Friday, November 10, 2006
Saturday, October 14, 2006
पर्यावरण और भारत
अभी हाल ही में टाइम पत्रिका में कानपुर को विश्व के सबसे प्रदूषित शहरों में बताया गया (कड़ी और चित्रावली) । पत्रिका में एशिया के अन्य शहरों के बारे में भी चिन्ता व्यक्त की गयी है, मसलन चीन के कई शहर काफ़ी प्रदूषित हैं।
जहां तक भारत की बात है तो प्रदूषण आज की विकराल समस्या है और वैश्वीकरण की तेज़ रफ़्तार में आज खतरा इस बात का है समस्या कहीं इतनी बड़ी न हो जाये कि हल करने में देर हो जाये या हल की गुंजाइश ही न रहे। भारत का सौभाग्य है कि जनसंख्या के बढ़ते बोझ और पेड़ों की अंधाधुंध कटाई के बावज़ूद भारत में अभी भी काफी विशाल वन क्षेत्र (पूरे भू-भाग का करीब 20 प्रतिशत) है जिससे कि हमको अच्छी हवा नसीब होती रहती है और जलवायु इस तरह की है कि बड़े बड़े पेड़ जैसे कि नीम, आम, पीपल, बरगद, गुलमोहर इत्यादि आसानी से लगाये जा सकते हैं जिनसे अच्छी छाया मिलती है और इन पेड़ों में औषधीय गुण भी हैं या फल भी देते हैं। याद रखना चाहिये कि स्वतंत्रता के बाद से जनसंख्या के बढ़ते बोझ और अन्य कारणों ने भारत का वन क्षेत्र काफ़ी कम किया है। और साथ साथ लोगों ने शहरों में पेड़ लगाने ही बन्द कर दिये हैं। शहरों में अगर किसी का घर देखें तो पाइयेगा कि पूरा घर पक्का होता है, पेड़ पौधों की संख्या काफी कम होती है।
भारत के महानगरों, खासतौर से दूसरे स्तर के शहर जैसे कि कानपुर, लखनऊ, बनारस, में पेड़ों की बढ़ती कमी, धुंआ फेंकते वाहन जैसे कि टैम्पू, ट्रैक्टर, ट्रक इत्यादि, वाहनों में प्रेशर हार्न व उनका अंधाधुंध बिना सोचा समझा प्रयोग हर तरह के प्रदूषण को बढ़ावा दे रहा है। साथ साथ जैविक और अजैविक कचरे का कोई भी इंतज़ाम नहीं है। कूड़े के निस्तारण की कोई व्यवस्था न होने से कूड़ा शहर में जमा होता रहता है और तमाम बीमारियों का कारण बनता है, और इसके शिकार ज़्यादातर गरीब लोग या झुग्गी झोपड़ियों में रहने वाले ही होते हैं। कानपुर जैसे शहर जो कि नदियों के किनारे बसे हैं, काफी समृद्ध हो सकते हैं क्योंकि यहां ज़मीन उपजाऊ है। लेकिन तमाम तरह के औद्योगिक और अनौद्योगिक नालों का प्रदूषित पानी इन नदियों में गिरता रहता है और पानी आज पीने के लायक भी नहीं बचा है। कानपुर में गंगा और आगरा दिल्ली में यमुना का बुरा हाल सर्वविदित है। कभी प्राणदायिनी कही जाने वाली गंगा आज प्राण ले सकती है और इसके ज़िम्मेदार उन जगहों के नागरिक ही हैं न कि गंगा स्वयं। जिस तरीके से ज़मीन के पानी का दोहन हो रहा है और ज़मीन के पानी का स्तर नीचे गिर रहा है, आने वाले समय में पानी की भयावह कमी को नज़रअंदाज़ करना मुश्किल है।
हम लोग कारणों के बारे में काफी चर्चा कर सकते हैं लेकिन आज समस्या के निवारण के बारे में सोचना ज़रूरी है वरना समस्या इतनी विकराल हो सकती है कि कहीं देर न हो जाये और कुछ करने की गुंजाइश ही न रहे।
आज नागरिक को वृक्षारोपण करना चाहिये मसलन नीम, जामुन, आम, पीपल, बरगद, नींबू, अमरूद, शीशम इत्यादि पेड़ लगाने चाहियें जो कि छायादार हैं, पानी भी कम पीते हैं, और फल या औषधिदायक भी हैं और इसके के बारे में जागरूक हो जाये, सफाई के बारे में खुद सोचे, प्लास्टिक का प्रयोग कम से कम करे, खासतौर से पॉलीथीन के बैगों का। वाहनों का प्रदूषण कम करना नागरिक के साथ साथ सरकार की भी ज़िम्मेदारी है। दम घोंटू धुंआ और कान फाड़ू आवाज़ उगलते वाहनों पर प्रतिबंध लगाना अति आवश्यक है। प्रदूषण फैलाती औद्योगिक इकाइयों को या तो बन्द किया जाना चाहिए या फिर उनको कचरा निस्तारण संयंत्र लगाने को बाध्य करना चाहिये अथवा तगड़े दंड लगाने चाहिये। इन सबको पाने के लिये ज़रूरत है पर्यावरण के प्रति जागरूकता की और उसको फैलाना हम सबका काम है।
किसी ने सच ही कहा है कि हमारा संसार एक जीते जागते सांस लेते जीव के समान है (like a living microcosm) और अगर इसको उचित पर्यावरण न दिया गया तो ये नष्ट हो जायेगा और इसके साथ हम सब भी। अब ये हमारे ऊपर है कि हम पर्यावरण को बनायें या बिगाड़ें। देश और दुनिया का सर्वांगींण विकास पर्यावरण को अच्छा बनाये रखने से ही होगा, न कि बिगाड़ने से, और आज के युग में तो ये पहले की अपेक्षा आसान है क्योंकि आज पर्यावरण को साफ रखने वाली तकनीकें उपलब्ध हैं। इस मामले में पश्चिमी देशों के विकास और पर्यावरण पर प्रयासों से हम सबक ले सकते हैं।
जहां तक भारत की बात है तो प्रदूषण आज की विकराल समस्या है और वैश्वीकरण की तेज़ रफ़्तार में आज खतरा इस बात का है समस्या कहीं इतनी बड़ी न हो जाये कि हल करने में देर हो जाये या हल की गुंजाइश ही न रहे। भारत का सौभाग्य है कि जनसंख्या के बढ़ते बोझ और पेड़ों की अंधाधुंध कटाई के बावज़ूद भारत में अभी भी काफी विशाल वन क्षेत्र (पूरे भू-भाग का करीब 20 प्रतिशत) है जिससे कि हमको अच्छी हवा नसीब होती रहती है और जलवायु इस तरह की है कि बड़े बड़े पेड़ जैसे कि नीम, आम, पीपल, बरगद, गुलमोहर इत्यादि आसानी से लगाये जा सकते हैं जिनसे अच्छी छाया मिलती है और इन पेड़ों में औषधीय गुण भी हैं या फल भी देते हैं। याद रखना चाहिये कि स्वतंत्रता के बाद से जनसंख्या के बढ़ते बोझ और अन्य कारणों ने भारत का वन क्षेत्र काफ़ी कम किया है। और साथ साथ लोगों ने शहरों में पेड़ लगाने ही बन्द कर दिये हैं। शहरों में अगर किसी का घर देखें तो पाइयेगा कि पूरा घर पक्का होता है, पेड़ पौधों की संख्या काफी कम होती है।
भारत के महानगरों, खासतौर से दूसरे स्तर के शहर जैसे कि कानपुर, लखनऊ, बनारस, में पेड़ों की बढ़ती कमी, धुंआ फेंकते वाहन जैसे कि टैम्पू, ट्रैक्टर, ट्रक इत्यादि, वाहनों में प्रेशर हार्न व उनका अंधाधुंध बिना सोचा समझा प्रयोग हर तरह के प्रदूषण को बढ़ावा दे रहा है। साथ साथ जैविक और अजैविक कचरे का कोई भी इंतज़ाम नहीं है। कूड़े के निस्तारण की कोई व्यवस्था न होने से कूड़ा शहर में जमा होता रहता है और तमाम बीमारियों का कारण बनता है, और इसके शिकार ज़्यादातर गरीब लोग या झुग्गी झोपड़ियों में रहने वाले ही होते हैं। कानपुर जैसे शहर जो कि नदियों के किनारे बसे हैं, काफी समृद्ध हो सकते हैं क्योंकि यहां ज़मीन उपजाऊ है। लेकिन तमाम तरह के औद्योगिक और अनौद्योगिक नालों का प्रदूषित पानी इन नदियों में गिरता रहता है और पानी आज पीने के लायक भी नहीं बचा है। कानपुर में गंगा और आगरा दिल्ली में यमुना का बुरा हाल सर्वविदित है। कभी प्राणदायिनी कही जाने वाली गंगा आज प्राण ले सकती है और इसके ज़िम्मेदार उन जगहों के नागरिक ही हैं न कि गंगा स्वयं। जिस तरीके से ज़मीन के पानी का दोहन हो रहा है और ज़मीन के पानी का स्तर नीचे गिर रहा है, आने वाले समय में पानी की भयावह कमी को नज़रअंदाज़ करना मुश्किल है।
हम लोग कारणों के बारे में काफी चर्चा कर सकते हैं लेकिन आज समस्या के निवारण के बारे में सोचना ज़रूरी है वरना समस्या इतनी विकराल हो सकती है कि कहीं देर न हो जाये और कुछ करने की गुंजाइश ही न रहे।
आज नागरिक को वृक्षारोपण करना चाहिये मसलन नीम, जामुन, आम, पीपल, बरगद, नींबू, अमरूद, शीशम इत्यादि पेड़ लगाने चाहियें जो कि छायादार हैं, पानी भी कम पीते हैं, और फल या औषधिदायक भी हैं और इसके के बारे में जागरूक हो जाये, सफाई के बारे में खुद सोचे, प्लास्टिक का प्रयोग कम से कम करे, खासतौर से पॉलीथीन के बैगों का। वाहनों का प्रदूषण कम करना नागरिक के साथ साथ सरकार की भी ज़िम्मेदारी है। दम घोंटू धुंआ और कान फाड़ू आवाज़ उगलते वाहनों पर प्रतिबंध लगाना अति आवश्यक है। प्रदूषण फैलाती औद्योगिक इकाइयों को या तो बन्द किया जाना चाहिए या फिर उनको कचरा निस्तारण संयंत्र लगाने को बाध्य करना चाहिये अथवा तगड़े दंड लगाने चाहिये। इन सबको पाने के लिये ज़रूरत है पर्यावरण के प्रति जागरूकता की और उसको फैलाना हम सबका काम है।
किसी ने सच ही कहा है कि हमारा संसार एक जीते जागते सांस लेते जीव के समान है (like a living microcosm) और अगर इसको उचित पर्यावरण न दिया गया तो ये नष्ट हो जायेगा और इसके साथ हम सब भी। अब ये हमारे ऊपर है कि हम पर्यावरण को बनायें या बिगाड़ें। देश और दुनिया का सर्वांगींण विकास पर्यावरण को अच्छा बनाये रखने से ही होगा, न कि बिगाड़ने से, और आज के युग में तो ये पहले की अपेक्षा आसान है क्योंकि आज पर्यावरण को साफ रखने वाली तकनीकें उपलब्ध हैं। इस मामले में पश्चिमी देशों के विकास और पर्यावरण पर प्रयासों से हम सबक ले सकते हैं।
Thursday, September 07, 2006
छात्र और शिक्षक
अभी हाल में उज्जैन में एक शिक्षक की हत्या के मामले को टीवी पर काफ़ी सुना, और उसके बाद शिक्षक दिवस पर दुनिया भर के लोगों की बातें देखीं और सुनीं। मैंने भी सोचा कि शायद आज के सूचना की बहुतायत वाले युग में शिक्षक अर्थहीन हो गये हैं, काफ़ी सारे विद्यार्थी राजनीति का शिकार होकर उद्दंड हो गये हैं और पढ़ने का मतलब सिर्फ़ डिग्री लेने भर से है। पर शायद शिक्षकों के प्रति घटते सम्मान के कुछ और कारण हैं: पहले जो चीज़ केवल शिक्षक के माध्यम से ही मिल पाती थी, अब वो तमाम किताबों, इंटरनेट, पुस्तकालयों इत्यादि के माध्यम से उपलब्ध है। फिर भला अध्यापक की ज़रूरत क्यों पड़ने लगी? आखिर अधिकांश अध्यापक भी किताब और कुंजियों को रट कर ही तो पढ़ाते हैं, खुद मैंने भी बचपन की शिक्षा में यही महसूस किया था। शिक्षकों ने भी अपने पढ़ाने के तरीकों में कोई सुधार की ज़रूरत नहीं समझी। कालेजों की सुविधाओं भी समय के साथ कोई प्रगति नहीं हुई है, शायद ज़्यादातर जगहों पर ह्रास ही हुआ है। शिक्षा एक सीखने सिखाने की चीज़ न होकर प्रमाणपत्र बटोरने का माध्यम हो गयी है क्यों कि शायद छात्रों को कालेज में दी जाने वाली शिक्षा का कोई औचित्य या मूल्य समझ में नहीं आता है। ये भी हो सकता है कि कई सारे छात्र वो पढ़ या कर रहे हैं जो कि उनकी स्वाभाविक रूचियों के अनुकूल नहीं है।
लेकिन जो लोग अपनी रूचियों के हिसाब से पढ़े हैं, उनके लिये मुझे अभी भी लगता है कि अगर बचपन में कुछ चीज़ों को अच्छे से समझाया गया होता शायद उनमें से कई लोगों ने और भी अच्छा किया होता। मुझे लगता है कि किताब आपको एक हद तक ही सिखा सकती है। अच्छे अध्यापक आपको सोचना सिखाते हैं, सोचने का तरीका विकसित करते हैं, किताबों की दुनिया से हटकर कुछ सिखाते हैं। रिचर्ड फेनमेन, विख्यात अमेरिकी भौतिकविज्ञानी और नोबल पुरुस्कार विजेता, एक बहुत ही कुशल अध्यापक थे और वे अपने अध्यापन के तरीके के लिये विश्वविख्यात हैं। वो भौतिकी की बारीकियों को इतने अच्छे से समझाते थे कि अच्छी से अच्छी किताबें भी उनका सामना नहीं कर पाती थीं, यहां तक कि उनके खुद के लेक्चर नोट्स भी नहीं।
पर आज के ज़माने में, खासतौर पर भारत में जहां सामाजिक दबाब बहुत ज़्यादा है, एक विडम्बना है और वो ये कि आज लोग अपने बच्चों को अच्छी से अच्छी शिक्षा मुहैया कराना चाहते हैं पर अपने बच्चों को एक अच्छा शिक्षक, वैज्ञानिक (या दार्शनिक या लेखक) बनने के लिये प्रेरित नहीं करते हैं क्योंकि शिक्षक या वैज्ञानिक का पेशा कम तनख्वाह का है। बात भी सही है, भाई कम पैसे में किसका घर चलता है? अब गुरु द्रोण या पतंजलि या पाणिणि वाले ज़माने तो लद चुके हैं तो अब सरकार या राजाओं की भी ज़िम्मेदारी नहीं है कि शिक्षकों का पेट भरे। अब या तो शिक्षक कोचिंग करके पेट भरें या फिर कुछ और करें। उस पर भी लोग बोलते हैं देखो कोचिंग पढ़ा रहा है, कॉलेज में तो पढ़ाया नहीं जाता। हालांकि मैं कालेज में न पढ़ाने को सही नहीं ठहरा रहा हूं।
लोग सम्मान के बारे में भी बोलते हैं कि आजकल शिक्षकों को सिष्य सम्मान नहीं देते। शिक्षकों के लिये पूछने वाली बात ये है कि क्या सम्मान मांगा जाता है? और शिष्यों के लिये सवाल ये है कि सम्मान क्यों करना चाहिये?
शिक्षा और शिक्षकों के बारे में इन आजकल चल रही चर्चाओं से कुछ सवाल उठते हैं:
- शिक्षा के दौर में क्या मायने है? क्या कक्षा में दी जाने वाली शिक्षा महत्वपूर्ण नहीं रह गयी है ?
- क्या आज सूचना के साधनों की बहुतायत के युग में शिक्षकों की ज़रूरत कम हो गयी है ?
- क्या ब्लैकबोर्ड अध्यापन का महत्व अब कम हो गया है?
- क्या अच्छे शिक्षक बनाने के लिये शिक्षकों को अच्छा वेतन मिलना आवश्यक नहीं है ?
- क्या शिक्षकों और शिष्यों के बीच प्रोफ़ेशनल सम्बन्ध होने चाहिये या फिर सम्मान के भाव वाले (गुरुः ब्र्ह्मा गुरुः विष्णु-------------------? वाले)
- क्या शिक्षकों को सिर्फ़ पढ़ाने तक ही सीमित रहना चाहिये या फिर शोध भी शिक्षण का एक अंग होना चाहिये जिससे कि शिक्षा स्वादहीन या बोरियत वाला व्यवसाय न रहे?
- क्या शिक्षकों को भी पढ़ाने के तौर तरीकों के बारे में समय समय पर सोचविचार करना चाहिये और समय के साथ अपने तरीकों में बदलाव लाने चाहिये?
और भी कई सारे सवाल हैं जो कि मैंने नहीं लिखे हैं। पर यदि हम आगे आने वाली पीढ़ी को भारत के सामाजिक, बौद्धिक और वैज्ञानिक निर्माण के लिये उपयुक्त बनाना चाहते हैं तो इन सब सवालों पर एक बहस ज़रूरी है और उसके बाद सवालों के हल खोजना, उपयुक्त नीतियां बनाना और उन पर अमल करना भी आवश्यक है। अगर ये सब हो सका तो शिक्षा, शिक्षक और विद्यार्थियों में अच्छा तालमेल बन सकेगा, और शायद शिक्षक दिवस मनाने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी।
लेकिन जो लोग अपनी रूचियों के हिसाब से पढ़े हैं, उनके लिये मुझे अभी भी लगता है कि अगर बचपन में कुछ चीज़ों को अच्छे से समझाया गया होता शायद उनमें से कई लोगों ने और भी अच्छा किया होता। मुझे लगता है कि किताब आपको एक हद तक ही सिखा सकती है। अच्छे अध्यापक आपको सोचना सिखाते हैं, सोचने का तरीका विकसित करते हैं, किताबों की दुनिया से हटकर कुछ सिखाते हैं। रिचर्ड फेनमेन, विख्यात अमेरिकी भौतिकविज्ञानी और नोबल पुरुस्कार विजेता, एक बहुत ही कुशल अध्यापक थे और वे अपने अध्यापन के तरीके के लिये विश्वविख्यात हैं। वो भौतिकी की बारीकियों को इतने अच्छे से समझाते थे कि अच्छी से अच्छी किताबें भी उनका सामना नहीं कर पाती थीं, यहां तक कि उनके खुद के लेक्चर नोट्स भी नहीं।
पर आज के ज़माने में, खासतौर पर भारत में जहां सामाजिक दबाब बहुत ज़्यादा है, एक विडम्बना है और वो ये कि आज लोग अपने बच्चों को अच्छी से अच्छी शिक्षा मुहैया कराना चाहते हैं पर अपने बच्चों को एक अच्छा शिक्षक, वैज्ञानिक (या दार्शनिक या लेखक) बनने के लिये प्रेरित नहीं करते हैं क्योंकि शिक्षक या वैज्ञानिक का पेशा कम तनख्वाह का है। बात भी सही है, भाई कम पैसे में किसका घर चलता है? अब गुरु द्रोण या पतंजलि या पाणिणि वाले ज़माने तो लद चुके हैं तो अब सरकार या राजाओं की भी ज़िम्मेदारी नहीं है कि शिक्षकों का पेट भरे। अब या तो शिक्षक कोचिंग करके पेट भरें या फिर कुछ और करें। उस पर भी लोग बोलते हैं देखो कोचिंग पढ़ा रहा है, कॉलेज में तो पढ़ाया नहीं जाता। हालांकि मैं कालेज में न पढ़ाने को सही नहीं ठहरा रहा हूं।
लोग सम्मान के बारे में भी बोलते हैं कि आजकल शिक्षकों को सिष्य सम्मान नहीं देते। शिक्षकों के लिये पूछने वाली बात ये है कि क्या सम्मान मांगा जाता है? और शिष्यों के लिये सवाल ये है कि सम्मान क्यों करना चाहिये?
शिक्षा और शिक्षकों के बारे में इन आजकल चल रही चर्चाओं से कुछ सवाल उठते हैं:
- शिक्षा के दौर में क्या मायने है? क्या कक्षा में दी जाने वाली शिक्षा महत्वपूर्ण नहीं रह गयी है ?
- क्या आज सूचना के साधनों की बहुतायत के युग में शिक्षकों की ज़रूरत कम हो गयी है ?
- क्या ब्लैकबोर्ड अध्यापन का महत्व अब कम हो गया है?
- क्या अच्छे शिक्षक बनाने के लिये शिक्षकों को अच्छा वेतन मिलना आवश्यक नहीं है ?
- क्या शिक्षकों और शिष्यों के बीच प्रोफ़ेशनल सम्बन्ध होने चाहिये या फिर सम्मान के भाव वाले (गुरुः ब्र्ह्मा गुरुः विष्णु-------------------? वाले)
- क्या शिक्षकों को सिर्फ़ पढ़ाने तक ही सीमित रहना चाहिये या फिर शोध भी शिक्षण का एक अंग होना चाहिये जिससे कि शिक्षा स्वादहीन या बोरियत वाला व्यवसाय न रहे?
- क्या शिक्षकों को भी पढ़ाने के तौर तरीकों के बारे में समय समय पर सोचविचार करना चाहिये और समय के साथ अपने तरीकों में बदलाव लाने चाहिये?
और भी कई सारे सवाल हैं जो कि मैंने नहीं लिखे हैं। पर यदि हम आगे आने वाली पीढ़ी को भारत के सामाजिक, बौद्धिक और वैज्ञानिक निर्माण के लिये उपयुक्त बनाना चाहते हैं तो इन सब सवालों पर एक बहस ज़रूरी है और उसके बाद सवालों के हल खोजना, उपयुक्त नीतियां बनाना और उन पर अमल करना भी आवश्यक है। अगर ये सब हो सका तो शिक्षा, शिक्षक और विद्यार्थियों में अच्छा तालमेल बन सकेगा, और शायद शिक्षक दिवस मनाने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी।
Saturday, July 15, 2006
Friday, July 14, 2006
हाल की उड़ीसा यात्रा की कुछ तस्वीरें
१९-२३ जून २००६ तक मैं उड़ीसा घूमने गया था और वहां भुवनेश्वर, चिलिका झील, पुरी और कोणार्क गया था। कुल मिलाकर उड़ीसा बहुत ही सुन्दर प्रदेश है। काफ़ी हरा भरा है, साफ सुथरा भी है, और सबसे बड़ी बात वहां के प्राकृतिक नज़ारों की जगहें पर्यटकों द्वारा फैलायी गयी गंदगी से काफ़ी हद तक दूर हैं।
वहां की कुछ तस्वीरें नीचे लगायी हैं।
भुबनेश्वर स्थित बुद्ध भगवान का मंदिर जिसे जापानी मंदिर भी कहते हैं (जापानियों द्वारा निर्मित)
पुरी का समुद्र तट
पुरी से कोणार्क के रास्ते में एक नदी का मनोरम दृश्य
नदी के किनारे एक सुन्दर मकान (काश हम भी यहीं रह रहे होते)
रास्ते में एक मूर्तिकार द्वारा बनायी गयीं कुछ मूर्तियां
कोणार्क मंदिर के सामने से ली गयी तस्वीर (मंदिर की ऊंचायी करीब ११० फ़ीट है, और मंदिर सम ११०० ईसवी में बनाया गया था)
मंदिर के पीछे का दृश्य (पीछे का मंदिर २२० फ़ीट ऊंचा था जो करीब २०० साल पहले आये एक चक्रवात में ध्वस्त हो गया था)

मंदिर का किनारे से लिया गया दृश्य
सूर्य घड़ी जो कि काफ़ी सही समय बताती है
मंदिर की दीवारों पर खोदे गये कामसूत्र के कुछ दृश्य
वहां की कुछ तस्वीरें नीचे लगायी हैं।
भुबनेश्वर स्थित बुद्ध भगवान का मंदिर जिसे जापानी मंदिर भी कहते हैं (जापानियों द्वारा निर्मित)
पुरी का समुद्र तट
पुरी से कोणार्क के रास्ते में एक नदी का मनोरम दृश्य
नदी के किनारे एक सुन्दर मकान (काश हम भी यहीं रह रहे होते)
रास्ते में एक मूर्तिकार द्वारा बनायी गयीं कुछ मूर्तियां
कोणार्क मंदिर के सामने से ली गयी तस्वीर (मंदिर की ऊंचायी करीब ११० फ़ीट है, और मंदिर सम ११०० ईसवी में बनाया गया था)
मंदिर के पीछे का दृश्य (पीछे का मंदिर २२० फ़ीट ऊंचा था जो करीब २०० साल पहले आये एक चक्रवात में ध्वस्त हो गया था)
मंदिर का किनारे से लिया गया दृश्य
सूर्य घड़ी जो कि काफ़ी सही समय बताती है
मंदिर की दीवारों पर खोदे गये कामसूत्र के कुछ दृश्य Wednesday, July 12, 2006
बनारस यात्रा
इस बार पत्नी ने सप्ताहांत पर बनारस जाने के लिये कहा। पहले तो रेलगाड़ी से जाने का कार्यक्रम था लेकिन फिर जब रेलों में आरक्षण की स्थिति देखी तो कार से जाने का मन बनाया। कार से निकले सुबह पांच बजे। और पहले पहुंचे कानपुर के बाहर और बाहर निकलते ही रिलायंस का A-1 ढाबा मिला जो कि काफ़ी अच्छा है। रिलायंस के ढाबे तक की सड़क भी चारलेन है जिस पर कि चलाने में मस्त मज़ा आता है। कार से सौ की रफ़्तार तो आम है। वहां जाकर सुना कि अब वहां पेट्रोल कोई नहीं भराता है क्योंकि उनका पेट्रोल महंगा है। पर लोग खाना नाश्ता करने के लिये रूकते हैं । वहां काफ़ी सफाई है और खाना भी अच्छा है। पार्किंग के लिये बहुत जगह है लेकिन हमारे हिन्दुस्तानी लोग तो पार्किंग में पार्क न करने के आदी हैं, लिहाज़ा रेस्टोरेंट के सामने की खड़ी कर देते हैं। रिलायंस के कर्मचारी लोग बोलते हैं तो भी फरक नहीं पड़ता है। शायद आर्थिक दंड से फरक पड़े।
खैर वहां से निकले तो रास्ते में फतेहपुर के नज़दीक पहुंचते ही चारलेन रस्ता एकलेन में बदल गया जिसमें खूब गहरे गड्ढे भी थे। उस सड़क पर रफ़्तार ३० के आसपास ही रहती है। पूरा फतेहपुर खराब सड़कों से पटा पड़ा है। कहने को तो ये पूर्व प्रधानमंत्री वी पी सिंह का इलाका है लेकिन काफ़ी पिछड़ा है। करीब ३०-४० किमी का रस्ता खराब था। फिर आगे चारलेन आ गया और फिर से हम उड़ने लगे। कौशाम्बी पहुंचते ही चारलेन फिर से एकरस्ते में बदल गया पर सड़क ठीकठाक थी इसलिये बहुत खराब नहीं लगा, लेकिन इन एक सड़क रास्तों पर ट्रक, जीप , रोडवेज बस, और टैंपू वाले काफ़ी खतरनाक तरीके से चलाते हैं इसलिये आमने सामने की टक्कर का काफ़ी खतरा रहता है। कौशाम्बी में लगा ही नहीं कि कभी ये बुद्धों के लिये महत्वपूर्ण स्थान था। फिर पहुंचे इलाहाबाद जिसके बाहर निकलने में लग गया डेढ़ घंटा।
इलाहाबाद के बाहर बनारस के रास्ते में एक पुल पड़ता है जो कि गंगा के ऊपर बना है और उससे गंगा बहुत खूबसूरत लगती है। इलाहाबाद से बनारस का आधा रास्ता एकदम खराब है और ज़्यादातर समय यहीं बरबाद होता है। आधे रास्ते में लगते हैं एक घंटे और बाकी के रास्ते में एक घंटा। पता चलता है कि अच्छी सड़कें समय को कितना बचाती हैं। खराब सड़कों की वजह से गाड़ी रुक रुक के चलने से खूब पेट्रोल भी पीती है, धूल भी उड़ती है और कीचड़ भी होती है। बनारस के पहले का करीब पचास किमी लगभग चारलेन है और उसमें बहुत मज़ा आया। लेकिन मज़े की बात ये है कि बनारस के आने पर रास्ते में एक भी बोर्ड ये इंगित नहीं करता है कि बनारस आ गया है। चूंकि ये सड़क बनारस के किनारे से निकल जाती है इसलिये अगर आपको पहले से पता न हो तो आप शायद चलते चले जायें जैसा कि मेरे साथ हुआ। करीब चालीस किमी आगे चलने के बाद जब शक हुआ तो पता किया और मालूम हुआ कि बनारस तो पीछे है। खैर फिर लौट के बनारस पहुंचे।
बनारस वैसे तो आध्यात्मिक शहर माना जाता रहा है, लेकिन मेरा ये पहली यात्रा थी उस तरफ। बनारस बहुत साफ शहर तो नहीं है, कानपुर शायद बेहतर है। सड़कें टूटी हैं और घाट गंदे हैं। गंगा का भी बुरा हाल है। गंगा में मल, मूत्र, नालों का पानी, लाश और सब कुछ जाता है। मोक्षदायिनी गंगा अब शायद वो नहीं रही। बरसात में सड़कें नाले बन जाती हैं। कुल मिलाकर बहुत अच्छा नहीं लगा बनारस। लगा कि अगर सड़कें, नालियां और यातायात दुरुस्त हो जाये तो बनारस एक बहुत अच्छा शहर बन जायेगा, क्योंकि ये एक महानगर नहीं है और लोगों के पास जीवन जीने के लिये समय भी है। और साथ साथ घूमने के लिये भी अच्छा हो जायेगा। लेकिन बनारसी पान और मिठाइयां काफ़ी अच्छी हैं।
कुछ चित्र लिये थे जो कि अगले चिट्ठे में डालूंगा। अभी कैमरे से कंप्यूटर पर स्थानांतरित करना है।
खैर वहां से निकले तो रास्ते में फतेहपुर के नज़दीक पहुंचते ही चारलेन रस्ता एकलेन में बदल गया जिसमें खूब गहरे गड्ढे भी थे। उस सड़क पर रफ़्तार ३० के आसपास ही रहती है। पूरा फतेहपुर खराब सड़कों से पटा पड़ा है। कहने को तो ये पूर्व प्रधानमंत्री वी पी सिंह का इलाका है लेकिन काफ़ी पिछड़ा है। करीब ३०-४० किमी का रस्ता खराब था। फिर आगे चारलेन आ गया और फिर से हम उड़ने लगे। कौशाम्बी पहुंचते ही चारलेन फिर से एकरस्ते में बदल गया पर सड़क ठीकठाक थी इसलिये बहुत खराब नहीं लगा, लेकिन इन एक सड़क रास्तों पर ट्रक, जीप , रोडवेज बस, और टैंपू वाले काफ़ी खतरनाक तरीके से चलाते हैं इसलिये आमने सामने की टक्कर का काफ़ी खतरा रहता है। कौशाम्बी में लगा ही नहीं कि कभी ये बुद्धों के लिये महत्वपूर्ण स्थान था। फिर पहुंचे इलाहाबाद जिसके बाहर निकलने में लग गया डेढ़ घंटा।
इलाहाबाद के बाहर बनारस के रास्ते में एक पुल पड़ता है जो कि गंगा के ऊपर बना है और उससे गंगा बहुत खूबसूरत लगती है। इलाहाबाद से बनारस का आधा रास्ता एकदम खराब है और ज़्यादातर समय यहीं बरबाद होता है। आधे रास्ते में लगते हैं एक घंटे और बाकी के रास्ते में एक घंटा। पता चलता है कि अच्छी सड़कें समय को कितना बचाती हैं। खराब सड़कों की वजह से गाड़ी रुक रुक के चलने से खूब पेट्रोल भी पीती है, धूल भी उड़ती है और कीचड़ भी होती है। बनारस के पहले का करीब पचास किमी लगभग चारलेन है और उसमें बहुत मज़ा आया। लेकिन मज़े की बात ये है कि बनारस के आने पर रास्ते में एक भी बोर्ड ये इंगित नहीं करता है कि बनारस आ गया है। चूंकि ये सड़क बनारस के किनारे से निकल जाती है इसलिये अगर आपको पहले से पता न हो तो आप शायद चलते चले जायें जैसा कि मेरे साथ हुआ। करीब चालीस किमी आगे चलने के बाद जब शक हुआ तो पता किया और मालूम हुआ कि बनारस तो पीछे है। खैर फिर लौट के बनारस पहुंचे।
बनारस वैसे तो आध्यात्मिक शहर माना जाता रहा है, लेकिन मेरा ये पहली यात्रा थी उस तरफ। बनारस बहुत साफ शहर तो नहीं है, कानपुर शायद बेहतर है। सड़कें टूटी हैं और घाट गंदे हैं। गंगा का भी बुरा हाल है। गंगा में मल, मूत्र, नालों का पानी, लाश और सब कुछ जाता है। मोक्षदायिनी गंगा अब शायद वो नहीं रही। बरसात में सड़कें नाले बन जाती हैं। कुल मिलाकर बहुत अच्छा नहीं लगा बनारस। लगा कि अगर सड़कें, नालियां और यातायात दुरुस्त हो जाये तो बनारस एक बहुत अच्छा शहर बन जायेगा, क्योंकि ये एक महानगर नहीं है और लोगों के पास जीवन जीने के लिये समय भी है। और साथ साथ घूमने के लिये भी अच्छा हो जायेगा। लेकिन बनारसी पान और मिठाइयां काफ़ी अच्छी हैं।
कुछ चित्र लिये थे जो कि अगले चिट्ठे में डालूंगा। अभी कैमरे से कंप्यूटर पर स्थानांतरित करना है।
Thursday, July 06, 2006
तरबूज की वाइन बनाने की विधि
कुछ मित्रों के कहने पर मैं तरबूज की वाइन बनाने की विधि लिख रहा हूं:
सामग्री:
1. पहले तरबूज को काट लें। काट के तरबूज के गूदे को अच्छे से मसल के उसका जितना संभव हो उतना जूस निकाल लें। 8 किलो के तरबूज से करीब 4 लीटर जूस निकलेगा। जूस में शक्कर मिला कर घोल लें। शक्कर ज़रूरी है क्योंकि तरबूज का जूस ज़्यादा मीठा नहीं होता है इसलिये बिना शक्कर के अल्कोहल की मात्रा कम बनती है। जूस को अच्छे से छान लें ताकि बीज और रेशे न रहें।
2. मर्तबान को उबले हुये ठंडे किये पानी में सोडियम मेटाबाइसल्फाइट डाल के साफ कर लें।
3. अब २ चम्मच यीस्ट को एक कप शुष्म गर्म पानी में थोड़ा देर रख दें जिससे कि यीस्ट कार्यान्वित यानी एक्टीवेट हो जाये। आधे घन्टे में काफ़ी झाग पैदा हो जाता है।
4. अब शक्कर मिले हुये जूस को मर्तबान में भरकर उसमें यीस्ट डाल दें और मर्तबान की गर्दन पर एक कपड़ा अच्छे से बांध दें और मर्तबान को १२ घंटे के लिये अंधेरी और ठंडी (मतल जहां तापमान करीब २०-२५ सेंटीग्रेड के बीच हो) जगह पर रख दें। इस समय शुरुआती खमीरीकरण होगा।
5. १२ घंटे बाद कपड़े को हटाकर उसकी जगह मर्तबान की गर्दन में कार्क कसकर लगा दें और कार्क के छेद में यू ट्यूब यानी वाटरलाक लगा दे और ट्यूब में इतना पानी भरें कि पानी अंदर न जाये और बाहर की ऑक्सीजन अंदर न जा सके। वाइन बनने के दौरान अंदर पैदा होने वाली गैस पानी के रास्ते बाहर चली जायेगी। अब इसको फिर से उसी ठंडी व अंधेरी जगह रख दें।
6. आप पायेंगे के शुरुआत के करीब एक हफ़्ते में मर्तबान में बहुत बुलबुले बनते हैं। इसका मतलब आपका यीस्ट ठीक से काम कर रहा है और अल्कोहल बन रहा है। करीब एक हफ़्ते बाद बुलबुले बनने की रफ़्तार मंद पड़ जायेगी और तीन हफ़्ते में एक दम बन्द हो जायेगी। मर्तबान को करीब डेढ़ महीने तक ऐसे ही रखा रहने दें। बीच बीच में वाटरलाक में पानी देखते रहें कि कही पानी खत्म न हो जाये और आपकी वाइन आक्सीडाइज न हो जाये। पानी के स्तर को बीच बीच में देखते रहना और भरते रहना आवश्यक है
7. डेढ़ दो महीने बाद आप पायेंगे कि जूस का ज़्यादातर मलबा नीचे जम गया है और ऊपर का द्रव काफ़ी पारदर्शी है। अब आपकी वाइन लगभग तैयार है।
8. अब मर्तबान का ढक्कन खोलकर तरल व पारदर्शी वाइन को सावधानी एक पतली रबर की स्टरलाइज़ की हुई ट्यूब से दूसरे स्टरलाइज किये बड़े बर्तन में स्थानान्तरित करें और इसमें एक छोटी चम्मच या स्वादानुसार टैनिन मिला लें और अच्छे से मिला लें। टैनिन मिलाने से पहले आप वाइन का अल्कोहल स्तर भी माप सकते हैं। इसको हाइड्रोमीटर से मापते हैं, उसमें एक सूचक होता है जो कि वाइन के घनत्व को दर्शाता है। घनत्व का मान वाइन के अल्कोहल स्तर से जुड़ा रहता है जिसको कि आप चार्ट पर देख सकते हैं।
हाइड्रोमीटर बनाने की विधि
9. मर्तबान में जमे मलबे को फेंककर और फिर उसको अच्छे से धोकर व स्टरलाइज़ करके उसमें टैनिन मिली वाइन को फिर से डाल लें।
10. फिर से मर्तबान में वाटरलाक लगा दें और वाइन को दो तीन महीने तक रख दें। दो तीन महीने के के बाद वाइन एक दम तैयार हो जायेगी और पीने लायक हो जायेगी। आप चाहें तो और ज़्यादा समप तक वाइन को मर्तबान में छोड़ सकते हैं। जितना ज़्यादा समय देंगे, उतनी ही अच्छी वाइन बनेगी।
11. फिर वाइन को निकाल कर रबर ट्यूब से निकाल कर गहरे रंग की वाइन की बोतलों में भर लें और कार्क लगा कर सील कर दें।
12. वाइन का आनंद लें और बतायें कि कैसी थी आपकी वाइन।
सामग्री:
- एक बड़ा तरबूज (करीब 7-8 किलो का)
- ढाई किलो शक्कर
- यीस्ट
- सोडियम मेटाबाइसल्फाइट,
- एक बड़ा मर्तबान जिसकी गर्दन संकरी हो और उसमें ऊपर से ढक्कन अच्छे से फिट होता हो,
- वाटर लॉक (एक U-आकार की ट्यूब जिसमें पानी ऐसे डालना चाहिये कि पानी न तो वाइन के अन्दर जाये और न ही खुद बाहर जाये, बस ऑक्सीजन को अंदर जाने से रोके और वाइन बनने की प्रक्रिया में पैदा हुई गैस को निकालने के लिये), ट्यूब को ढक्कन के बीच में ट्यूब के आकार का छेद करके उसमें फिट करना पड़ेगा
- टैनिन (वाइन में टैन्जी स्वाद पैदा करने के लिये)- वैकल्पिक
- हाइड्रोमीटर
- थोड़ा सा धैर्य
1. पहले तरबूज को काट लें। काट के तरबूज के गूदे को अच्छे से मसल के उसका जितना संभव हो उतना जूस निकाल लें। 8 किलो के तरबूज से करीब 4 लीटर जूस निकलेगा। जूस में शक्कर मिला कर घोल लें। शक्कर ज़रूरी है क्योंकि तरबूज का जूस ज़्यादा मीठा नहीं होता है इसलिये बिना शक्कर के अल्कोहल की मात्रा कम बनती है। जूस को अच्छे से छान लें ताकि बीज और रेशे न रहें।
2. मर्तबान को उबले हुये ठंडे किये पानी में सोडियम मेटाबाइसल्फाइट डाल के साफ कर लें।
3. अब २ चम्मच यीस्ट को एक कप शुष्म गर्म पानी में थोड़ा देर रख दें जिससे कि यीस्ट कार्यान्वित यानी एक्टीवेट हो जाये। आधे घन्टे में काफ़ी झाग पैदा हो जाता है।
4. अब शक्कर मिले हुये जूस को मर्तबान में भरकर उसमें यीस्ट डाल दें और मर्तबान की गर्दन पर एक कपड़ा अच्छे से बांध दें और मर्तबान को १२ घंटे के लिये अंधेरी और ठंडी (मतल जहां तापमान करीब २०-२५ सेंटीग्रेड के बीच हो) जगह पर रख दें। इस समय शुरुआती खमीरीकरण होगा।
5. १२ घंटे बाद कपड़े को हटाकर उसकी जगह मर्तबान की गर्दन में कार्क कसकर लगा दें और कार्क के छेद में यू ट्यूब यानी वाटरलाक लगा दे और ट्यूब में इतना पानी भरें कि पानी अंदर न जाये और बाहर की ऑक्सीजन अंदर न जा सके। वाइन बनने के दौरान अंदर पैदा होने वाली गैस पानी के रास्ते बाहर चली जायेगी। अब इसको फिर से उसी ठंडी व अंधेरी जगह रख दें।
6. आप पायेंगे के शुरुआत के करीब एक हफ़्ते में मर्तबान में बहुत बुलबुले बनते हैं। इसका मतलब आपका यीस्ट ठीक से काम कर रहा है और अल्कोहल बन रहा है। करीब एक हफ़्ते बाद बुलबुले बनने की रफ़्तार मंद पड़ जायेगी और तीन हफ़्ते में एक दम बन्द हो जायेगी। मर्तबान को करीब डेढ़ महीने तक ऐसे ही रखा रहने दें। बीच बीच में वाटरलाक में पानी देखते रहें कि कही पानी खत्म न हो जाये और आपकी वाइन आक्सीडाइज न हो जाये। पानी के स्तर को बीच बीच में देखते रहना और भरते रहना आवश्यक है
7. डेढ़ दो महीने बाद आप पायेंगे कि जूस का ज़्यादातर मलबा नीचे जम गया है और ऊपर का द्रव काफ़ी पारदर्शी है। अब आपकी वाइन लगभग तैयार है।
8. अब मर्तबान का ढक्कन खोलकर तरल व पारदर्शी वाइन को सावधानी एक पतली रबर की स्टरलाइज़ की हुई ट्यूब से दूसरे स्टरलाइज किये बड़े बर्तन में स्थानान्तरित करें और इसमें एक छोटी चम्मच या स्वादानुसार टैनिन मिला लें और अच्छे से मिला लें। टैनिन मिलाने से पहले आप वाइन का अल्कोहल स्तर भी माप सकते हैं। इसको हाइड्रोमीटर से मापते हैं, उसमें एक सूचक होता है जो कि वाइन के घनत्व को दर्शाता है। घनत्व का मान वाइन के अल्कोहल स्तर से जुड़ा रहता है जिसको कि आप चार्ट पर देख सकते हैं।
हाइड्रोमीटर बनाने की विधि
9. मर्तबान में जमे मलबे को फेंककर और फिर उसको अच्छे से धोकर व स्टरलाइज़ करके उसमें टैनिन मिली वाइन को फिर से डाल लें।
10. फिर से मर्तबान में वाटरलाक लगा दें और वाइन को दो तीन महीने तक रख दें। दो तीन महीने के के बाद वाइन एक दम तैयार हो जायेगी और पीने लायक हो जायेगी। आप चाहें तो और ज़्यादा समप तक वाइन को मर्तबान में छोड़ सकते हैं। जितना ज़्यादा समय देंगे, उतनी ही अच्छी वाइन बनेगी।
11. फिर वाइन को निकाल कर रबर ट्यूब से निकाल कर गहरे रंग की वाइन की बोतलों में भर लें और कार्क लगा कर सील कर दें।
12. वाइन का आनंद लें और बतायें कि कैसी थी आपकी वाइन।







