Wednesday, June 29, 2005

रिलायंस भी ढाबा खोलेगा!

खबर है कि रिलायंस अब ढाबा के व्यापार में कूदने वाला है। जिस रफ़्तार से भारत में एक्सप्रेस राजमार्ग या चार या छह कतार वाले राजमार्ग बन रहे हैं, इन पर ढाबा का व्यापार फलेगा फूलेगा ही और चूंकि रिलायंस ने अपने पेट्रोल पम्प तो पहले से ही खोल रखे हैं, उन पर ढाबा खोलना काफ़ी फ़ायदेमन्द साबित हो सकता है। लेकिन इससे छोटे ढाबे वालों की रोजी रोटी बन्द हो सकती है।

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Tuesday, June 28, 2005

भारतीय पढ़ाकू

अब तो ये भी पता चला है कि हमारे लोग पढ़ने में भी सबसे आगे हैं। ये तो अच्छी खबर है क्योंकि पढ़ना एक अच्छी आदत है, और इसका मतलब केवल स्कूली पढ़ाई से नहीं है। चलो किसी अच्छी चीज़ में तो हम आगे हैं।

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Friday, June 24, 2005

अच्छे लेख

यदि आप अच्छी लघु कहानियां पढ़ने में दिलचस्पी रखते हैं तो नवभारत के एकदा स्तंभ पर नज़र डालियेगा (मेरे कम्प्यूटर पर ये IE पर ज़्यादा अच्छा दिखता है, फ़ायरफ़ाक्स पर कुछ दिक्कत है)।

हमारे राष्ट्रीय स्मारक

हमारे कई सारे राष्ट्रीय स्मारकों की दुर्दशा का हाल किसी से छुपा नहीं है। शेखर गुप्ता का हाल ही में इंडियन एक्सप्रेस में छपा ये लेख कुछ जगहों की दुर्दशा को बयान करता है। इस लेख पर लोगों की प्रतिक्रियायें भी दर्शाती हैं कि इस बारे में एक आम जागरूक भारतीय क्या सोचता है।

मेरे अपने अनुभव से लखनऊ का कलात्मक इमामबाड़ा पान की पीकों से भरा पड़ा है और जनता सुविधा के नाम पर इतना घटिया और बदबूदार टायलेट है कि वहां जाने से बेहतर मैं अपने आप को रोक के रखना ज़्यादा बेहतर समझूंगा। और बिठूर (ब्रह्मावर्त अर्थात जहां ब्रह्मा ने सृष्टि की रचना की थी) में पुराने मंदिर और मस्ज़िद कुछ लोगों के रहने की जगह बन चुके हैं और वहां गंगा का पाट और किनारे के मंदिर इतने गंदे हैं कि पूछो मत और साथ में चिल्लाते हैं कि गंगा मैया की जय, हर हर गंगे, घोर विडम्बना।

फ़र्रूखाबाद (कानपुर के पश्चिम में एक जिला) में गंगा के कई घाट हैं लेकिन वहां भी गंदगी और अव्यवस्था का बुरा आलम है। कानपुर में एक जे के मंदिर ही ऐसा है जहां साफ सफाई रखी जाती है, वहीं आप प्रसिद्ध पनकी मंदिर जाइये तो वहां गंदगी के अलावा कुछ नहीं दिखता, लोग जिन हनुमान जी की जय करते हैं उन्हीं हनुमान को अपना समय अथाह गंदगी में बिताना पड़ता है। यही हाल मथुरा के कई मंदिरों का है सिवाय जन्मभूमि के जो कि एक निजी संस्था द्वारा देखी जाती है।

जो जो स्थल सरकार के दायरे में आते हैं, उनका बहुत बुरा हाल है। और साथ में हमारे लोग, जिनको कि अपनी ही चीजों की कद्र नहीं है। रेलगाड़ी में खाना खाया जाता है, तो सारे प्लास्टिक के थैले खिड़की के बाहर फेंक दिये जाते हैं, और मिट्टी (खेत) और वातावरण होता है प्रदूषित, शहरों में जब कोई रेलगाड़ी घुसती है तो आंख बंद करना बेहतर होगा क्योंकि करीब १० किमी का स्टेशन तक का सफर चारों ओर गंदगी, मल-मूत्र , आवारा सुअरों, और जगह जगह गंदे पानी के भराव से पटा होता है।

क्या गंदगी हमारी नस नस में है? क्या हम नहीं चाहते कि हम साफ वातावरण में रहें? पैसा और विकास होयेगा और उसमें शायद समय भी लगे, लेकिन अपने आस पास के वातावरण को तो हम साफ रख सकते हैं। वियतनाम जो कि भारत से कहीं गरीब देश है, लेकिन कई गुना साफ सुथरा है। चीन के कई इलाके जो कि बिल्कुल अमीर नहीं हैं, लेकिन साफ सुथरे हैं। मुझे नहीं लगता कि सफाई का दौलत से कुछ लेना देना है क्योंकि ये एक अन्दर से महसूस की जाने वाली चीज़ है। यदिअ हम अपने देश (मतलब अपने आस पास को, प्लास्टिक इधर उधर न फेंकें) को साफ ही रखें तो देश कई महामारियों से बच सकता है और शायद थोड़ा और समृद्ध दिखे।

मेरे पैतृक घर (वाई ब्लॉक, किदवई नगर, कानपुर) के पास एक जगह है जो कि असल में उद्यान होना चाहिये जहां कि बच्चे खेल सकें, लेकिन वो जगह एक मवेशी की भैसों का बाड़ा बन गया है, किनारे एक मंदिर बन गया है, मंदिर अंदर से तो साफ है लेकिन चारों ओर महागंदा है और वहां सुअर लोटते हैं। मेरे मन में विचार आया कि मोहल्ले वालों को साथ मिलकर पैसा जमा करके इसके चारों ओर एक सीमा का निर्माण करना चाहिये, मैंने बात भी आगे बढ़ायी, लेकिन लोग सामने न आये। अब सोच रहा हूं कि अपने (मैं और एक आध और चिंतित पड़ोसी) से ही शुरूआत की जाये, शायद लोगों को तब कुछ फरक पड़े।

Thursday, June 23, 2005

शैम्पू का श्रोत

शैम्पू शब्द का प्रयोग आजकल हम सब उस तरल पदार्थ के लिये करते हैं जिसको कि हम बालों में लगाते हैं और सनसिल्क जिसके पैकेट एक रूपये में बेचता है। और शायद हम सब यही सोचते हैं को ये शब्द अंग्रेजी का है। पर नहीं, शैम्पू हिन्दी शब्द 'छापू (मूल: छापना)' से ही बना एक शब्द है जिसके 'छ' को अंग्रेजों ने 'श' बना दिया। शैम्पू का प्रयोग अंग्रेजों (व अन्य यूरोपियों) द्वारा बाल धोने के लिये किया जाता था क्योंकि इन लोगों को नहाने की आदत तो थी नहीं इसलिये बालों में हो जाते थे जुयें और शरीर में बदबू । पर भारत में सुबह सुबह मुखशुद्धि, शौच और स्नान सामान्य प्रक्रियायें थीं और अभी भी हैं। इसलिये बालों को धोने के लिये 'छापूं' जो कि हिन्दुस्तानी नौकरों द्वारा पूछा जाने वाला शब्द था उससे शैम्पू आया।

आज भी ये नालायक यूरोपियन सुबह सुबह शौच नहीं जाते हैं और हर समय वायुविकार और कब्ज से ग्रस्त रहते हैं या फिर दिन में कभी भी हो आते हैं। और सुबह नहाने का तो अभी भी कोई नियम नहीं है, इसीलिये इतना इत्रों या डिऑडरेन्टों का प्रयोग करते हैं। यक.......................... ऊपर से साफ और अन्दर से महागन्दे।

(मूल श्रोत)

Sunday, June 19, 2005

कम्प्यूटर पर सवार हिन्दी की दुनिया

हिन्दुस्तान के अनुसार सीडैक ने ऐसा साफ्टवेयर बनाया है जिससे कि भाषाई अंतराल मिट सकता है। सीडैक ने इस साफ्टवेयर को मुफ़्त रखा है। पूरीखबर यहां है (वर्तनी उतारना आवश्यक)।

Thursday, June 16, 2005

कर के दिखलाओ

आज अनुभूति पर कविवर श्री कृष्ण सरल की ये कविता देखी, अच्छी लगी। नीचे लिख रहा हूं।

कर के दिखलाओ

कहो नहीं करके दिखलाओ, उपदेशों से काम न होगा।
जो उपदिष्ट वही अपनाओ, कहो नहीं कर के दिखलाओ॥

अंधकार अंधकार है, क्या होगा कहते रहने से।
दूर न होगा अंधकार वह, निष्क्रिय रहने से सहने से ।
अंधकार यदि दूर भगाना, कहों नहीं तुम दीप जलाओ।
कहो नहीं करके दिखलाओ॥

यह लोकोक्ति सुनी ही होगी, स्वर्ग देखने मरना होगा।
बात तभी मानी जायेगी, स्वयं आचरण करना होगा।
पहले सीखो सबक स्वयं, फिर और किसी को सिखलाओ।
कहो नहीं करके दिखलाओ॥

कर्म कर्म के लिये प्रेरणा, होते हैं उपदेश निरर्थक।
साधु वृत्ति से मन को भांजो, साधु वेश परिवेश निरर्थक।
दुनिया भली बनेगी पीछे, पहले खुद को भला बनाओ।
कहो नहीं करके दिखलाओ॥

कथनी है वाचाल कहानी, करनी रहती सदा मौन है।
मौन स्वयं अभिव्यक्त सबल है, इसे जानता नहीं कौन है।
नहीं सहारा लो कथनी का, करनी से ही सब समझाओ।
कहो नहीं करके दिखलाओ॥




Wednesday, June 15, 2005

लाहौर की गलियां

लाहौर की गलियों के नाम पुराने नाम ही रहेंगे, ऐसा पढ़ने में आया। आप भी पढ़ें। कुल मिलाकर मेरा लाहौर, कराची , तक्षशिला, सियालकोट और वो जगहें जहां कि पुराने मंदिर,मस्जिद और गुरुद्वारे हैं जाने का मन है, सौभाग्य से पाकिस्तान में मेरे कुछ अच्छे दोस्त भी रहते हैं। आशा है कि मौका और वीज़ा मिलेगा।

भारत और तकनीकी डिजायन

डॉ अशोक झुनझुनवाला जो कि चेन्नई स्थित भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान में संकाय सदस्य हैं ने टेलीफोन और अंतरजाल सम्बन्धी तकनीक को कई लाख ग्रामीण घरों तक पहुंचाने में मदद की है। उनका कम दूरी की बेतार तकनीक को विकसित करने में अभूतपूर्व योगदान रहा है। रीडिफ डॉट काम ने २००२ में उनका एक साक्षात्कार लिया था जो कि यहां देखा जा सकता है।

Tuesday, June 14, 2005

ऐसी बोली बोलें कम्प्यूटर

नवभारत के आज (१४ जून) के अंक में सम्पादकीय में भारतीय भाषाओं में तरह के विभिन्न वर्तनियों या फ़ॉन्टों के कुकुरमुत्तों की तरह उग जाने पर एक मानक न हो पाने पर और उसके दुश्परिणामों पर चिन्ता जता रहे हैं हैं उपेन्द्र प्रसाद जी और कुछ उपायों पर प्रकाश डाल रहे हैं। पूरा लेख नीचे पढ़ें।

हिन्दुस्तान में एक और लेख (वर्तनी या फ़ॉन्ट उतारना आवश्यक) में कम्प्यूटर सॉफ़्टवेयरों और जालस्थलों की कमी पर चिन्ता जतायी गयी है। चिन्ता तो जग-जाहिर है, मैं तो भूंस रहा हूं ज़माने से इसके बारे में और ज़माने की गालियां, उपेक्षा, कुड़न और उलाहना भी देख चु्का हूं। अपनी विदेश यात्राओं और प्रवास के दौरान मैंने देखा है कि लगभग सभी देशों में तो पहले पहले जब कोई जानकारी लोगों को दी जाती है तो वो उनकी भाषा में होती है और अंग्रेजी का विकल्प हो सकता है (लेकिन पक्का नहीं है) लेकिन अपने देस में ठीक उल्टा ही होता है। मसलन एक बेचारे किसान को कृषि नीति क्या खाक पता चलेगी क्योंकि उसको बनाते हैं हमारे ससुरे नालायक अंग्रेजी-ज्ञान-सम्पन्न लेकिन हिन्दी-या-मातृभाषा-ज्ञान-विपन्न नौकरशाह और उसका एकदम कठिनतम संस्कृतनिष्ठ अनुवाद करते हैं हमारे हिन्दी विभाग के अधिकारी और बाबूगण, ऐसा अनुवाद कि खुद पाणिनि भी ज़मीन पर उतर आयें तो चकरा जायें।

नवभारत का विस्तृत लेख नीचे पढ़ें:

एक बोली बोलें कंप्यूटर
मंगलवार, १४ जून २००५
लेखक: उपेन्द्र प्रसाद

पिछले दिनों केन्द्रीय संचार एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री दयानिधि मारन ने एक ऐसी घोषणा की है, जिसका अमल देश में आईटी के इस्तेमाल के क्षेत्र में एक जबर्दस्त क्रान्ति लाने की क्षमता रखता है। यह ऐलान भारतीय भाषाओं के फॉन्ट्स से सम्बन्धित है। भारत के सॉफ्टवेयर इंजीनियरों ने कंप्यूटर तथा इनफॉमेर्शन टेक्नोलॉजी के विकास और प्रसार में अपने योगदान का लोहा दुनिया भर में मनवा लिया है। बेहतर अंग्रेजी ज्ञान के कारण बीपीओ क्षेत्र में भी भारत के लोगों ने अपनी एक खास पहचान बना ली है। देश के बढ़ते विदेशी मुद्रा भंडार में आईटी की कमाई का भी खासा योगदान रहा है। लेकिन इस सबके बावजूद आईटी का पूरा-पूरा फायदा अभी भारत को मिलना बाकी है। यह भारत को तभी मिलेगा, जब देश के लोग भारी संख्या में तथा भारी पैमाने पर कंप्यूटर तथा आईटी का इस्तेमाल करना शुरू करेंगे। और बड़े पैमाने पर इस्तेमाल तभी संभव हो पाएगा जब भारतीय भाषाओं के फॉन्ट्स कंप्यूटर सिस्टम पर सहज रूप से उपलब्ध होंगे। हजारों की संख्या में भारतीय भाषाओं के फॉन्ट्स तो अभी भी उपलब्ध हैं, लेकिन फिलहाल 'ज्यादा जोगी मठ उजाड़' वाली क हावत चरितार्थ हो रही है।

समस्या यह है कि प्रॉडक्शन के लेवल पर कंप्यूटर सिस्टम में भारतीय भाषाओं के फॉन्ट्स नहीं डालें जाते। इस्तेमाल करने वाले लोग अपनी-अपनी जरूरतों के मुताबिक अपनी-अपनी भाषाओं के फॉन्ट्स डाल लेते हैं। बाजार में सैकड़ों फॉन्ट्स उपलब्ध हैं। उन्हें खरीदा जाता है, मुफ्त डाउनलोड किया जाता है या अपने लिए विशेष फॉन्ट्स विकसित भी कर लिए जाते हैं। यहाँ तक तो ठीक है, लेकिन जब भारतीय भाषाओं में सूचनाओं के आदान-प्रदान की कोशिश की जाती है, तो फिर नाकामयाबी का लम्बा सिलसिला शुरू हो जाता है। जितनी दुकानें, उतने सिक्के और एक दुकान का सिक्का दूसरी दुकान में नहीं चलता। इसके कारण सूचनाओं के आदान-प्रदान तथा फाइल ट्रांसफर में भारी परेशानी उठानी पड़ रही है। यह सच है कि अंग्रेजी की मदद से भारतीय भाषाओं की फॉन्ट्स समस्याओं से निपटने की कोशिश की जाती है और अंग्रेजी कुछ हद तक मददगार भी हो रही है, लेकिन जब तकनीकी रूप से संभव है, तो फिर भारतीय भाषाओं की फॉन्ट्स समस्याओं से सीधे तौर पर क्यों नहीं निपटा जा सकता?

इन समस्याओं से निजात तभी मुमकिन है, जब सरकार इसके लिए तत्परता दिखाए। बदकिस्मती से इस दिशा में केन्द्र की ओर से अब तक कोई गंभीर कोशिश नहीं की गई। सबसे पहली कोशिश तमिलनाडु सरकार ने की थी। 1999 में तमिल भाषा के की बोर्ड का मानकीकरण किया गया था। लेकिन उसके बाद इस मामले में लम्बे समय तक चुप्पी छाई रही। अब जाकर दयानिधि मारन ने अपने मंत्रालय के स्तर पर एक पहल की है। इसके तहत पहले चरण में भारतीय भाषाओं के फॉन्ट्स मुफ्त बांटे जा रहे हैं। उसके बाद कंप्यूटर निर्माताओं को ये फॉन्ट्स अनिवार्य तौर पर मशीनों में डालने होंगे। जब सभी कंप्यूटरों में एक से फॉन्ट्स होंगे, तो उनके बीच संवाद मुमकिन हो जाएगा। इस योजना के तहत सेंटर फॉर द डिवेलपमेंट ऑफ एडवांस कंप्यूटिंग (सी-डैक) ने तमिल भाषा के फॉन्ट्स विकसित किए हैं। इन फॉन्ट्स की 30 लाख सीडी का वितरण कर दिया गया है। सी-डैक भारत की 22 भाषाओं की सीडी तैयार कर रहा है। तमिल भाषा की सीडी मुफ्त बांटी गई है। अन्य भाषाओं की सीडी भी मुफ्त बांटी जाएगी। आगामी एक साल तक सभी भाषाओं की सीडी लोगों तक मुफ्त में पहुंचा दी जाएंगी। अगर अपनी घोषणा पर मारन और उनका मंत्रालय अमल करता है, तो ये फॉन्ट्स तथा टूल्स जल्द ही सभी नए कंप्यूटरों में निर्माण के स्तर पर मौजूद होंगे। इस व्यवस्था को कानूनन लागू कराया जाएगा, जिससे फॉन्ट्स की एकरूपता सुनिश्चित की जा सकेगी।

आज जब बाजार में सरकार अपनी भूमिका सीमित कर रही है और उद्यमियों को बाजार की शक्तियों द्वारा संचालित होने की छूट दी जा रही है, तो यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या कंप्यूटर निर्माता सरकार के इन बाध्यकारी आदेशों का स्वागत कर पाएंगे? इसका जवाब ढूंढना मुश्किल नहीं है। उद्यमी सरकार के उन फैसलों का हमेशा स्वागत ही करना है, जिनसे बाजार में अफरातफरी खत्म होती हो। भारतीय फॉन्ट्स के मामले में तो पूरी अराजकता ही व्याप्त है। और इस अराजकता के कारण कंप्यूटर बाजार तेजी से फैल नहीं पा रहा है। अगर नए इंतजाम के चलते भारतीय भाषाओं का धड़ल्ले से इस्तेमाल होता है, तो फिर कंप्यूटर की मांग भी बढ़ेगी। जिस किसी भी उत्पाद की उपयोगिता बढ़ती है, उसकी मांग भी बढ़ जाती है। भारतीय भाषाओं में कंप्यूटर तथा आईटी का इस्तेमाल सहज एवं सुलभ होने से उनकी उपयोगिता कई गुना बढ़ जाएगी। उपयोगिता बढ़ने के साथ कंप्यूटर का देश के दूर-दराज इलाकों में भी इस्तेमाल होने लगेगा। अंतत: इसका फायदा कंप्यूटर उत्पादकों को ही होगा। इसलिए कोई कारण नहीं कि भारतीय फॉन्ट्स पर सरकार की पहल को कंप्यूटर निर्माता अपने व्यापार निर्णय में कोई बेजा दखल मानें। उम्मीद तो यह की जा रही है कि वे सरकार की इस पहल का स्वागत करेंगे।

अलबत्ता एक सवाल सरकारी योजना के टाइमटेबल को लेकर है। पहले फॉन्ट्स बांटे जाएंगे और फिर उन्हें अनिवार्य तौर पर कंप्यूटरों में शामिल किया जाएगा। यह लंबी प्रक्रिया क्यों? जब केन्द्र सरकार अथवा सी-डैक ने फॉन्ट्स का विकास कर लिया है, तो उन्हें निर्माताओं को फौरन मुहैया कर देना चाहिए और मुफ्त वितरण का काम पूरा होने का इंतजार नहीं करना चाहिए।। इस बीच कंप्यूटर निर्माता भी अपने व्यापारिक हितों को देखते हुए खुद ही इन फॉन्ट्स का इस्तेमाल शुरू कर दें, तो अच्छा होगा। इसके लिए किसी सरकारी आदेश का इंतजार क्यों होना चाहिए?

दरअसल भारतीय भाषाओं के फॉन्ट्स की समस्या मानकीकरण की समस्या है। जिन भाषाओं का इस्तेमाल आई टी में होता है, उनके कुछ मानक तो होने ही चाहिए, जो सभी जगह सभी कंप्यूटर सिस्टम में हर समय मौजूद हों। उद्योग और व्यापार के क्षेत्र में मानकीकरण अनिवार्य है। इसके बिना कोई काम चल नहीं सकता। आज भारत में ई-मेल और इंटरनेट के लेवल पर भारतीय भाषाओं में बहुत कम काम होता है। अगर मानकीकरण का काम शुरू में हो जाता, तो यह हालत नहीं होती। भारत में आईटी का फैलाव कई गुना ज्यादा होता।

फॉन्ट्स के मानकीकरण के साथ यह भी जरूरी है कि की बोर्ड का मानकीकरण किया जाए। अंग्रेजी का एक मानक की बोर्ड है, लेकिन भारतीय भाषाओं में यहाँ भी अराजकता का ही साम्राज्य है। 1999 में करुणानिधि सरकार ने तमिल भाषा के की बोर्ड का मानकीकरण किया था, लेकिन हिन्दी सहित अनेक भारतीय भाषाओं के की बोर्ड का मानकीकरण होना बाकी है। वैसे यह मामला इतना कठिन नहीं होना चाहिए, क्योंकि टाइपराइटर के की बोर्ड का मानकीकरण हुआ ही था। उसी को कुछ सुधार के साथ अनिवार्य बनाया जा सकता है या विकल्प दिए जा सकते हैं।

Friday, June 10, 2005

योगासन

पिछले ५-७ सालों में मुझे कुछ हड्डी से सम्बन्धित तकलीफें हुयीं थीं, जैसे कि क्रिकेट खेलते समय घुटने का मुड़ना, वजन उठाने के बाद कमर के निचले हिस्से में भारी दर्द की शिकायत इत्यादि। लेकिन योगासन करने से इन रोगों के निवारण में मुझे कितनी सफलता मिली है उसको बयान करना मुश्किल है। डॉक्टरों के पास गये तो दर्द निवारक दवायें दी गयीं जिनको खाकर दर्द और बढ़ गया, क्योंकि दवा खाने के बाद कुछ घंटों तक दर्द कम हो जाता है और कुछ ज़्यादा ही काम कर लेते हैं और तकलीफ बढ़ जाती है।

सन २००० में मुझे योगासन करने का रास्ता सूझा। बचपन में कानपुर में बहुत कम समय के लिये तत्कालीन देव योग केन्द्र (स्वरूप नगर, कानपुर) में डॉ ओमप्रकाश आनन्द के मार्गदर्शन में कुछ आसनों को सीखा था और उन्हीं को प्रयोग किया। साथ में कुछ किताबों को भी पढ़ा। और आज मेरी पीठ का दर्द एक दम गायब और घुटना जो कि बचपन से ही रोगग्रस्त था (किसी नालायक शल्य चिकित्सक की गलती के कारण), आज काफ़ी भला चंगा है। शरीर में अभी भी २० साल की उमर वाली फ़ुर्ती है और मैं अपनी आयु से ५-१० से भी ज़्यादा कम उम्र के लोगों से चुस्त दुरुस्त हूं (कोई अतिश्योक्ति नहीं कह रहा हूं)। तेज़ चलता हूं और तेज़ी से हर काम करता हूं। पर ये सब कमाल है योग का जिससे कि मेरी काम करने की ऊर्जा बनी हुयी है और लगता है कि बढ़ती ही जा रही है।

अभी तक मैं आसन ही करता था लेकिन हाल ही में (मार्च) कानपुर में आयोजित स्वामी रामदेव के शिविर में भी सम्मिलित हुआ था और एक हफ़्ते तक अच्छे से प्राणायाम सीखा। उन्होंने आई आई टी में भी एक छोटा सा व्याख्यान दिया था। उनका शिविर काफ़ी ज्ञानवर्धक रहा। उन्होंने बताया कि हममें से ज़्यादातर गलत तरीके से सांस लेते हैं और सही तरीका बताया। सबसे अच्छा ये लगा कि कि उन्होंने योग को आम आदमी की भाषा में समझाया। कोक, पेप्सी (असल टायलेट क्लीनर, आप प्रयोग करके देख सकते हैं, सही काम करता है टायलेट में), डब्बाबंद खाना, और तरह तरह की बुरी चीज़ों को न खाने की हिदायत दी। प्राणायाम को आम आदमी को फायदे की नज़र से समझाया, और इस तरह से बताया कि हर आदमी कर सके। कुल मिलाकर उनका शिविर बहुत अच्छा व सफल रहा। मुझे बचपन से ही सायनस व अस्थमा की आनुवंशिक समस्या रही है लेकिन प्राणायाम से काफ़ी आराम है और अब तो मैं कुछ किलोमीटर लगातार दौड़ भी लेता हूं।

वे एक संस्था दिव्य योग ट्रस्ट की स्थापना कर रहे हैं जिसका जालपृष्ठ भी है।

खुद स्वामी रामदेव एकदम दुबले पतले व स्वस्थ दिखते हैं, चाल में अजब की तेज़ी है और शरीर सांप की तरह कहीं भी मुड़ जाता है, बाल एक दम काले। कहा जाता है कि बचपन में उनको पक्षाघात की बीमारी (या कोई और खतरनाक किस्म की) थी और तभी वे किसी हिमालय के योगाचार्य के सम्पर्क में आये और खुद को निरोग किया और अब दूसरों को निरोग कर रहे हैं। मेरे खयाल से वो कुछ बुरा तो नहीं सिखा रहे हैं। उनके कुछ कथनों में अतिश्योक्ति ज़रूर है लेकिन झूठ नहीं। अगर कुछ प्रतिशत भी फायदा होता है तो आपसे डॉक्टर दूर ही रहेगा। उनका कहना है कि भारतीय चिकित्सक विदेशी चिकित्सा तो सीख लेते हैं लेकिन अपने यहां की जो विद्या है उसके बारे में क ख ग भी नहीं मालूम, क्यों नहीं योग और आयुर्वेद को डाक्टरी के पाठ्यक्रम में सम्मिलित किया जाये। उनको शायद ये भी नहीं बताया जाता है कि सुश्रुत और चरक कौन थे (क्या आपको मालूम है?)। मैं सहमत हूं।

कुल मिलाकर मैं तो य़ोग का मुरीद हूं। आप भी आजमायें और खुद को निरोग बनायें। सही कहा है किसी ने कि जान है तो जहान है।

Tuesday, June 07, 2005

श्रद्धा के पात्र बाबू

ज़्यादातर दफ़्तरी बाबुओं का नाम सुनकर डर सा ही लगता है या फिर एक चिढ़ सी होती है और किसी भ्रष्ट बाबू का चेहरा सामने आ जाता है। लेकिन महाराष्ट्र के रत्नागिरी जिले के गरीब स्कूली बच्चों के लिये ये बाबू किसी देवदूत के समान हैं जो कि उन बच्चों की हर संभव मदद करते हैं। इसके लिये बाबुओं ने एक संस्था भी बनाई है जिसका नाम है 'लांजा राजापुर संघमेश्वर तालुका उत्कर्ष मण्डल ' । (पूरी कहानी)

रत्नगिरी एक हरा भरा किन्तु गरीब ग्रामीण इलाका है और जहां बच्चों को स्कूल जाने में कई तकलीफों का सामना करना पड़ता है। ज़्यादातर बच्चे कक्षा ७ या ८ के बाद स्कूल जाना बंद कर देते हैं और कहीं नौकरी शुरू कर देते हैं। सन १९९० में श्री मधुकर कृष्णजी पवार, जो कि महाराष्ट्र सरकार द्वारा चलाये जा रहे नायर अस्पताल में १५ साल से बाबू थे और जिन्होंने रत्नागिरी में अपना बचपन गरीबी में गुज़ारा था, ने अपने दो साथी बाबू मित्रों प्रदीप सालुंके और प्रदीप देवरूखर के साथ मिल कर इन बच्चों के लिये कुछ करने का निश्चय किया। उन्होंने लोगों से इन बच्चों की मदद के लिये सहायता मांगना शुरू किया और कुछ लोगों ने स्कूल की वर्दी, पढ़ाई के सामान इत्यादि के लिये योगदान भी किया। इन्हीं सब कार्यों की वजह से और अन्य व्यक्तियों के सम्मिलित होने के बाद १९९५ में इस संस्था का निर्माण हुआ जो कि रत्नगिरी क्षेत्र के लिये एक वरदान साबित हुई है। संस्था बच्चों की पढ़ाई से सम्बन्धित सा्मान को मुहैया कराने के काम के साथ ऐसे लोगों को भी खोजती है जो कि बच्चों की पढ़ाई का खर्च वहन कर सकें। आज की तारीख में संस्था का बजट ५ लाख से १० लाख के बीच है और संस्था आसपास के तीन मण्डलों में सैकड़ों स्कूलों को सुचारू रूप से चलने में मदद करती है। संस्था के करीब तनख्वाह पाने वाले ५० बाबू सदस्य हैं।

एक बच्चे की सालाना पढ़ाई का खर्च करीब २००० रूपये है और १० साल का खर्च करीब ३०,००० रुपये है (महंगाई और बढ़ती उमर को जोड़कर)। करीब ५ लाख रूपया बच्चों द्वारा बनाये गये सामान की बिक्री, सदस्यों और पारिवारिक मित्रों के अनुदान से आता है और बाकी पैसा कुछ भले लोगों से आता है। पैसे की कमी होने पर सदस्य ऋण लेकर काम चलाते हैं लेकिन पैसे की कमी को इस काम के आड़े नहीं आने देते हैं।

अगर आप इच्छुक हैं तो संस्था से नीचे दिये पते पर संपर्क करें।

संस्था का पता:

लांजा राजापुर संघमेश्वर तालुका उत्कर्ष मण्डल
9/5, आर्य नगर
तारदेव, मुम्बई- 400034
दूरभाष: 022-24964032;24940287;24961282;
सचिव: श्री मधुकर पवार [मोबाइल:0-98694 28469]
विपत्र पता: lanrajsantaluka@sify.com

Monday, June 06, 2005

अमर उजाला की हिन्दी

ये खबर अमर उजाला में पढ़ी । कुछ वाक्यजैसे कि 'ब्लड प्रेशर लो हो सकता है' या 'गर्मी में लिक्विड लेना चाहिये' पढ़ के लगता है समाचार पत्रों में हिंग्लिश का प्रयोग अब आम हो गया है क्योंकि ऐसी मिश्रित भाषा की खबरें अब हिन्दी अखबारों में आम हो गयी हैं। बेचारी हिन्दी! पता नहीं ये चलन हिन्दी को और व्यापक बना रहा है या धीरे धीरे इसके पलायन का रास्ता साफ कर रहा है, आने वाला समय ही बतायेगा। कई जगह तो वर्तनी ही गलत लिखी जाती है। जैसे कि चन्द्रबिन्दु गलत जगह लगाना, या आधा 'र' का गलत प्रयोग । इस बारे में हिन्दुस्तान की ये खबर पढ़ें (हिन्दीलिपि, Font के लिये सम्पूर्ण शब्द??) को उतारना (डाउनलोड करना के लिये??) शायद ज़रूरी हो सकता है)।

गैडे का नंबर

अब बाघ के बाद गैंडे का नंबर आ रहा है विलुप्त होने की कगार पर। एक सींग वाले गैँडे केवल ब्रह्मपुत्र नदी का साथ सटे हुये ओरांग अभ्यारण्य (या राजीव गांधी वन्य जीव अभ्यारण्य) में ही पाये जाते हैं। ११९१ की गणना के अनुसार वहां ९० से भी अधिक गैंडे थी जो कि २००० में घट कर २० से भी कम रह गये। पूरी खबर दैनिक जाग़रण पर पढ़ी जा सकती है।

समझ में नहीं आता है कि इंसान को पर्यावरण के साथ सामंजस्य रखने की अक्ल कब आयेगी।

Saturday, June 04, 2005

दूसरों के कपड़े बनाने वालों के खुद के बदन नंगे

बाहर देशों में बिकने वाले मंहगे कपड़ों को बनाने वाली महिला मजदूर दुबई औ रदूसरे देशों की औरतों के बदन तो ढकती हैं लेकिन उनके खुद के बदन पर चीथड़े भर हैं। गाज़ियाबाद जनपद में लगभग तीन हजार से अभिक महिलायें बस्त्र निर्माताओं और निर्यातकों के पास काम करती हैं और लाखों करोड़ों के कपड़े इनके हाथ से गुज़रते हैं लेकिन इनको फटेहाल ही रहना पड़ता है।

क्या यही है हुनर की कदर! हुनर तो शायद आजकल यही है कि कैसे ज़्यादा से ज़्यादा पैसा बनाया जाये भले ही कैसे भी हो और उसके रास्ते में कोई भी कुर्बान हो।

ठीक वैसे ही इन्फ़ोसिस और विप्रो की चमकदार आलीशान इमारतों को बनाने वाले दिहाड़ी (हुनरमंद) मज़दूरों के पास सोने को घर क्या बिस्तर तक नहीं होता।

पूरी खबर यहां पर।

नयी स्कूली व्यवस्था

राष्ट्रीय शिक्षा, अनुसंधान, एवं विकास परिषद (NCERT) ने कहा कि स्कूली शिक्षा में काफ़ी परिवर्तन किया जायेगा और बच्चों के बस्ते को हल्का किये जाने के साथ परीक्षा के तनाव से निजात दिलायी जायेगी और उनके पाठयक्रम को पर्यावरण जैसे मुद्दों से भी जोड़ा जायेगा। बच्चों की तो ऐश। खबर यहां पढें।

और दूसरी तरफ़ यहां इंग्लैंड में लोग परेशान हैं कि स्कूलों में बहुत कम पढ़ायी होती है और यहां स्कूली बोझ बढ़ाये जाने की वकालत हो रही है।

क्या क्या तकलीफें हैं: कोई कम से परेशान तो कोई ज़्यादा से।

अमेरिका के लिये मुसीबत बनी मानव गंदगी

मुझे तो लगा था कि केवल गरीब देशों के लोग ही खुले में मल-मूत्र करते हैं। कमसे कम अमीर देशों द्वारा प्रचारित तो यही किया जाता है। लेकिन पढ़ने में आया है कि अमेरिका में भी खुले स्थानों पर छोड़ी गयी मानव गंदगी (मल मूत्र और डब्बे में बंद कचरा) मुसीबत बन रही है। भाई हमारे यहां तो लोग आदी है और लोगों को मालूम है कि इसको कैसे साफ किया गये या कराया जाये और हम इतने 'सॉफिस्टीकेटिड' नहीं है । पर वहां तो मुसीबत होना लाजिमी है। खबर पढ़ें हिन्दुस्तान पर।