Thursday, November 19, 2009

दो लाइनें

कहीं पढ़ा था: 



कई बार यूँ भी हमने अपने दिल को बहलाया है
जिन बातों को खुद नहीं समझे औरों को समझाया है

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Saturday, May 02, 2009

कविता कोष

एक अच्छी वेबसाईट मिली जिसमे कई सारे कवियों की कृतियाँ मौजूद हैं। जिसने भी ये कोष शुरू किया है, उसको शत शत नमन ।

देखें कविता कोष

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Friday, April 03, 2009

धरमपाल जी और भारतीय विज्ञान

स्वर्गीय श्री धरमपाल जी हिंद्स्तान की आज़ादी की लड़ाई के समय के एक ऐसे नायक थे जिनके बार में शायद ही कुछ लिखा गया हो।

वो एक गांधीवादी थे, एक अच्छे विचारक, इतिहासकार और लेखक थे और उन्होंने हिन्दुस्तान में विज्ञान के इतिहास, पुराने समाज, और लोगों के बारे में काफी लिखा। उन्होंने कई सारे दस्तावेज़ जमा करके किताबें लिखीं जिनमें उन्होंने दिखलाया कि पुराने हिन्दुस्तान के लोग विज्ञान जानते थे, और उन्होंने कई सारे ऐसे तरीकों को ईजाद किया था जिनके बारे में हमको पता भी नहीं है। कैसे हिंद्स्तान की कुछ अच्छी विरासतों को ब्रितानी शासकों द्वारा तरीके से ख़त्म किया गया जिससे कि आम आदमी का अपने आप से और अपनी विरासत से यकीन उठ जाए।

धरमपाल जी के बारे में एक अच्छी वेबसाईट है जिसको कि यहाँ देखा जा सकता है।

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Monday, March 23, 2009

प्लास्टिक से ईंधन

नागपुर के एक कालेज की प्रोफेसर अलका जादगाओंकर ने एक ऐसा कैटेलिस्ट और इससे चलने वाला तरीका ईजाद किया है जिससे कि बेकार प्लास्टिक को ईंधन में बदला जा सके। मजेदार बात ये है कि हम हिन्दुस्तानियों से ज़्यादा विदेशी उनके इस आविष्कार को अपने देश में प्रयोग करने के इच्छुक हैं।

हालांकि ये ख़बर काफी पुरानी है और मैने पहली बार करीब ३-४ साल पहले पढ़ी थी. पर पूरी ख़बर यहाँ है और उनकी कंपनी की वेब साइट यहाँ है ।

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Buses to run on the Green Fuel from Human waste

नार्वे में एक ऐसा तरीका ईजाद किया गया है जिससे कि मानव अपशिष्ट को ईंधन में बदल कर बसों को चलाया जा सके। सीवर से कूड़े को निकाल कर उसमे बैक्टीरिया को मिलाया जता है जो कि ठोस पदार्थ को तोड़ के उससे बायोमेथेन पैदा करता है, जो कि ईंधन के रूप में प्रयोग की जा सकती है। ये बायो मेथेन किसी और तरीके से बनायी गयी बायो मेथेन से ज़्यादा सस्ती होती है, करीब ३० सेंट (यूरोपियन) प्रति लीटर जो कि बायोडीज़ल और साधारण डीज़ल से सस्ता है। ऐसे में प्रदूषण भी कम होता है क्योंकि कार्बन ज़मीनी ईंधन से आने के बजाय सीधे पर्यावरण से ही आता है। नार्वे और स्वीडन में ये काम काफी जोरों पे चल रहा है और कई बसों को चलाया जा रहा है।

हिन्दुस्तान के लिए तो ये काफी अच्छा हो सकता है क्योंकि एक अरब से ज़्यादा की आबादी जो कूड़ा पैदा करती है, एक तो उसका प्रयोग हो जायेगा, कूड़े के निस्तारण की समस्या भी कम हो जायेगी, बीमारियां भी कम फैलेंगी, साधारण डीज़ल से फैलने वाले प्रदूषण में भी कमी होगी और हमको अरब देशों पर कम निर्भर करना पड़ेगा।

पूरी ख़बर यहाँ पर है

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Saturday, March 21, 2009

पेड़ और गाँव

शोध में पाया गया है कि गावों की जिंदगी के बचने के लिए ज़रूरी है कि पेड़ों को बचाया जाए। पेड़ कई मायनों ने गावों की ज़िंदगी को संभाल कर रखते हैं जैसे कि ये गाँव वालों को फल और सब्जी देते हैं, जानवरों के लिए खाना देते हैं, ताज़ी हवा देते हैं, बरसात में मिट्टी का कटाव रोकते हैं वगैरह वगैरह।

पूरी रिपोर्ट यहाँ पढ़ी जा सकती है।

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