Friday, February 25, 2005

यमुना और थेम्स

यमुना और थेम्स दो विशाल नदियां हैं जो क्रमश: भारत और ब्रिटेन की राजधानियों में बहती हैं। हम यमुना को यमुना मैया कहते हैं और जिसके लिये यमनोत्री नामक तीर्थ भी है और इसका इतिहास थेम्स से कहीं ज़्यादा पुराना और गौरव शाली है। और दूसरी तरफ़ थेम्स बहुत छोटी है और उसको कोई बहन बेटी भी नहीं बोलता है। पर फ़र्क सिर्फ़ इतना है:
  • यमुना नदी से नाला बनने की कगार पर है और कई जगह बन भी गई है और थेम्स तो नाले से नदी बना दिया है।
  • यमुना के किनारे टट्टी के ढ़ेर मिलेंगे और थेम्स के किनारे लंदन की आंख या लंडन आई।
  • यमुना के किनारे गरीब लोग झुग्गी झोपड़ियों में रहते रहते हैं और थेम्स के किनारे लोगों को मकान मिलना नसीब नहीं होता है।
  • यमुना में सस्ती नावें चलती हैं जिनमें कि आजकल शायद कोई ही बैठना चाहता होगा और थेम्स में स्टीमर चलते हैं जिनमें एक क्रूज़ लेने के लिये कई पाउंड खर्च हो जायेंगे।
  • यमुना के किनारे पर शायद ही कोई कवि सम्मेलन या इसके जैसे समारोहों का आयोजन किया जाता हो। थेम्स के किनारे कई बहुत सुन्दर हाल हैं जहां पर अन्तर्राष्ट्रीय समारोहों का आयोजन किया जाता है जिनकी टिकट १० पाउंड से लेकर ५० पाउंड तक होती है (८०० रूपये से ४००० रूपये तक)।
  • यमुना के किनारे गैरकानूनी मकान बनना आम बात है और थेम्स के किनारे कोई बना नहीं सकता है।
  • यमुना में दिल्ली की सारी फ़ैक्टरियों का प्रदूषित कचरा जाता है और थेम्स में यदि कोई बहा दे तो उसकी खैर नहीं।


थेम्स की तस्वीर
यमुना की तस्वीर



क्या हम सच में अपने देश की धरोहरों के साथ खिलवाड़ नहीं कर रहे हैं। गंगा का बुरा हाल है, ऋशिकेष में जाकर गंगा को देखें, पोलीथीन से सराबोर है कभी की सुन्दर और विशाल गंगा, कानपुर में आकर तो विषैली हो जाती है। आज वो गंगा और यमुना नहीं मिलती हैं जो कि मैं बचपन में देखता था और वहां लगभग रोज़ नहाता था। भारत जैसे विशाल और विविधता वाले देश की प्राकृतिक सुंदरता का जो ह्रास आज इसका खुद का बाशिन्दा कर रहा है वो बहुत ही दुख की बात है और चिंता का विषय है। अगर ऐसे ही जंगलों, पहाड़ों और नदियों का विनाश चलता रहा तो इस देश में क्या बचेगा? सीमेंट, लोहा और प्लास्टिक और इंसान के रूप में हैवान वन संपदा के नष्ट होने के साथ जीव जन्तु भी नष्ट हो जायेंगे। तब भी शायद ही अकल आये हमारे लोगों को! पैसे के लिये आदमी क्या क्या कर सकता है ये भारत में सही देखने को मिल रहा है।

Tuesday, February 22, 2005

अनुगूंज ६: मेरा चमत्कारी अनुभव

Akshargram Anugunj
ये बड़ा हे कठिन विषय है लिखने के लिये और वो इसलिये क्योंकि मुझे चमत्कारों वगैरह पर विश्वास नहीं है। फिर भी एक घटना है जो कि इस श्रेणी में आती है।इस कहानी में चमत्कार तो शायद कम है और संयोग ज़्यादा। ये उस समय की बात है जब मैं करीब १२ साल का था और आगरा से अपने परिवार के साथ लौट रहा था। हम (माता-पिता और हम तीन भाई बहन) आगरा से पुखरायां की बस पकड़ने के लिये बस अड्डे जा रहे थे और हमको कुछ सेकंड की देरी हो गयी और हमारे देखते देखते एक एक्सप्रेस बस निकल गयी। हमने अपने आप को और रिक्शे वाले को कोसा कि जरा सी देरी की वजह से एक अच्छी बस छूट गयी, मिल जाती तो घर सही समय पर पहुंच जाते, अब पता नहीं कितने बजे पहुंचेंगे। खैर बस अड्डे पर खड़े रहे और इन्तज़ार करते रहे। एक बस आयी करीब एक घन्टे बाद जो कि भरी हुयी थी और जगह जगह रूक के जाने वाली थी। हम भुनभुनाते हुये इसमें चढ़ गये। मैं और मेरा भाई बस में सबसे आगे बोनट के ऊपर बैठे थे, मेरी बहन आगे से दूसरी सीट पर एक बुज़ुर्ग के साथ बैठी थी और माता पिता पीछे अलग बैठे थे। बस चली और हमको थोड़ी राहत महसूस हुई।

आधा रास्ता पार करने के बाद जब हम इटावा के पास पहुंचे तो देखा कि जो बस हमसे छूट गयी थी, उसकी एक ट्रक के साथ बहुत ही भयंकर आमने सामने की टक्कर हो गयी और ट्रक बस में लगभग आधी दूरी तक घुस गया था, लगभग सारी सवारियां मारी गयी थीं। देख कर हमारे रोंगटे खड़े हो गये और हमने मन ही मन भगवान को धन्यवाद दिया कि हमारी थोड़ी सी देरी से आज हम इस बस में बैठ सके और इसीलिये जीवित हैं।

ये दर्दनाक हादसा देखने के बाद हमारी बस आगे बढ़ी और औरैया से थोड़ी दूर पहले मैंने चालक को बोलते हुये सुना कि बस के ब्रेक फ़ेल हो गये हैं और उसके बाद मुझे याद नहीं क्या हुआ था। होश में आपने पर देख देखा कि हमारी बस की भी एक ट्रक से सामने की टक्कर हुयी थी। बस के कांच टूट गये थे, टक्कर बहुत गंभीर नहीं, क्योंकि किनारे हुयी थी। मुझे बताया गया कि मेरे पैरों के नीचे कपड़ों और बर्तनों से भरा एक झोला था जिसने कि मेरे पैरों को बचा लिया वरना आज शायद मैं अपंग होता, मैं उसी तरफ़ पैर करके बैठा था जहां टक्कर हुयी थी और ये सिर्फ़ संयोग कि बात है कि मेरे पैर उस झोले के पीछे थे और आश्चर्य की बात मुझे एक खंरोच तक नहीं आयी थी। मेरा छोटा भाई ड्राइवर के बगल में था और वो ड्राइवर के कूदने के बाद उसके पीछे कूद गया थ इसलिये उसको कोई चोट नहीं आयी। मेरी बहन जो कि उस समय केवल ५ साल की थ, खून से भीग गयी थी लेकिन बाद में पता चला कि वो उसके बगल में बैठे आदमी की वजह से बच गयी थी जिसको कि बहुत गहरी चोट आयी थी। मेरे माता पिता पीछे थे इसलिये उनको कुछ नहीं हुआ। पूरी बस में कुछ लोग घायल हुये थे पर उस समय तक तो किसी की मौत नहीं हुयी थी, बाद का पता नहीं। उसके बाद हम रात को औरैया रुके, भगवान को धन्यवाद दिया कि एक दिन में मौत से दो बार बचाया।

दोस्तों इस कहानी में बिल्कुल भी मसाला नहीं है, एकदम सत्य घटना है। ये वो दिन था जब मुझे लगा कि 'जाको राखे साइयां मार सके न कोय'। और शायद ये संयोग या चमत्कार भी था।

Sunday, February 20, 2005

चीन और विकास

अखबारों और पत्रिकाओं में लोग कहते हैं कि चीन द्रुति गति से विकास कर रहा है और वहां के लोगों की प्रति व्यक्ति आय हमसे दुगुनी है। शायद सच है। लेकिन ये तस्वीरें सिक्के के दूसरे पहलू को उजागर करती हैं।

Wednesday, February 16, 2005

कलकत्ता का दौरा

अभी हाल ही में हम कलकत्ता गये थे। जाते समय लखनऊ से जाना हुआ क्योंकि कानपुर में तो हवाई अड्डे की दो उड़ानों के बाद हवा निकल गयी, इसलिये पहले लखनऊ जाइये और फिर वहां से उड़िये। फिर सहारा के जहाज पर चढ़े। ठीक ठाक जहाज था, बुरा तो कतई नहीं था। वहां पर जहाज में घुसने के बाद विमान परिचायक (न कि परिचायिका) ने बोलना शुरू किया, ' आप लोघों खा शहारा खी उडान शंख्या ६७५७ में श्वागट हे। उम्मीड हे के आपखा १००० किमी लाम्बा शफर अच्छा रहेगा।..............................' फिर कुछ अंग्रेज़ी में भी बोला। लगा ऐसे कि ये बन्दा सीधे अमरीका से उठ कर आ रहा है। जब भी कुछ पूछने आया तो बोले, 'यस सर'। यार, ये भारत की स्थानीय उड़ानों में कर्माचारियों को हिन्दी (या किसी और भाषा) में बोलने में शरम क्यों आती है? ये लोग ये मान के क्यों चलते हैं कि हवाई जहाज़ में सफर करने वाले सब अंग्रेजी जानते हैं। हमको तो आती नहीं हैं, हम तो हैं लट्ठ गंवार, जाओ नहीं बोलेंगे अंग्रेज़ी। इसकी वजह से क्या हवाई जहाज़ में चलना बंद कर दें। पर वो हैं कि सुनते ही नहीं हैं। उनको जब तक अंग्रेजी में 'वाटर' न बोलो तो पानी के लिये तरस जाओ। क्या तमाशा है?

लौटते में एक दंपत्ति पीछे की सीट पर थे अपने दो बच्चों के साथ। दंपत्ति लखनऊ के लग रहे थे और शायद थे भी जो कि उनके बातचीत के लहज़े से लग रहा था। खैर जब उनके बच्चे आपस में बात करें या वो बच्चों से बात करते थे तो वो हमारे शासकों की भाषा में ही होती थी जैसे कि 'पापा व्हाट इस दैट' या 'पापा आई वान्ट वाटर' या 'ममा आई वान्ट टू गो टू सूसू'। यार मुझे समझ नहीं आया कि केवल सूसू हिन्दी में क्यों। फिर सोचा कि शायद अंग्रेज़ों को सूसू न लगती हो इसलिये। पूछ्ना पड़ेगा अगली बार जब इंगलैंड जायेंगे।

खैर दोस्तों मुझे अब भारत के अंदर जहाज़ और शताब्दी जैसी गाड़ियों में चलना सुहाता नहीं है क्योंकि जब हमारे अभिजात्य लोग बोलते हैं तो लगता है कुछ उधार ली हुयी भाषा और लहजे में बोल रहे हैं और हमारे कानों में पिघला हुआ शीशा घुसता हुआ लगता है। बोलने का लहजा तो ऐसा है कि लगता है साला अंग्रेज़ भी सोचता होगा कि कहीं उनसे गलती तो नहीं रही है। आप लोग तो साफ़्टवेयर वाले हैं, बंगलौर जैसी जगहओं पर काम करते हैं और हो सकता है कि ऐसे लोगों से आपका पाला काफ़ी पड़ता हो।

पर हमारे मन की भड़ास को तो निकलना ही था इसलिये लिखा।


राम-राम / वालेकुम सलाम/ सत श्री अकाल / बाय

Saturday, February 05, 2005

यातायात संचालक

अभी हाल में ही मैंने आई आई टी कानपुर में आयोजित एक यातायात पर गोष्ठी में भाग लिया था जिसमें कि कानपुर के यातायात निरीक्षक राकेश सिंह और यातायात पुलिस महानिरीक्षक सिद्दीकी मौजूद थे। सिंह साहब ने परेशानियां गिनायीं, लोगों पर दोषारोपण किया, बुनियादी ढांचे को गालियां दीं और बहुत कुछ कहा लेकिन ये न बोला कि जो संसाधन हैं उसमें बेहतर क्या किया जा सकता है। सिद्दीकी साहब आये काफ़ी देर से और वो भी अपनी गाड़ी का सायरन बजाते हुये जिसकी कि आई आई टी कैम्पस में ज़रूरत समझ में नहीं आती और वो भी जब जनाब खुद यातायात संचालक हैं । खैर उन्होंने दो मिनट का समय लिया क्योंकि उनको जल्दी थी और बोले कि हम तो पुलिस में आने के बाद हो गये हैं बेकार इसलिये सब कुछ वुद्धिजीवियों पर निर्भर करता है। फिर एक दो शेर सुनाये और चले गये। माना कि सुझाव देना हमारा काम है लेकिन उन पर अमल होना या न होना तो इन्हीं साहेबान पर निर्भर करता है।

तो संदेश काफी सीधा है: भाई लोग जब कोतवालों का ये आलम है तो यातायत तो सुधरने से रहा । हां यदि आप सुधर जायें मसलन यदि आप भी हार्न बजाने लगें, गालीगलौज करने लगें, बिना नियम को सोचे चलायें तो खुश रहेंगे वरना रोते रहिये अपनी किस्मत को और कानपुर को।

तो ये है हमारे महानगर के यातायात और उसको सुधारने वालों का हाल।

Thursday, February 03, 2005

मुम्बई की दास्तान

मैंने सुना था कि मुम्बई में झुग्गियों व झोपड़पट्टियों में रहने वाले लोगों के लिये मकान बन रहे हैं तो सुन के अच्छा लगा। लेकिन ये खबर तो कुछ और ही कहानी बयान करती है।