tag:blogger.com,1999:blog-8947177.post-1131807847489196302005-11-12T06:56:00.000-08:002005-11-12T22:24:33.336-08:00किसान और गांवमेरे घर में एक सज्जन माली का काम करते हैं। वो असल में उत्तर प्रदेश के एक गांव के किसान हैं जहां उनकी थोड़ी बहुत ज़मीन भी है, लेकिन शहर आ गये। आज ऐसे ही उनसे बात हो रही थी कि वो गांव से शहर में इतनी बदहाली की ज़िंदगी जीने क्यों आये हैं? क्यों वे गांव की साफ़ आवोहवा और बड़े मकान को छोड़ कर यहां तंग मकानों और गंदगी में रह रहे हैं। उसने उत्तर दिया कि गांव में खेती करना मंहगा पड़ता है। लागत भी वसूल नहीं होती है। खयाल आया कि कहां अमेरिका - यूरोप में किसान काफ़ी अमीर होते हैं और हमारे यहां ऐतिहासिक काल से किसान गरीब की श्रेणी में ही रहा है। बेचारा गरीब कृषक!!! ऐसे ही तो वर्णन हुआ है। आज़ादी के पहले और बाद में भी ज़मींदारों ने किसानों को ऐसा चूसा कि उनका किसानी से भी मन उठ गया। ऊपर से सरकार हमारे यहां किसानों को कोई सुविधा मुहैया कराने के बजाय उनको दी जाने वाली रियायतें भी कम करती जा रही है।<br /><br />क्या ये सही है कि जो किसान हमारा पेट भरते हैं, आज वही जीविका के लिये तरसते हैं। क्या हमारे समाज और सरकार को उनकी तरफ और ध्यान नहीं देना चाहिये? ये एक विडम्बना ही है कि हमारे देश में देशवासियों का पेट भरने वाले, उनकी टट्टी साफ करने वाले, उनके घरों को साफ रखने वालों को ही न्याय नहीं मिलता है, और साथ में बड़ी बड़ी बातें करते हैं धर्म, संस्कृति और पता नहीं किस किस की। है न दोगलापन।आशीषhttp://www.blogger.com/profile/15373573505567241038noreply@blogger.com