Monday, January 31, 2005

भविष्य




ये भी शायद आंशिक रूप से सत्य है और पूर्णता की ओर अग्रसर है।

Saturday, January 29, 2005

कुछ शेर

कहीं से कुछ शेर सुने थे, लिख रहा हूं:

घरों में नाम थे, नामों के साथ ओहदे थे।
बहुत तलाश किया मगर इन्सान न मिला॥ (अज्ञात)


क्यों मुझे मौत के पैग़ाम दिये जाते हो
ये सज़ा क्या कम है कि जिये जाते हैं॥ (अज्ञात)

आपके कालीन देखेंगे फिर किसी दिन
आज तो पांव कीचड़ से सने हैं॥ (अज्ञात)

Thursday, January 27, 2005

कैम्ब्रिज की बर्फ़

दो साल पहले कैम्ब्रिज (इंगलैंड) में, जहां कि मैं पी एच डी कर रहा था, जोरदार बर्फ़ पड़ी थी और हमने कैमरे पर अपने कुछ हाथ आजमाये। तो देखिये कुछ बर्फ़वारी के नज़ारे!


कैम नदी के ऊपर एक पुल



किंग्स कॉलेज के चर्च के पीचे का दृश्य



ट्रिनिटी कॉलेज का मेन कोर्ट



नदी का किनारा

Thursday, January 20, 2005

अदनान समी और ऊपर वाला!

आप सब जानते हैं कि पाकिस्तान से भारत में आ बसे गायक अदनान समी यानी छोटे मियां बहुत दिनों से ऊपर वाले से लिफ़्ट करा देने की गुहार कर रहे हैं। ऐसे वैसों ऐरों गैरों को लिफ़्ट कराया पर इनको न कराया, क्या नाइंसाफ़ी है! तो हमारे बड़े मियां, जो आजकल छोटे पर्दे पर मंजन से लेकर गाड़ी तक सब कुछ बेच रहे हैं, यानी अमिताभ बच्चन, को थोड़ी दया आयी और उन्होंने ऊपर वाले को फोन घुमाया। अब ऊपर उनकी बात बहुत मानता है क्योंकि आजकल वे सब कुछ बेचते हैं तो पता नहीं ऊपर वाले को कब किस चीज़ की ज़रूरत पड़ जाये। खैर फोन लगाया और बात शुरू हुयी।

ऊपर वाले ने पूछा 'अरे अमिताभ जी, कैसे याद किया? मुझे नीचे बुला लिया होता।'

बड़े मियां बोले, 'अरे साहब, मैं ऐसी गुस्ताखी कैसे कर सकता था। असल में बात हमारे छोटे मियां की है।'

'कौन छोटे मियां, क्या गोविन्दा?'

'नहीं, वो तो पुराना हो गया, वो है न अपना अदनान समी, वो जो पाकिस्तान से आया है रोज़ी रोटी की तलाश में अपने यहां'

'अच्छा वो, क्या हुआ उसे?'

'अरे कुछ नहीं साहब, वो बहुत दिनों से गुहार लगा रहा है कि उसको भी लिफ़्ट करा दिया जाये। उसकी शिकायत है कि आपने पता नहीं कैसे कैसों को लिफ़्ट करा दिया, पर उसको अभी तक नहीं कराया। ज़रा देख लीजिये।'

ऊपर वाले गला खंखार कर बोले, 'इस मामले में मैं संसाधनों की कमी के कारण असमर्थ हूं। बात ये है अमिताभ जी, मैंने उसको २० बार लिफ़्ट कराने की कोशिश की पर क्या करूं हर बार लिफ़्ट टूट जाती है।'




(ही ही ही ही........................................., हंसो यार!)

उच्च शिक्षा

मन में एक प्रश्न आया कि 'कोचिंगों' द्वारा मार्गदर्शित प्रतियोगी प्रवेश परीक्षाओं पर आधारित उच्च शिक्षा कितनी कारगर हो सकती है? क्या इसमें हम समाज के हर वर्ग को लेकर चलते हैं और क्या इसके माध्यम से हम बच्चों की स्वाभाविक रूचि व कल्पना का खयाल रख पाते हैं? क्या कोई और विकल्प हैं जो कि समाज में शिक्षा का बेहतर वितरण कर सकें?

Monday, January 17, 2005

हिन्दी में भाषण और माफ़ी

अब यदि कोई हिन्दी में भाषण भी देना चाहे तो उसकी खैर नहीं। उसमें भी माफ़ी मांगनी पड़ सकती है। यहां पढ़ें एक रिपोर्ट। इसमें मैगेसे पुरुस्कार विजेता राजेन्द्र सिंह के हिन्दी में भाषण देने के बाद केंद्रीय मैत्री सैम पित्रोदा द्वारा माफ़ी मांगे जाने का विवरण है। सावधान रहें आगे से!!

Friday, January 14, 2005

महानगरों की आपा-धापी और कानपुर के टैम्पू व सुअर

ई स्वामी जी का महानगरों की आपाधापी वाली टिप्पणी देखकर हमको भी लगा कुछ लिखना चहिये। हम भी एक ऐसे ही शहर में रह रहे हैं जहां कि आपाधापी सही में अपने चरम स्तर पर है। हमारा महानगर कानपुर इस मामले तो कम से कम में अव्व्ल है ही। यहां आपाधापी हर चीज़ में है चाहे वो यातायात हो, या बिजली के बिल की लाइन या रोड-क्रासिंग हो या सिनेमाघर की टिकट या फिर रेस्टॉरेन्ट की कतार या फिर रेल आरक्षण की कतार इत्यादि इत्यादि। हमें याद है कि हम कानपुर आये थे सन १९८६ में जब पिताजी की बदली यहां हुयी थी। उसके पहले सिर्फ़ कस्बों जो कि गांव से थोड़े ही बड़े थे, में रहे थे। वो कस्बे थे कायमगंज (जिला फ़र्रूखाबाद) और पुखरायां (कानपुर देहात)। वहां जिंदगी की मूलभूत समस्याओं की कमी के बावज़ूद जीवन नीरस नहीं था, लोग मिलते थे, बात करते थे, हम लोग खेतों में मटर तोड़ के खाया करते थे, प्रदूषण न के बराबर था और गिल्ली-डण्डा, लब्बोडरइया (पेड़ पर लकड़ी फेंक के उसको पकड़ के लाना), तड़ीमार जैसे खेल खेला करते थे, कुल मिला कर मज़ा था जीवन में, बिल्कुल भी आपाधापी न थी। फिर कानपुर में आने के बाद ये सब तो एक दम से खत्म ही हो गया और साथ-साथ ये भी मालूम हुआ कि गांवों और शहरों के लोगों में भी अंतर होता है। फिर भी कानपुर उस समय इतना बुरा नहीं था जितना कि आज है पर समय के साथ ये शहर आगे बढ़कर न शहर बना और न ही गांव, बन गया है एक अनियंत्रित दड़वा जहां आपाधापी के साथ और भी बहुत कुछ मिलता है ।

आज कानपुर में सड़कें एकदम खटारा हैं व उनपे चलने की जगह नहीं है। किसी टैम्पो वाले से बोलकर देखो कि गलत चला रहे हो, उसके जबाब में पहले तो एक दो आदरसूचक मृदु-शब्द होंगे फिर आप ये भी सुनेंगे कि 'साले खुद तो चलाना नहीं आता और मुझे कानून सिखा रहे हो, खुद देख के चलाओ ना।' हम भी सोचे कि भैया देख के ही तो चलाते हैं फिर आप सर्वविद्यमान हैं जो कहीं न कहीं से आकर या तो सामने खड़े हो जाते हैं या आजू बाजू में चुम्मा दे देते हैं, लगता है कि काफ़ी रोमांटिक फ़िल्में देखते हैं हमारे टैम्पू वाले तभी तो बात बात में चुम्मा दे देते हैं। एक दिन जा रहे थे जी टी रोड (वही सड़क जो कि जनाब शेरशाह सूरी ने बनवायी थी और अंग्रेजों ने नाम बदल दिया था) से होकर शहर, एक टैम्पो आगे चल रहा था और हम भी उसी के पीछे चल रहे थे, भैया ने अचानक अपना वाहन रोक दिया बीचोंबीच, जैसे तैसे हमने ब्रेक लगाया और एक संभावित मुठभेड़ से बचाया। भाई साहब सवारी उतार रहे थे और भर रहे थे। मानवता की अच्छी देवा करते हैं ये टैम्पू, जहां आप चाहें वहीं उतारेंगे, खासतौर से अगर स्वर्ग जाना है तो ये सस्ती, टिकाऊ और उत्तम सवारी है। खैर हमने बोला कि बड़े भाई, थोड़ा आगे चल के चौराहे पे रोक लिया होता, क्यों बीच सड़क पे रोक के यातायात बाधित करते हो, जबाब आया कि सड़क क्या तुम्हारे बाप की है, हमने भी सोचा सही तो बोल रहा है, हमारे पास कौनहू रजिस्ट्री तो है नहीं इसकी। कोई बात नहीं आगे बढ़ गये टैम्पू वाले के कानूनी ज्ञान को सराहते। और पुलिस भी इन ज्ञानी और चुम्मा देकर प्रेम दर्शाने वाले टैम्पुओं पर कैसे रोक लगा सकती है, आखिर आजकल की दुनिया में कौन किसको मुफ़्त में चुम्मा देता है और तो और चुम्मा देकर पुलिस को पैसा कौन दे सकता है? सिर्फ़ हमारे महान टैम्पू वाले। भारत के इन्जीनियर व वैज्ञानिक कितने महान हैं जिन्होंने इस विलक्षण टैम्पू रूपी यन्त्र का आविष्कार किया। पता नहीं इस पर उनको नोबल पुरुस्कार क्यों नहीं मिला। लगता है कि इसमें भी रंगभेद की राजनीति है।

और सुअरों की तो बात ही क्या है? हमने एक किताब पढ़ी थी 'एनीमल फ़ार्म (अंग्रेजी में)', उसमें सुअर को एक बुद्धिमान पशु के रूप में दर्शाया गया था। कानपुर को देख कर लगता है कि ये ही है बुद्धिमानों का गढ़ या intellectual captital of the world, और साथ में आई आई टी भी है तो यहां आदमी और जानवर दोनों ही बुद्धिमान हैं, ऐसा गठजोड़ कहीं और शायद ही देखने को मिले। तभी तो नगर प्रशासन ने सुअरों को एक दम खुला छोड़ रखा है ताकि वे बुद्धिमानी के कीड़े पूरे शहर में फ़ैला दें। मां-बाप को भी चिन्ता नहीं करनी पड़ेगी कि बच्चा होशियार नहीं बना।

ये तो हुआ कानपुर महानगर (कुछ के शब्दों में महानरक) के दो पूज्यनीय स्तंभों का संक्षिप्त विवरण। आगे और भी बेहतरीन चीज़ों का वर्णन होगा। फिलहाल तो शहर जाना है और टैम्पुओं के चुम्मों के लिये तैयारी करनी है आखिर ये साधारण चुम्मे थोड़े ही हैं। हम तो भैया किसी गांव में बसना पसंद करेंगे क्योंकि हमको बुद्धिमान लोगों के बीच रहकर थोड़ा अटपटा लगता है बशर्ते जब हम बुड्ढे हों तब तक कोई गांव सही में गांव के रूप में बचा रहे वरना पता नहीं क्या हो?

आखिर में एक छोटी सी पसंद

अच्छी संगत बैठकर संगी बदले रूप।
जैसे मिलकर आम से मीठी हो गयी धूप॥ (निदा फ़ाज़ली)


Wednesday, January 12, 2005

डायनासोर-खोर

क्या आपने कभी सोचा है कि डायनासोर को भी कोई खा सकता है? यदि नहीं तो तो यहां पढ़िये। ये सच हो सकता है आखिर और वो भी कोई स्तनधारी जानवर डायनासोर का भक्षक हो!

Tuesday, January 11, 2005

सुनामी को समझिये

यदि आप विनाशकारी सूनामी की प्रक्रिया को समझना चाहते हैं तो यहां क्लिक करें और देखें।

पहला प्यार

Akshargram Anugunj
यार, ये तो बहुत खतरनाक मुद्दा है, बीबी ने पढ़ लिया तो जूते पड़ जायेंगे। बोलेगी कि निजी जीवन को सार्वजनिक करते हो। खैर जब बात उठी ही है तो कुछ लिखते हैं, लेकिन खुल कर नहीं। जीतू भैया का किस्सा पढ़ कर तो आँखें गीली हो गयीं (सुबुक सुबुक)। हम भी कुछ याद करते हैं। बहरहाल उसको हम प्यार तो नहीं बोलेंगे, लेकिन कुछ भावनायें थीं ज़रूर।

हां तो बात तब की है जब हम इंजीनियरिंग कर रहे थे और हमारे कॉलेज में एक लड़की पढ़ती थी सिविल इंजीनियरिंग में जो कि हमको अच्छी लगती थी। क्यों? इसका तो पता नहीं शायद उसकी सादगी हमको पसन्द थी, कोई बहुत सुन्दर नहीं थी लेकिन अब 'जब दिल लगा गधी से तो परी क्या चीज है?' हाँलांकि वो बाद वाली श्रेणी में भी नहीं थी। हमने पता करने की कोशिश की कि कौन से वर्ष में है और क्या नाम है? किसी से पूछने में डर लग रहा था क्योंकि हॉस्टल में कुछ ऐसे मामले की भनक मिलते ही लड़के तो मेरी ऐसी खिंचाई करते कि जिंदगी में दोबारा ऐसा कुछ करने में भी डर लगता। खैर पता किया वो हमसे एक साल नीचे थी मतलब जूनियर थी और तमिलनाडु की थी। तमिलनाडु की थी ऐसा सोच कर थोड़ा धक्का लगा क्योंकि हमको तमिल तो आती नहीं थी और अंग्रेजी बोलने में भी कच्चे थे। लेकिन फिर भी छुप छुप के देखते थे उसको आते जाते, कभी कभी नैन मटक्का भी हो जाता था। खैर इसी तरह से चलता रहा, कभी कभी मन करता था कि बोल दूं, लेकिन फिर सोचता था कि क्या? ऐसे ही करते करते बीटेक खतम हो गया और हम कॉलेज से बाहर हो गये और जो भावनायें थीं उनकी चटनी बन गयी। तो ये थी हमारी कहानी जो कि शायद सबके साथ ही होती है, कोई लिखता है और कोई नहीं।

डी एन ए फ़िंगरप्रिंटिंग

अभी हाल ही में हमारे संस्थान में डॉ लाल जी सिंह (निदेशक, Centre for Cellular and Molecular Biology (CCMB)) ने एक व्याख्यान दिया था और बताया कि किस तरह डी एन ए फ़िंग़रप्रिंटिंग कई सारी चीजों में कारगर है जैसे कि आनुवंशिकता का पता लगाना, कई सारे आपराधिक मामलों की जांच इत्यादि। जानकारी के लिये गूगल में इस शब्द को टंकित करें और जितना चाहें उतना पढ़ें ।

Monday, January 10, 2005

भारतीय भेड़िया

आदमी का तो पता नहीं, पर शायद भारतीय भेड़िया सबसे पुराना भेड़िया हो सकता है। यहां पढ़ें। वैसे हमारे राजनीतिज्ञ नये भेड़िये ज़रूर हैं लेकिन हैं बहुत खूंखार, शायद सबसे ज़्यादा।

Friday, January 07, 2005

शनिवारी पुराण

आज फिर से शनिवार है, साल के पहले शनिवार यानी १ जनवरी तो हम अपने चिट्ठा धर्म का पालन नहीं कर पाये क्योंकि उस दिन हम क्रिकेट मैच खेल रहे थे और खेलने के बाद शरीर इस काबिल न रहा कि कुछ लिखें। तो वो काम हम आज करेंगे। तो आज का हमारा मुद्दा है

'क्या हम भारतीय बेगैरत हैं?'

ये खयाल मन में इसलिये आया कि जब मैंने इस अप्रवासी भारतीय दिवस के बारे में पढ़ा (जिसमें कि हमारे संस्थान के कुछ बड़े पदों पर आसीन लोग भी शिरकत करने गये हैं)। क्या लोग हैं कि साला जब भी कोई अप्रवासी आया लगे पैसा मांगने। जो अप्रवासी पहले अप्रवासी नहीं थे वो भी ऐसा ही करते थे। ये अप्रवासी हैं कि क्या नखरे दिखाते हैं? 'this bloody country does not have infrastructure, ये देश किटना गन्डा है। किटना करप्शन है, लोग सड़क पर मूटटे हैं, औरटें अभी भी पर्डे में चलती हैं, हमारे वहां तो बिकनी में घूमने में भी कोई आपट्टि नहीं है' और पता नहीं क्या क्या? और हम फिर भी कहते हैं आइये जनाब, हमारे पैसे पर ऐश कीजिये, जनता का पैसा है, ऐश करो। भैया, हद होती है, जो अप्रवासी ऐसी अनर्गल बकवास करते हैं, उन्होंने कितना योगदान दिया है व्यक्तिगत रूप से इस देश की इन समस्याओं को सुधारने में? डालर दिखा के नचा रहे हैं और हम नाच रहे हैं। जय डालर, जय बुश और जय एन आर आई। क्या देश है और क्या लोग हैं? अप्रवासी जिनके पास पहले से माल की कमी नहीं है, उनको माल बनाने के और अवसर दिये जाते हैं, जैसे कि ज़्यादा ब्याज़ दर, ज़मीन इत्यादि। और देश के लोगों को कहा जाता है तुम साले पिछड़े लोगों, चुप रहो, कुछ ब्याज़ बगैरह नहीं मिलेगा। तुम लोग तो कम में रहने के आदी हो और उसी में सबर करो।

ऊपर से जब मैंने सूनामी पीढ़ितों के बारे में पढ़ा तो मन और भी खराब हो गया। पता चला कि सहायता वितरण में भी जातिवाद सामने आ रहा है, पिछड़ी जातियों के लोगों को सहायता लेने के लिये मशक्कत करनी पड़ रही है, गालियां खानी पड़ रही हैं। गरीब लोगों से कहा जा रहा है राशन कार्ड लायें। अरे भैया जिसका सब कुछ बह गया हो वो कहां से लायेगा राशन कार्ड। क्या लोग हैं हम, इस आपदा की घड़ी में भी हम लोगों, खासतौर से जो कि गरीब हैं और सबसे ज़्यादा प्रभावित हैं, को परेशान कर रहे हैं। शर्म आनी चाहिये हमको। कोई साला दो कौड़ी का भ्रष्ट नेता मरता है तो सात दिन का राष्ट्रीय शोक मनाया जाता है और इन हज़ारों गरीबों के मरने पर दो मिनट का शोक मनना भी बड़ी चीज़ है। गैरत ही नहीं हममें। और तो और, जो बच्चे अनाथ हुये हैं, उनके खरीददार पैदा हो गये हैं, उनसे भीख मंगवाने वाले, और उनका शारीरिक शोषन करने वाले। इंसानियत शायद सो गयी है या मर गयी है। और तो और जो क्रिकेटर साले करोड़ों कमाते हैं, उनमें से किसी से भी नहीं हुआ कि एक आध करोड़ नहीं एक आध लाख ही दे दें, पर नहीं, उसके लिये भी वो पैसा अपनी फटी हुई टीशर्टों की नीलामी करके लायेंगे। असल में हमारे यहां ऊंचे लोगों के मन में ये है कि गरीब को गरीब रहने दो और समय समय पर टुकड़े फेंकते रहो, काम चलता रहेगा वरना अगर इन सालों (गरीबों) को ज्यादा शिक्षा और पैसा मिल गया तो हमारी मुश्किल हो जायेगी।

आज के लिये ये दो मुद्दे, आगे और। एक चाय का समय हो गया है और साथ साथ आई आई टी में लोगों को यातायात के नियम सिखाना है तो फिर अगले लेख तक

नमस्कार

Wednesday, January 05, 2005

कादम्बिनी

यदि उपलब्धता हो तो कादम्बिनी पत्रिका का जनवरी अंक पढ़ियेगा, कुछ सही जानकारी मिलेगी। वैसे मैं कोशिश करूंगा कि उसके पन्नों को अंतर्जाल पर डाल दूं, उसमें थोड़ी मेहनत है बस।

Tuesday, January 04, 2005

नये साल की शुरूआत

नमस्कार भाइयों।

आशा है आपने नववर्ष को 'एनज्वाय' किया होगा। बहुत लोग मिले और बोले: 'हैप्पी न्यू इयर' और मैं उत्तर में बोला नया साल मुबारक हो या नववर्ष की बधाई। कुछ लोगों का चेहरा ऐसा लगा जैसे को मैंने कुछ गलत बोल दिया। आप ही बतायें कि हमसे का भूल हुई। अब भैया हम ठहरे कानपुर के गंवार उजड्ड तो 'हैप्पी न्यू इयर' बोलने की आदत ही नहीं पड़ी, क्या करें। मां बाप भी पिछड़े हुये खयालों के थे सो बताया ही नहीं कि बेटा, नये साल पे 'हैप्पी न्यू इयर' बोला कर। खैर हमने नये साल की पूर्वसंध्या पर कुछ खास तो किया नहीं हां व्हिस्की-रम के दो पैग लगा के सो ज़रूर गये, देवानन्द की पिच्चर का गाना याद आ गया 'दम मारो दम, मिट जाये गम। तो मैने भी सोचा 'रम मारो रम मिट जाये गम'।

हां एक चीज़ आजकल समझ में नहीं आ रही है और वो है देवाशीष बाई, पंकज जी और अन्य कम्प्यूटर ज्ञानी मित्रों का संवाद जो कि चिट्ठाकार पर चल रहा है। भैया, ये आर एस एस एस फ़ीड, जावा फ़लाना, द्रुपल और पता नहीं क्या क्या, साला दिमाग तो एक दम पंचर हो गया। आर एस एस से तो केवल हमारा दिमाग राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ तक पहुंचा, आगे समझ नहीं आया। हमने कहा भैया थोड़ा धीमे से सोचें तो अच्छा है वरना वर्तमान केन्द्र और प्रदेश सरकार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का नाम लेने के अपराध में जेल में भी डलवा सकती है।

कक्षायें चालू हो गयी हैं, फिर से पढ़ा रहे हैं, वही विज्ञान, तकनीक और न जाने क्या क्या पर फिर भी भारत के इन प्रतिष्ठा संपन्न संस्थानों से कुछ काम का आविष्कार नहीं निकलता है। सी वी रमन साहब ने टूटी फूटी प्रयोगशाला में रमन प्रभाव खोजा और हम वातानुकूलित कमरों में भी ऐसा कुछ करने में असक्षम हैं। अभी पढ़ा कादम्बिनी पत्रिका के जनवरी अंक में कि हमारे देश के कई भागों में हमारे गरीब किसानों और रिक्शेवालों जैसे निर्धन और असहाय लोगों द्वारा ऐसे ऐसे यंत्र व उपकरण बनाये गये हैं जो कि वाकई में काबिलेतारीफ हैं और सच में उनकी मुश्किलों को काफ़ी हद तक दूर करने में सक्षम हैं (ये बात अलग है कि हमारी प्रयोगशालायें व हमारे पढ़े लिखे वैज्ञानिक और उनके विभाग और सरकारी लोग अभी भी उनको लागू नहीं कर पा रहे हैं और मीनमेख निकाल रहे हैं, और उनके लोगों तक पहुंचने में अड़ंगे डाल रहे हैं)। वो हैं सही के इंजीनियरिंग के उदाहरण, क्या फायदा है ये करोड़ों अरबों के आई आई आई टी बनाने का, बेहतर होगा कि हम अच्छे पांलीटेक्निक और आई टी आई बनायें, ऐसे लोग जो कि सचमुच में इंजीनियेरिंग करते हैं। अनूप भाई ने भी कुछ बताया था कि महोबा के किसी आदमी ने वाहनों का प्रदूषण कम करने वाला कोई उपकरण बनाया है, हांलांकि अभी मुझे पूरी जानका्री नहीं है।

खैर विचारों का सिलसिला ज़ारी है और रहेगा, बाकी एक रूकावट या 'ब्रेक' के बाद।

आशीष