रिलायंस भी ढाबा खोलेगा!
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जो मन में आया वो उगला और लिखा!
कर के दिखलाओ
कहो नहीं करके दिखलाओ, उपदेशों से काम न होगा।
जो उपदिष्ट वही अपनाओ, कहो नहीं कर के दिखलाओ॥
अंधकार अंधकार है, क्या होगा कहते रहने से।
दूर न होगा अंधकार वह, निष्क्रिय रहने से सहने से ।
अंधकार यदि दूर भगाना, कहों नहीं तुम दीप जलाओ।
कहो नहीं करके दिखलाओ॥
यह लोकोक्ति सुनी ही होगी, स्वर्ग देखने मरना होगा।
बात तभी मानी जायेगी, स्वयं आचरण करना होगा।
पहले सीखो सबक स्वयं, फिर और किसी को सिखलाओ।
कहो नहीं करके दिखलाओ॥
कर्म कर्म के लिये प्रेरणा, होते हैं उपदेश निरर्थक।
साधु वृत्ति से मन को भांजो, साधु वेश परिवेश निरर्थक।
दुनिया भली बनेगी पीछे, पहले खुद को भला बनाओ।
कहो नहीं करके दिखलाओ॥
कथनी है वाचाल कहानी, करनी रहती सदा मौन है।
मौन स्वयं अभिव्यक्त सबल है, इसे जानता नहीं कौन है।
नहीं सहारा लो कथनी का, करनी से ही सब समझाओ।
कहो नहीं करके दिखलाओ॥
एक बोली बोलें कंप्यूटर
मंगलवार, १४ जून २००५
लेखक: उपेन्द्र प्रसाद
पिछले दिनों केन्द्रीय संचार एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री दयानिधि मारन ने एक ऐसी घोषणा की है, जिसका अमल देश में आईटी के इस्तेमाल के क्षेत्र में एक जबर्दस्त क्रान्ति लाने की क्षमता रखता है। यह ऐलान भारतीय भाषाओं के फॉन्ट्स से सम्बन्धित है। भारत के सॉफ्टवेयर इंजीनियरों ने कंप्यूटर तथा इनफॉमेर्शन टेक्नोलॉजी के विकास और प्रसार में अपने योगदान का लोहा दुनिया भर में मनवा लिया है। बेहतर अंग्रेजी ज्ञान के कारण बीपीओ क्षेत्र में भी भारत के लोगों ने अपनी एक खास पहचान बना ली है। देश के बढ़ते विदेशी मुद्रा भंडार में आईटी की कमाई का भी खासा योगदान रहा है। लेकिन इस सबके बावजूद आईटी का पूरा-पूरा फायदा अभी भारत को मिलना बाकी है। यह भारत को तभी मिलेगा, जब देश के लोग भारी संख्या में तथा भारी पैमाने पर कंप्यूटर तथा आईटी का इस्तेमाल करना शुरू करेंगे। और बड़े पैमाने पर इस्तेमाल तभी संभव हो पाएगा जब भारतीय भाषाओं के फॉन्ट्स कंप्यूटर सिस्टम पर सहज रूप से उपलब्ध होंगे। हजारों की संख्या में भारतीय भाषाओं के फॉन्ट्स तो अभी भी उपलब्ध हैं, लेकिन फिलहाल 'ज्यादा जोगी मठ उजाड़' वाली क हावत चरितार्थ हो रही है।
समस्या यह है कि प्रॉडक्शन के लेवल पर कंप्यूटर सिस्टम में भारतीय भाषाओं के फॉन्ट्स नहीं डालें जाते। इस्तेमाल करने वाले लोग अपनी-अपनी जरूरतों के मुताबिक अपनी-अपनी भाषाओं के फॉन्ट्स डाल लेते हैं। बाजार में सैकड़ों फॉन्ट्स उपलब्ध हैं। उन्हें खरीदा जाता है, मुफ्त डाउनलोड किया जाता है या अपने लिए विशेष फॉन्ट्स विकसित भी कर लिए जाते हैं। यहाँ तक तो ठीक है, लेकिन जब भारतीय भाषाओं में सूचनाओं के आदान-प्रदान की कोशिश की जाती है, तो फिर नाकामयाबी का लम्बा सिलसिला शुरू हो जाता है। जितनी दुकानें, उतने सिक्के और एक दुकान का सिक्का दूसरी दुकान में नहीं चलता। इसके कारण सूचनाओं के आदान-प्रदान तथा फाइल ट्रांसफर में भारी परेशानी उठानी पड़ रही है। यह सच है कि अंग्रेजी की मदद से भारतीय भाषाओं की फॉन्ट्स समस्याओं से निपटने की कोशिश की जाती है और अंग्रेजी कुछ हद तक मददगार भी हो रही है, लेकिन जब तकनीकी रूप से संभव है, तो फिर भारतीय भाषाओं की फॉन्ट्स समस्याओं से सीधे तौर पर क्यों नहीं निपटा जा सकता?
इन समस्याओं से निजात तभी मुमकिन है, जब सरकार इसके लिए तत्परता दिखाए। बदकिस्मती से इस दिशा में केन्द्र की ओर से अब तक कोई गंभीर कोशिश नहीं की गई। सबसे पहली कोशिश तमिलनाडु सरकार ने की थी। 1999 में तमिल भाषा के की बोर्ड का मानकीकरण किया गया था। लेकिन उसके बाद इस मामले में लम्बे समय तक चुप्पी छाई रही। अब जाकर दयानिधि मारन ने अपने मंत्रालय के स्तर पर एक पहल की है। इसके तहत पहले चरण में भारतीय भाषाओं के फॉन्ट्स मुफ्त बांटे जा रहे हैं। उसके बाद कंप्यूटर निर्माताओं को ये फॉन्ट्स अनिवार्य तौर पर मशीनों में डालने होंगे। जब सभी कंप्यूटरों में एक से फॉन्ट्स होंगे, तो उनके बीच संवाद मुमकिन हो जाएगा। इस योजना के तहत सेंटर फॉर द डिवेलपमेंट ऑफ एडवांस कंप्यूटिंग (सी-डैक) ने तमिल भाषा के फॉन्ट्स विकसित किए हैं। इन फॉन्ट्स की 30 लाख सीडी का वितरण कर दिया गया है। सी-डैक भारत की 22 भाषाओं की सीडी तैयार कर रहा है। तमिल भाषा की सीडी मुफ्त बांटी गई है। अन्य भाषाओं की सीडी भी मुफ्त बांटी जाएगी। आगामी एक साल तक सभी भाषाओं की सीडी लोगों तक मुफ्त में पहुंचा दी जाएंगी। अगर अपनी घोषणा पर मारन और उनका मंत्रालय अमल करता है, तो ये फॉन्ट्स तथा टूल्स जल्द ही सभी नए कंप्यूटरों में निर्माण के स्तर पर मौजूद होंगे। इस व्यवस्था को कानूनन लागू कराया जाएगा, जिससे फॉन्ट्स की एकरूपता सुनिश्चित की जा सकेगी।
आज जब बाजार में सरकार अपनी भूमिका सीमित कर रही है और उद्यमियों को बाजार की शक्तियों द्वारा संचालित होने की छूट दी जा रही है, तो यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या कंप्यूटर निर्माता सरकार के इन बाध्यकारी आदेशों का स्वागत कर पाएंगे? इसका जवाब ढूंढना मुश्किल नहीं है। उद्यमी सरकार के उन फैसलों का हमेशा स्वागत ही करना है, जिनसे बाजार में अफरातफरी खत्म होती हो। भारतीय फॉन्ट्स के मामले में तो पूरी अराजकता ही व्याप्त है। और इस अराजकता के कारण कंप्यूटर बाजार तेजी से फैल नहीं पा रहा है। अगर नए इंतजाम के चलते भारतीय भाषाओं का धड़ल्ले से इस्तेमाल होता है, तो फिर कंप्यूटर की मांग भी बढ़ेगी। जिस किसी भी उत्पाद की उपयोगिता बढ़ती है, उसकी मांग भी बढ़ जाती है। भारतीय भाषाओं में कंप्यूटर तथा आईटी का इस्तेमाल सहज एवं सुलभ होने से उनकी उपयोगिता कई गुना बढ़ जाएगी। उपयोगिता बढ़ने के साथ कंप्यूटर का देश के दूर-दराज इलाकों में भी इस्तेमाल होने लगेगा। अंतत: इसका फायदा कंप्यूटर उत्पादकों को ही होगा। इसलिए कोई कारण नहीं कि भारतीय फॉन्ट्स पर सरकार की पहल को कंप्यूटर निर्माता अपने व्यापार निर्णय में कोई बेजा दखल मानें। उम्मीद तो यह की जा रही है कि वे सरकार की इस पहल का स्वागत करेंगे।
अलबत्ता एक सवाल सरकारी योजना के टाइमटेबल को लेकर है। पहले फॉन्ट्स बांटे जाएंगे और फिर उन्हें अनिवार्य तौर पर कंप्यूटरों में शामिल किया जाएगा। यह लंबी प्रक्रिया क्यों? जब केन्द्र सरकार अथवा सी-डैक ने फॉन्ट्स का विकास कर लिया है, तो उन्हें निर्माताओं को फौरन मुहैया कर देना चाहिए और मुफ्त वितरण का काम पूरा होने का इंतजार नहीं करना चाहिए।। इस बीच कंप्यूटर निर्माता भी अपने व्यापारिक हितों को देखते हुए खुद ही इन फॉन्ट्स का इस्तेमाल शुरू कर दें, तो अच्छा होगा। इसके लिए किसी सरकारी आदेश का इंतजार क्यों होना चाहिए?
दरअसल भारतीय भाषाओं के फॉन्ट्स की समस्या मानकीकरण की समस्या है। जिन भाषाओं का इस्तेमाल आई टी में होता है, उनके कुछ मानक तो होने ही चाहिए, जो सभी जगह सभी कंप्यूटर सिस्टम में हर समय मौजूद हों। उद्योग और व्यापार के क्षेत्र में मानकीकरण अनिवार्य है। इसके बिना कोई काम चल नहीं सकता। आज भारत में ई-मेल और इंटरनेट के लेवल पर भारतीय भाषाओं में बहुत कम काम होता है। अगर मानकीकरण का काम शुरू में हो जाता, तो यह हालत नहीं होती। भारत में आईटी का फैलाव कई गुना ज्यादा होता।
फॉन्ट्स के मानकीकरण के साथ यह भी जरूरी है कि की बोर्ड का मानकीकरण किया जाए। अंग्रेजी का एक मानक की बोर्ड है, लेकिन भारतीय भाषाओं में यहाँ भी अराजकता का ही साम्राज्य है। 1999 में करुणानिधि सरकार ने तमिल भाषा के की बोर्ड का मानकीकरण किया था, लेकिन हिन्दी सहित अनेक भारतीय भाषाओं के की बोर्ड का मानकीकरण होना बाकी है। वैसे यह मामला इतना कठिन नहीं होना चाहिए, क्योंकि टाइपराइटर के की बोर्ड का मानकीकरण हुआ ही था। उसी को कुछ सुधार के साथ अनिवार्य बनाया जा सकता है या विकल्प दिए जा सकते हैं।