आज फिर से शनिवार है, साल के पहले शनिवार यानी १ जनवरी तो हम अपने चिट्ठा धर्म का पालन नहीं कर पाये क्योंकि उस दिन हम क्रिकेट मैच खेल रहे थे और खेलने के बाद शरीर इस काबिल न रहा कि कुछ लिखें। तो वो काम हम आज करेंगे। तो आज का हमारा मुद्दा है
'
क्या हम भारतीय बेगैरत हैं?'
ये खयाल मन में इसलिये आया कि जब मैंने इस अप्रवासी भारतीय दिवस के बारे में पढ़ा (जिसमें कि हमारे संस्थान के कुछ बड़े पदों पर आसीन लोग भी शिरकत करने गये हैं)। क्या लोग हैं कि साला जब भी कोई अप्रवासी आया लगे पैसा मांगने। जो अप्रवासी पहले अप्रवासी नहीं थे वो भी ऐसा ही करते थे। ये अप्रवासी हैं कि क्या नखरे दिखाते हैं?
'this bloody country does not have infrastructure, ये देश किटना गन्डा है। किटना करप्शन है, लोग सड़क पर मूटटे हैं, औरटें अभी भी पर्डे में चलती हैं, हमारे वहां तो बिकनी में घूमने में भी कोई आपट्टि नहीं है' और पता नहीं क्या क्या? और हम फिर भी कहते हैं आइये जनाब, हमारे पैसे पर ऐश कीजिये, जनता का पैसा है, ऐश करो। भैया, हद होती है, जो अप्रवासी ऐसी अनर्गल बकवास करते हैं, उन्होंने कितना योगदान दिया है व्यक्तिगत रूप से इस देश की इन समस्याओं को सुधारने में? डालर दिखा के नचा रहे हैं और हम नाच रहे हैं। जय डालर, जय बुश और जय एन आर आई। क्या देश है और क्या लोग हैं? अप्रवासी जिनके पास पहले से माल की कमी नहीं है, उनको माल बनाने के और अवसर दिये जाते हैं, जैसे कि ज़्यादा ब्याज़ दर, ज़मीन इत्यादि। और देश के लोगों को कहा जाता है तुम साले पिछड़े लोगों, चुप रहो, कुछ ब्याज़ बगैरह नहीं मिलेगा। तुम लोग तो कम में रहने के आदी हो और उसी में सबर करो।
ऊपर से जब मैंने सूनामी पीढ़ितों के बारे में पढ़ा तो मन और भी खराब हो गया। पता चला कि सहायता वितरण में भी जातिवाद सामने आ रहा है, पिछड़ी जातियों के लोगों को सहायता लेने के लिये मशक्कत करनी पड़ रही है, गालियां खानी पड़ रही हैं। गरीब लोगों से कहा जा रहा है राशन कार्ड लायें। अरे भैया जिसका सब कुछ बह गया हो वो कहां से लायेगा राशन कार्ड। क्या लोग हैं हम, इस आपदा की घड़ी में भी हम लोगों, खासतौर से जो कि गरीब हैं और सबसे ज़्यादा प्रभावित हैं, को परेशान कर रहे हैं। शर्म आनी चाहिये हमको। कोई साला दो कौड़ी का भ्रष्ट नेता मरता है तो सात दिन का राष्ट्रीय शोक मनाया जाता है और इन हज़ारों गरीबों के मरने पर दो मिनट का शोक मनना भी बड़ी चीज़ है। गैरत ही नहीं हममें। और तो और, जो बच्चे अनाथ हुये हैं, उनके खरीददार पैदा हो गये हैं, उनसे भीख मंगवाने वाले, और उनका शारीरिक शोषन करने वाले। इंसानियत शायद सो गयी है या मर गयी है। और तो और जो क्रिकेटर साले करोड़ों कमाते हैं, उनमें से किसी से भी नहीं हुआ कि एक आध करोड़ नहीं एक आध लाख ही दे दें, पर नहीं, उसके लिये भी वो पैसा अपनी फटी हुई टीशर्टों की नीलामी करके लायेंगे। असल में हमारे यहां ऊंचे लोगों के मन में ये है कि गरीब को गरीब रहने दो और समय समय पर टुकड़े फेंकते रहो, काम चलता रहेगा वरना अगर इन सालों (गरीबों) को ज्यादा शिक्षा और पैसा मिल गया तो हमारी मुश्किल हो जायेगी।
आज के लिये ये दो मुद्दे, आगे और। एक चाय का समय हो गया है और साथ साथ आई आई टी में लोगों को यातायात के नियम सिखाना है तो फिर अगले लेख तक
नमस्कार