Thursday, May 26, 2005

अटल जी की कविता

आज पूर्व प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी की ये कविता पढ़ी । अच्छी कविता है।

ऊँचे पहाड़ पर, पेड़ नहीं लगते,
पौधे नहीं उगते, न घास ही जमती है।
जमती है सिर्फ बर्फ, जो, कफन की तरह सफेद और,
मौत की तरह ठंडी होती है।
खेलती, खिल-खिलाती नदी, जिसका रूप धारण कर,
अपने भाग्य पर बूंद-बूंद रोती है।
ऐसी ऊँचाई, जिसका परस पानी को पत्थर कर दे,
ऐसी ऊँचाई जिसका दरस हीन भाव भर दे,
अभिनन्दन की अधिकारी है,
आरोहियों के लिये आमंत्रण है,
उस पर झंडे गाड़े जा सकते हैं,
किन्तु कोई गौरैया, वहाँ नीड़ नहीं बना सकती,
ना कोई थका-मांदा बटोही, उसकी छांव में पलभर पलक ही झपका सकता है।

सच्चाई यह है कि केवल ऊँचाई ही काफ़ी नहीं होती,
सबसे अलग-थलग, परिवेश से पृथक,
अपनों से कटा-बंटा, शून्य में अकेला खड़ा होना,
पहाड़ की महानता नहीं, मजबूरी है।
ऊँचाई और गहराई में आकाश-पाताल की दूरी है।
जो जितना ऊँचा, उतना एकाकी होता है,
हर भार को स्वयं ढोता है, चेहरे पर मुस्कानें चिपका,
मन ही मन रोता है।

जरूरी यह है कि ऊँचाई के साथ विस्तार भी हो,
जिससे मनुष्य, ठूंट सा खड़ा न रहे,
औरों से घुले-मिले, किसी को साथ ले,
किसी के संग चले।
भीड़ में खो जाना, यादों में डूब जाना,
स्वयं को भूल जाना, अस्तित्व को अर्थ,
जीवन को सुगंध देता है।
धरती को बौनों की नहीं, ऊँचे कद के इन्सानों की जरूरत है।
इतने ऊँचे कि आसमान छू लें, नये नक्षत्रों में प्रतिभा की बीज बो लें,
किन्तु इतने ऊँचे भी नहीं, कि पाँव तले दूब ही न जमे,
कोई कांटा न चुभे, कोई कली न खिले।

न वसंत हो, न पतझड़, हों सिर्फ ऊँचाई का अंधड़,
मात्र अकेलापन का सन्नाटा।

मेरे प्रभु!
मुझे इतनी ऊँचाई कभी मत देना,
गैरों को गले न लगा सकूँ,
इतनी रुखाई कभी मत देना।

Monday, May 23, 2005

विदेश की कुछ सुर्खियां

आजकल इंग्लैंड में हूं और चूंकि अकेले हूं इसलिये शाम का ज़्यादातर वक्त पढ़ने या टीवी देखने में गुज़रता है। टीवी पर इंग्लैंड में कुछ सामाजिक समस्याओं पर काफ़ी ज़ोर है:
  • बच्चों में बड़ों के प्रति दुर्व्यवहार का पनपना
  • स्कूल में बच्चों का बदतमीज़ होते जाना
  • हिंसक अपराधों में वृद्धि
  • शराब खोरी में इज़ाफ़ा
  • तलाक की दर में वृद्धि
  • समाज में हर चीज को पैसे के बल पर तौला जाना
  • जनता को प्रदत्त सेवाओं की बुरी हालत खासतौर से स्वास्थय सेवा
  • बुड्ढों की बढ़ती संख्या और समाज पर बढ़ता पेंशन का बोझ
इनके अलावा और भी काफ़ी गंभीर समस्यायें हैं। केवल भारत ही समस्याओं से ग्रस्त नहीं है। वहां का गरीब आदमी अभी भी सही मायनों में इंसान है, सबसे ज़्यादा गंदगी तो शहरी आदमी, धनी वर्ग और पोंगा पंडितों ने फैलायी है।

हम लोग भारत की समस्याओं को ही उजागर करते रहते हैं, खासतौर से अप्रवासी बन्धु!! भारत के बारे में तो हम सब जानते हैं और वैसे भी घर की मुर्गी दाल बराबर।

अच्छा लगेगा कि लोग कुछ और मुद्दों पर लिखें जैसे कि विदेशों में नस्लवाद, समाज की दशा और दूसरी पीढ़ी के बच्चों की कठिनाइयां!! भारत की दुर्दशा को उजागर करना ही चिट्ठाकारी नहीं है। मानता हूं मैंने भी की है, पर विदेश भी में सब कुछ अच्छा ही नहीं है।

Thursday, May 19, 2005

दसवीं अनुगूंज: एक पाती, प्रधानमंत्री के नाम

रवि जी बड़ा ही कठिन विषय चुना है दसवीं अनुगूंज के लिये, काफ़ी बड़ा दायरा है शीर्षक का।

खैर मैं सोच रहा हूं कि एक पाती देश के राजाओं के नाम लिखी जाये। तो पाती की शुरुआत करते हैं।

Akshargram Anugunj
माननीय प्रधानमंत्री जी,

आशा है कि आपकी सरकार कुशल पूर्वक चल रही है। अब थोड़ा बहुत तो आपको कष्ट होता ही होगा, क्योंकि कभी मैडम का फरमान किसी चीज़ के लिये तो कभी वामदल वालों की उछल कूद, आप बैंगन की तरह ढुलकते रहते हैं अपनी कुर्सी पर। ऊपर से आपकी पार्टी के खून में भष्टाचार भरा हुआ है बुरी तरह, अर्जुन सिंह जैसे महाभ्रष्ट लोग मानव संसाधन मंत्री हैं जो कि देश के गरीब और निरीह मानवों तक संसाधन पहुंचाने की जगह खुद ही संसाधनों को निचोड़ के उनका रसपान कर रहे हैं।

पर फिर भी हम जनता को आपसे कुछ आशायें हैं। पिछली बार अनुनाद जी ने आशा के ऊपर अनुगूंज का आयोजन किया था जिसमें कि तमाम प्रतिक्रियायें थीं, पर शायद निचोड़ यही था कि आशा आदमी को जिन्दा रखती है, कुछ अच्छा होने की आशा। आशा इसलिये है कि आप खुद अच्छे व्यक्ति हैं, आप पढ़े लिखे हैं, बुद्धिमान हैं, अंतर-राष्ट्रीय स्तर पर विशिष्ट अर्थशास्त्रियों की श्रेणी में आपका नाम है और आपके इरादे नेक लगते हैं। आशा है आप और आपके मंत्री कुछ ऐसा करेंगे जिससे कि इस देश के आम आदमी का भला हो। आम आदमी से मेरा तात्पर्य है वो आदमी जो रोजी रोटी की तलाश में पसीना बहाता है जैसे कि हमारे किसान, मजदूर, सफाई कर्मी, रिक्शे वाले भाई, गरीब पुलिस वाले हवलदार इत्यादि जिनकी वजह से ये देश चल रहा है। ये लोग जो कि देश के प्राण हैं क्योंकि ये देख के लिये अनाज पैदा करते हैं, देश को साफ रखते हैं, आलीशान मकान और भव्य इमारतें बनाते हैं, कानून व्यवस्था बनाये रखते हैं, अधकचरे मकानों में रहते हैं, जिनके बच्चे शायद ही स्कूल जाते हैं और जो स्कूल जाते हैं वो अपने मां बाप के व्यवसाय को शायद ही अच्छी नज़र से देखते हों, जिनके बच्चे कुपोषित हैं, जिनको बिजली, पानी और स्वास्थय सेवा की दरकार है पर मिलती नहीं है।

आपको याद दिलाना चाहता हूं कि हमारा देश केवल अमीरों और मध्यम वर्गीय लोगों का नहीं है, देश के ५० प्रतिशत या उससे ज़्यादा लोग निम्न या निम्नतर वर्ग में आते हैं। आपसे गुज़ारिश है कि आपकी आर्थिक योजनायें इन लोगों को भी खयाल में रखें। इनके द्वारा प्रदत्त सेवाओं की भी कीमत है और हमारे धनी समाज को उस कीमत को चुकाने के लिये बाध्य किया जाना चाहिये। मैं आपसे पूछता हूं कि क्या केवल वो सेवायें ही कीमती हैं जो कि बंगलोर जैसे शहरों में सूचना प्रौद्योगिकी, विधि या वित्त सलाहकारों द्वारा दी जाती हैं। उदाहरणार्थ अगर सफाई न हो किसी घातक बीमारी से सब के सब मरने की कगार पर पहुंच सकते हैं जैसे कि प्लेग।

ढांचागत और बुनियादी सुविधाओं की ज़रूरत गांवों और पिछड़े क्षेत्रों को ज़्यादा है क्योंकि अगर पिछड़े क्षेत्रों और गांवों में इन सुविधाओं का अभाव नहीं होगा तो उनसे शहरों में पलायन भी कम होगा और शहरों को समस्याओं से कम जूझना पड़ेगा। बच्चे गांव में ही रहकर कुछ कर सकेंगे। किसानों को अगर उनकी खेती पर अच्छा पैसा मिलेगा तो लोग खेती करना बंद नहीं करेंगे। साथ ही साथ अगर किसानों को ये सिखाया जाये कि किस तरह से पैदावार और गुणवत्ता बढ़ायी जा सकती है, उनके लिये वरदान साबित हो सकता है। शायद ही कोई किसान भाई गांव की ताज़ी हवा को छोड़कर शहर जाकर बहुत सुखी महसूस करता हो, पर पलायन इसलिये होता है कि गांव और खेती में भविष्य नहीं है, सुविधायें नहीं हैं।

आपसे उम्मीद है कि इन योजनाओं के साथ आवंटित पैसा सही लोगों तक पहुंचाने में आपकी सरकार सक्षम हो। भ्रष्टाचार को कम किया जा सके। आप तो खुद ही बुद्धिमान एवं सक्षम व्यक्ति हैं। मैं आपको कोई सुझाव नहीं दूंगा पर याद दिलाना चाहूंगा कि इस देश के आम नागरिक को विकास की सबसे ज़्यादा ज़रूरत है और वो आम नागरिक शहरों की झोपड़ पट्टियों में रहता है, गांवों में रहता है, और फटेहाल है। उम्मीद है आपके पांच साल में कुछ सुधार दिखेगा वरना वही ढाक के तीन पात, लोग तो जी ही रहे हैं और जियेंगे भी।

आपका एक प्रशंसक

Wednesday, May 11, 2005

इंग्लैंडके लोग

आज इंग्लैंड आये ६ दिन होने को आये हैं लेकिन यहां अच्छा नहीं लग रहा है, सारी साफ सफाई और तड़क भड़क के बावज़ूद एक खालीपन सा रहता है। समाज में जुड़ना मुश्किल लगता है। किसी अंग्रेज के साथ बैठे हो तो बातचीत शायद ही आगे बढ़े। और अगर साथ में कोई दूसरा अंग्रेज़ है तो आप तो अपने आप को दृश्य से बाहर ही समझिये। पबों में जाना पसन्द है तो बात बन सकती है लेकिन यदि नहीं तो मुश्किल है। मुझे तो पब में बदबू आती है शराब और सिगरेट की। ऐसा नहीं है मैं नहीं पीता, पर वो पब के अन्दर की महक सहन नहीं होती। और ऊपर से अंग्रेज़ों की जो ठसक है वो अभी तक गयी नहीं है, मन में ज़्यादातर को शायद लगता है कि हम हिन्दुस्तानी अभी भी उनके सेवक हैं। और टीवी पर लगभग रोज़ द्वितीय विश्व युद्ध पर कोई न कोई कार्यक्रम जिसमें बेचारे जर्मनी को बीच में घसीटेंगे। इनके पीछे अभी भी भूत का भूत घूम रहा है।

कुल मिलाकर पांच साल सह सकने बावज़ूद मैं अभी भी अपने मन को यहां रहने के लायक नहीं बना पाया हूं। मन भारत की तरफ ही भागता है। चलो काम की खातिर जुलाई तक सहना पड़ेगा, फिर वतन वापस।

चलूं अब काम पर वापस!

Monday, May 09, 2005

सर्दी और गर्मी

आजकल मै लीड्स (यूके) में हूं, काफी ठंड है यहां। रात का तापमान १ सेंटीग्रेड और दिन का है १४। और वहीं उत्तर भारत में ४० से अधिक । प्रकृति के भी क्या नज़ारे हैं! कहीं झुलसाऊ गर्मी और कहीं कड़क सर्दी।