tag:blogger.com,1999:blog-8947177.post-1157615147420510022006-09-07T00:21:00.000-07:002006-09-09T04:40:29.620-07:00छात्र और शिक्षकअभी हाल में उज्जैन में एक शिक्षक की हत्या के मामले को टीवी पर काफ़ी सुना, और उसके बाद शिक्षक दिवस पर दुनिया भर के लोगों की बातें देखीं और सुनीं। मैंने भी सोचा कि शायद आज के सूचना की बहुतायत वाले युग में शिक्षक अर्थहीन हो गये हैं, काफ़ी सारे विद्यार्थी राजनीति का शिकार होकर उद्दंड हो गये हैं और पढ़ने का मतलब सिर्फ़ डिग्री लेने भर से है। पर शायद शिक्षकों के प्रति घटते सम्मान के कुछ और कारण हैं: पहले जो चीज़ केवल शिक्षक के माध्यम से ही मिल पाती थी, अब वो तमाम किताबों, इंटरनेट, पुस्तकालयों इत्यादि के माध्यम से उपलब्ध है। फिर भला अध्यापक की ज़रूरत क्यों पड़ने लगी? आखिर अधिकांश अध्यापक भी किताब और कुंजियों को रट कर ही तो पढ़ाते हैं, खुद मैंने भी बचपन की शिक्षा में यही महसूस किया था। शिक्षकों ने भी अपने पढ़ाने के तरीकों में कोई सुधार की ज़रूरत नहीं समझी। कालेजों की सुविधाओं भी समय के साथ कोई प्रगति नहीं हुई है, शायद ज़्यादातर जगहों पर ह्रास ही हुआ है। शिक्षा एक सीखने सिखाने की चीज़ न होकर प्रमाणपत्र बटोरने का माध्यम हो गयी है क्यों कि शायद छात्रों को कालेज में दी जाने वाली शिक्षा का कोई औचित्य या मूल्य समझ में नहीं आता है। ये भी हो सकता है कि कई सारे छात्र वो पढ़ या कर रहे हैं जो कि उनकी स्वाभाविक रूचियों के अनुकूल नहीं है।<br /><br />लेकिन जो लोग अपनी रूचियों के हिसाब से पढ़े हैं, उनके लिये मुझे अभी भी लगता है कि अगर बचपन में कुछ चीज़ों को अच्छे से समझाया गया होता शायद उनमें से कई लोगों ने और भी अच्छा किया होता। मुझे लगता है कि किताब आपको एक हद तक ही सिखा सकती है। अच्छे अध्यापक आपको सोचना सिखाते हैं, सोचने का तरीका विकसित करते हैं, किताबों की दुनिया से हटकर कुछ सिखाते हैं। रिचर्ड फेनमेन, विख्यात अमेरिकी भौतिकविज्ञानी और नोबल पुरुस्कार विजेता, एक बहुत ही कुशल अध्यापक थे और वे अपने अध्यापन के तरीके के लिये विश्वविख्यात हैं। वो भौतिकी की बारीकियों को इतने अच्छे से समझाते थे कि अच्छी से अच्छी किताबें भी उनका सामना नहीं कर पाती थीं, यहां तक कि उनके खुद के लेक्चर नोट्स भी नहीं।<br /><br />पर आज के ज़माने में, खासतौर पर भारत में जहां सामाजिक दबाब बहुत ज़्यादा है, एक विडम्बना है और वो ये कि आज लोग अपने बच्चों को अच्छी से अच्छी शिक्षा मुहैया कराना चाहते हैं पर अपने बच्चों को एक अच्छा शिक्षक, वैज्ञानिक (या दार्शनिक या लेखक) बनने के लिये प्रेरित नहीं करते हैं क्योंकि शिक्षक या वैज्ञानिक का पेशा कम तनख्वाह का है। बात भी सही है, भाई कम पैसे में किसका घर चलता है? अब गुरु द्रोण या पतंजलि या पाणिणि वाले ज़माने तो लद चुके हैं तो अब सरकार या राजाओं की भी ज़िम्मेदारी नहीं है कि शिक्षकों का पेट भरे। अब या तो शिक्षक कोचिंग करके पेट भरें या फिर कुछ और करें। उस पर भी लोग बोलते हैं देखो कोचिंग पढ़ा रहा है, कॉलेज में तो पढ़ाया नहीं जाता। हालांकि मैं कालेज में न पढ़ाने को सही नहीं ठहरा रहा हूं।<br /><br />लोग सम्मान के बारे में भी बोलते हैं कि आजकल शिक्षकों को सिष्य सम्मान नहीं देते। शिक्षकों के लिये पूछने वाली बात ये है कि क्या सम्मान मांगा जाता है? और शिष्यों के लिये सवाल ये है कि सम्मान क्यों करना चाहिये?<br /><br />शिक्षा और शिक्षकों के बारे में इन आजकल चल रही चर्चाओं से कुछ सवाल उठते हैं:<br /><br />- शिक्षा के दौर में क्या मायने है? क्या कक्षा में दी जाने वाली शिक्षा महत्वपूर्ण नहीं रह गयी है ?<br />- क्या आज सूचना के साधनों की बहुतायत के युग में शिक्षकों की ज़रूरत कम हो गयी है ?<br />- क्या ब्लैकबोर्ड अध्यापन का महत्व अब कम हो गया है?<br />- क्या अच्छे शिक्षक बनाने के लिये शिक्षकों को अच्छा वेतन मिलना आवश्यक नहीं है ?<br />- क्या शिक्षकों और शिष्यों के बीच प्रोफ़ेशनल सम्बन्ध होने चाहिये या फिर सम्मान के भाव वाले (गुरुः ब्र्ह्मा गुरुः विष्णु-------------------? वाले)<br />- क्या शिक्षकों को सिर्फ़ पढ़ाने तक ही सीमित रहना चाहिये या फिर शोध भी शिक्षण का एक अंग होना चाहिये जिससे कि शिक्षा स्वादहीन या बोरियत वाला व्यवसाय न रहे?<br />- क्या शिक्षकों को भी पढ़ाने के तौर तरीकों के बारे में समय समय पर सोचविचार करना चाहिये और समय के साथ अपने तरीकों में बदलाव लाने चाहिये?<br /><br />और भी कई सारे सवाल हैं जो कि मैंने नहीं लिखे हैं। पर यदि हम आगे आने वाली पीढ़ी को भारत के सामाजिक, बौद्धिक और वैज्ञानिक निर्माण के लिये उपयुक्त बनाना चाहते हैं तो इन सब सवालों पर एक बहस ज़रूरी है और उसके बाद सवालों के हल खोजना, उपयुक्त नीतियां बनाना और उन पर अमल करना भी आवश्यक है। अगर ये सब हो सका तो शिक्षा, शिक्षक और विद्यार्थियों में अच्छा तालमेल बन सकेगा, और शायद शिक्षक दिवस मनाने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी।आशीषhttp://www.blogger.com/profile/15373573505567241038noreply@blogger.com