था लेकिन फिर जब रेलों में आरक्षण की स्थिति देखी तो कार से जाने का मन बनाया। कार से निकले सुबह पांच बजे। और पहले पहुंचे कानपुर के बाहर और बाहर निकलते ही रिलायंस का A-1 ढाबा मिला जो कि काफ़ी अच्छा है। रिलायंस के ढाबे तक की सड़क भी चारलेन है जिस पर कि चलाने में मस्त मज़ा आता है। कार से सौ की रफ़्तार तो आम है। वहां जाकर सुना कि अब वहां पेट्रोल कोई नहीं भराता है क्योंकि उनका पेट्रोल महंगा है। पर लोग खाना नाश्ता करने के लिये रूकते हैं । वहां काफ़ी सफाई है और खाना भी अच्छा है। पार्किंग के लिये बहुत जगह है लेकिन हमारे हिन्दुस्तानी लोग तो पार्किंग में पार्क न करने के आदी हैं, लिहाज़ा रेस्टोरेंट के सामने की खड़ी कर देते हैं। रिलायंस के कर्मचारी लोग बोलते हैं तो भी फरक नहीं पड़ता है। शायद आर्थिक दंड से फरक पड़े।

खैर वहां से निकले तो रास्ते में फतेहपुर के नज़दीक पहुंचते ही चारलेन रस्ता एकलेन में बदल गया जिसमें खूब गहरे गड्ढे भी थे। उस सड़क पर रफ़्तार ३० के आसपास ही रहती है। पूरा फतेहपुर खराब सड़कों से पटा पड़ा है। कहने को तो ये पूर्व प्रधानमंत्री वी पी सिंह का इलाका है लेकिन काफ़ी पिछड़ा है। करीब ३०-४० किमी का रस्ता खराब था। फिर आगे चारलेन आ गया और फिर से हम उड़ने लगे। कौशाम्बी पहुंचते ही चारलेन फिर से एकरस्ते में बदल गया पर सड़क ठीकठाक थी इसलिये बहुत खराब नहीं लगा, लेकिन इन एक सड़क रास्तों पर ट्रक, जीप , रोडवेज बस, और टैंपू वाले काफ़ी खतरनाक तरीके से चलाते हैं इसलिये आमने सामने की टक्कर का काफ़ी खतरा रहता है। कौशाम्बी में लगा ही नहीं कि कभी ये बुद्धों के लिये महत्वपूर्ण स्थान था। फिर पहुंचे इलाहाबाद जिसके बाहर निकलने में लग गया डेढ़ घंटा।

इलाहाबाद के बाहर बनारस के रास्ते में एक पुल पड़ता है जो कि गंगा के ऊपर बना है और उससे गंगा बहुत खूबसूरत लगती है। इलाहाबाद से बनारस का आधा रास्ता एकदम खराब है और ज़्यादातर समय यहीं बरबाद होता है। आधे रास्ते में लगते हैं एक घंटे और बाकी के रास्ते में एक घंटा। पता चलता है कि अच्छी सड़कें समय को कितना बचाती हैं। खराब सड़कों की वजह से गाड़ी रुक रुक के चलने से खूब पेट्रोल भी पीती है, धूल भी उड़ती है और कीचड़ भी होती है। बनारस के पहले का करीब पचास किमी लगभग चारलेन है और उसमें बहुत मज़ा आया। लेकिन मज़े की बात ये है कि बनारस के आने पर रास्ते में एक भी बोर्ड ये इंगित नहीं करता है कि बनारस आ गया है। चूंकि ये सड़क बनारस के किनारे से निकल जाती है इसलिये अगर आपको पहले से पता न हो तो आप शायद चलते चले जायें जैसा कि मेरे साथ हुआ। करीब चालीस किमी आगे चलने के बाद जब शक हुआ तो पता किया और मालूम हुआ कि बनारस तो पीछे है। खैर फिर लौट के बनारस पहुंचे।

बनारस वैसे तो आध्यात्मिक शहर माना जाता रहा है, लेकिन मेरा ये पहली यात्रा थी उस तरफ। बनारस बहुत साफ शहर तो नहीं है, कानपुर शायद बेहतर है। सड़कें टूटी हैं और घाट गंदे हैं। गंगा का भी बुरा हाल है। गंगा में मल, मूत्र, नालों का पानी, लाश और सब कुछ जाता है। मोक्षदायिनी गंगा अब शायद वो नहीं रही। बरसात में सड़कें नाले बन जाती हैं। कुल मिलाकर बहुत अच्छा नहीं लगा बनारस। लगा कि अगर सड़कें, नालियां और यातायात दुरुस्त हो जाये तो बनारस एक बहुत अच्छा शहर बन जायेगा, क्योंकि ये एक महानगर नहीं है और लोगों के पास जीवन जीने के लिये समय भी है। और साथ साथ घूमने के लिये भी अच्छा हो जायेगा। लेकिन बनारसी पान और मिठाइयां काफ़ी अच्छी हैं।

कुछ चित्र लिये थे जो कि अगले चिट्ठे में डालूंगा। अभी कैमरे से कंप्यूटर पर स्थानांतरित करना है।

Thursday, July 06, 2006

तरबूज की वाइन बनाने की विधि

कुछ मित्रों के कहने पर मैं तरबूज की वाइन बनाने की विधि लिख रहा हूं:

सामग्री:

  • एक बड़ा तरबूज (करीब 7-8 किलो का)
  • ढाई किलो शक्कर
  • यीस्ट
  • सोडियम मेटाबाइसल्फाइट,
  • एक बड़ा मर्तबान जिसकी गर्दन संकरी हो और उसमें ऊपर से ढक्कन अच्छे से फिट होता हो,
  • वाटर लॉक (एक U-आकार की ट्यूब जिसमें पानी ऐसे डालना चाहिये कि पानी न तो वाइन के अन्दर जाये और न ही खुद बाहर जाये, बस ऑक्सीजन को अंदर जाने से रोके और वाइन बनने की प्रक्रिया में पैदा हुई गैस को निकालने के लिये), ट्यूब को ढक्कन के बीच में ट्यूब के आकार का छेद करके उसमें फिट करना पड़ेगा
  • टैनिन (वाइन में टैन्जी स्वाद पैदा करने के लिये)- वैकल्पिक
  • हाइड्रोमीटर
  • थोड़ा सा धैर्य
विधि:
1. पहले तरबूज को काट लें। काट के तरबूज के गूदे को अच्छे से मसल के उसका जितना संभव हो उतना जूस निकाल लें। 8 किलो के तरबूज से करीब 4 लीटर जूस निकलेगा। जूस में शक्कर मिला कर घोल लें। शक्कर ज़रूरी है क्योंकि तरबूज का जूस ज़्यादा मीठा नहीं होता है इसलिये बिना शक्कर के अल्कोहल की मात्रा कम बनती है। जूस को अच्छे से छान लें ताकि बीज और रेशे न रहें।

2. मर्तबान को उबले हुये ठंडे किये पानी में सोडियम मेटाबाइसल्फाइट डाल के साफ कर लें।

3. अब २ चम्मच यीस्ट को एक कप शुष्म गर्म पानी में थोड़ा देर रख दें जिससे कि यीस्ट कार्यान्वित यानी एक्टीवेट हो जाये। आधे घन्टे में काफ़ी झाग पैदा हो जाता है।

4. अब शक्कर मिले हुये जूस को मर्तबान में भरकर उसमें यीस्ट डाल दें और मर्तबान की गर्दन पर एक कपड़ा अच्छे से बांध दें और मर्तबान को १२ घंटे के लिये अंधेरी और ठंडी (मतल जहां तापमान करीब २०-२५ सेंटीग्रेड के बीच हो) जगह पर रख दें। इस समय शुरुआती खमीरीकरण होगा।

5. १२ घंटे बाद कपड़े को हटाकर उसकी जगह मर्तबान की गर्दन में कार्क कसकर लगा दें और कार्क के छेद में यू ट्यूब यानी वाटरलाक लगा दे और ट्यूब में इतना पानी भरें कि पानी अंदर न जाये और बाहर की ऑक्सीजन अंदर न जा सके। वाइन बनने के दौरान अंदर पैदा होने वाली गैस पानी के रास्ते बाहर चली जायेगी। अब इसको फिर से उसी ठंडी व अंधेरी जगह रख दें।

6. आप पायेंगे के शुरुआत के करीब एक हफ़्ते में मर्तबान में बहुत बुलबुले बनते हैं। इसका मतलब आपका यीस्ट ठीक से काम कर रहा है और अल्कोहल बन रहा है। करीब एक हफ़्ते बाद बुलबुले बनने की रफ़्तार मंद पड़ जायेगी और तीन हफ़्ते में एक दम बन्द हो जायेगी। मर्तबान को करीब डेढ़ महीने तक ऐसे ही रखा रहने दें। बीच बीच में वाटरलाक में पानी देखते रहें कि कही पानी खत्म न हो जाये और आपकी वाइन आक्सीडाइज न हो जाये। पानी के स्तर को बीच बीच में देखते रहना और भरते रहना आवश्यक है

7. डेढ़ दो महीने बाद आप पायेंगे कि जूस का ज़्यादातर मलबा नीचे जम गया है और ऊपर का द्रव काफ़ी पारदर्शी है। अब आपकी वाइन लगभग तैयार है।

8. अब मर्तबान का ढक्कन खोलकर तरल व पारदर्शी वाइन को सावधानी एक पतली रबर की स्टरलाइज़ की हुई ट्यूब से दूसरे स्टरलाइज किये बड़े बर्तन में स्थानान्तरित करें और इसमें एक छोटी चम्मच या स्वादानुसार टैनिन मिला लें और अच्छे से मिला लें। टैनिन मिलाने से पहले आप वाइन का अल्कोहल स्तर भी माप सकते हैं। इसको हाइड्रोमीटर से मापते हैं, उसमें एक सूचक होता है जो कि वाइन के घनत्व को दर्शाता है। घनत्व का मान वाइन के अल्कोहल स्तर से जुड़ा रहता है जिसको कि आप चार्ट पर देख सकते हैं।

हाइड्रोमीटर बनाने की विधि

9. मर्तबान में जमे मलबे को फेंककर और फिर उसको अच्छे से धोकर व स्टरलाइज़ करके उसमें टैनिन मिली वाइन को फिर से डाल लें।

10. फिर से मर्तबान में वाटरलाक लगा दें और वाइन को दो तीन महीने तक रख दें। दो तीन महीने के के बाद वाइन एक दम तैयार हो जायेगी और पीने लायक हो जायेगी। आप चाहें तो और ज़्यादा समप तक वाइन को मर्तबान में छोड़ सकते हैं। जितना ज़्यादा समय देंगे, उतनी ही अच्छी वाइन बनेगी।

11. फिर वाइन को निकाल कर रबर ट्यूब से निकाल कर गहरे रंग की वाइन की बोतलों में भर लें और कार्क लगा कर सील कर दें।

12. वाइन का आनंद लें और बतायें कि कैसी थी आपकी वाइन।