नार्वे में एक ऐसा तरीका ईजाद किया गया है जिससे कि मानव अपशिष्ट को ईंधन में बदल कर बसों को चलाया जा सके। सीवर से कूड़े को निकाल कर उसमे बैक्टीरिया को मिलाया जता है जो कि ठोस पदार्थ को तोड़ के उससे बायोमेथेन पैदा करता है, जो कि ईंधन के रूप में प्रयोग की जा सकती है। ये बायो मेथेन किसी और तरीके से बनायी गयी बायो मेथेन से ज़्यादा सस्ती होती है, करीब ३० सेंट (यूरोपियन) प्रति लीटर जो कि बायोडीज़ल और साधारण डीज़ल से सस्ता है। ऐसे में प्रदूषण भी कम होता है क्योंकि कार्बन ज़मीनी ईंधन से आने के बजाय सीधे पर्यावरण से ही आता है। नार्वे और स्वीडन में ये काम काफी जोरों पे चल रहा है और कई बसों को चलाया जा रहा है।
हिन्दुस्तान के लिए तो ये काफी अच्छा हो सकता है क्योंकि एक अरब से ज़्यादा की आबादी जो कूड़ा पैदा करती है, एक तो उसका प्रयोग हो जायेगा,
कूड़े के निस्तारण की समस्या भी कम हो जायेगी, बीमारियां भी कम फैलेंगी, साधारण डीज़ल से फैलने वाले प्रदूषण में भी कमी होगी और हमको अरब देशों पर कम निर्भर करना पड़ेगा।
पूरी ख़बर यहाँ पर है।